Wednesday, May 13, 2020

कुकुरतंत्र

किसी पद विहीन नेता की तरह आवारा घूमते उस कुत्ते पर मुझे तरस आ गया। सभी जीवों में ब्रह्म की उपस्थिति की बात मुझे धार्मिक चिंतन की घुट्टी में जन्म से ही पिलाई गई थी। ये अलग बात है कि विषधरों के ब्रह्मतत्त्व को स्थूल दृष्टि से देख पाना बहुत कठिन जानकर, मैंने ब्रह्म को उसके हाल पर छोड़कर आगे बढ़ जाना ही हमेशा श्रेयस्कर समझा था। मगर उस आवारा कुत्ते की निरीह आँखों में से शायद उसके ब्रह्म ने ही मेरे भीतर के ब्रह्म को कॉल किया होगा। तभी तो सनातनी दया भाव ने जोर मारा।

मैंने श्रीमतीजी को आवाज़ लगाई और निवेदन किया कि मेरे और अपने हिस्से का एक एक वोट इसको दे देते हैं। माफ कीजिये वोट नहीं, रोटी कहना चाहता था मगर लॉक डाउन में सोशल मीडिया पर ज्यादा समय देने का परिणाम है कि बुद्धि में राजनीति के विषाणु प्रवेश कर गए हैं। श्रीमतीजी भी मेरी तरह से सनातनी परंपरा से हैं, मगर है तो पत्नी ही। इसलिए थोड़े बहुत औपचारिक ना-नुकुर के बाद मान गईं। हालांकि उन्होंने मुझे चेताया भी कि अब ये रोज़ आने लगेगा।

मैंने सुना है कि पत्नी की बात को ब्रह्माजी भी नहीं काट सकते, लिहाजा वही हुआ जो भविष्यवाणी उन्होंने कर दी थी। अब वह कुकुर कुलदीपक अपने हिस्से की मुफ्त की सब्सिडी लेने रोज आने लगा था। उसके लिए अब चार रोटी सुबह शाम मेरे गाढ़े पसीने की कमाई में से बनने लगी थीं। यहाँ मैं आपको स्पष्ट कर दूँ के समस्त आवश्यक वस्तुओं को क्रय करते समय दिए गए GST के अलावा आयकर, गृहकर, जल कर, इत्यादि देने के पश्चात भी यदि आपके बटुए में कुछ बच पाता है, तो उसे ही शास्त्रों में गाढ़े पसीने की कमाई कहा गया है। यदि आपके बटुए के भाग्य में यह सुख नहीं है तो आपकी संतुष्टि के लिए ही भगवद गीता में यह श्लोक कहा गया है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकमज़्णि॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 47)

अर्थात तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर अधिकार पहले देश की सरकार का है, उसके पश्चात ईश्वर नाम की किसी बड़ी सरकार का।

कुछ ही सप्ताह में स्थिति यह थी कि सब्सिडी, क्षमा कीजियेगा, रोटी मिलने में विलंब उसे बर्दाश्त नहीं था। और अब उसने स्थायी डेरा मेरे घर के द्वार पर बना लिया था। उसको देख देख कर मेरे पालक होने के अहंकार को तृप्ति भी मिल रही थी।

यह सच है कि सृष्टि में स्वाभिमान नाम की कोई चीज़ भी सृष्टा ने रची थी। संभवतः उसी की वजह से कभी कभी कर्तव्यबोध भी जागता है। वरना इस देश में जीने के लिए अधिकार बोध का होना ही पर्याप्त है। कदाचित ऐसी ही कोई क्रांति उस कुकुर कुलदीपक के जीवन में घटी हो। कर्तव्यबोध के चलते उसने हर राह चलते व्यक्ति से अपनी प्रकृति जन्य वाणी और मातृभाषा में वार्तालाप शुरू कर दिया था। पड़ोसियों ने उक्त कृत्य को "भौंकने" का नाम दिया था।

शीघ्र ही पड़ोस के वकील साहब के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय डेलीगेशन आपत्ति लेकर मुझसे मिलने आया। मैंने उन्हें अवगत कराया कि मेरे घर की रक्षा के तहत भौंकने का अधिकार इसको संविधान देता है। उन्होंने मुझे इतिहास दर्शन के माध्यम से समझाया कि अक्सर संविधान की छोटी सी चूक से राष्ट्रों के भूगोल बिगड़ जाया करते हैं। इसलिए आप अपनी इस सैन्य शक्ति को लाइन ऑफ कंट्रोल के अंदर रख लीजिए, यही आपके लोकतंत्र के अच्छे स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगा। प्रेम की अपेक्षा तर्कसंगत बात व्यक्ति को जल्दी समझ में आती है। लिहाजा सबकी राय से मैंने उसे अपनी घर की संसद में एक बोरी बिछाकर उचित स्थान दे दिया। अब वह हमारा निर्वाचित प्रतिनिधि बन चुका था और भौंकलाहट का लोकतांत्रिक अधिकार उसे प्राप्त हो गया था।

वकील साहब अनुभवी व्यक्ति थे। एक दिन उन्होंने कहा सेठजी, आप इसको समय समय पर बांध कर भी रखा कीजिये, क्योंकि यह मित्र और शत्रु के भेद को नहीं समझता है। यह आपके हर मित्र को और उसके प्रत्येक कृत्य को भी शक की दृष्टि से ही देखेगा। किसी दिन काट भी सकता है, यही इसका धर्म है। आपके यहाँ इसकी अराजकता के चलते फॉरेन इन्वेस्टर तो छोड़िए, आपके अपने मित्र भी आने से कतराने लगेंगे। और तो और कहीं इसके मित्र-मित्राणियों ने आना शुरू कर दिया तो जनसंख्या बढ़ते देर नहीं लगेगी। तब इतनी सी सब्सिडी से काम नहीं चलेगा। अतः आप कोई पार्ट टाइम काम भी बढ़ा लीजिए। वरना आपकी अर्थव्यवस्था बिगड़ते देर नहीं लगेगी और घर का सारा लोकतंत्र ढह जाएगा।

मैं वकील साहब की अनुभवी दृष्टि का कायल हो गया था। मैंने उन्हें प्रणाम किया और निवेदन किया कि जब आपने इतना किया है तो एक कृपा और कर दीजिये। अब आप ही इसका नामकरण भी कर दीजिए। उन्होंने कहा कि इस कुकुर कुलदीपक के स्वभाव को देखते हुए मैं ये जानता हूँ कि, अपने कुत्तत्व के अहम की संतुष्टि के लिए और कर्तव्यबोध के दबाव में, इसकी कार्यप्रणाली तो बदलने से रही। यह समय समय पर आपकी शांति भंग करके, अपने जीवित होने का प्रमाण देता रहेगा।  आपकी अर्थव्यवस्था और संवैधानिक निर्णयों में इसका योगदान केवल गति अवरोधक का होगा। हो सकता है कि जब आप किसी समस्या से जूझ रहे हों, उसी समय इसका कर्तव्यबोध प्रबल हो। देखने वालों को प्रतीत होगा कि यह पूरी निष्ठा के साथ आपके लोकतंत्र की रक्षा कर रहा है, परंतु इसे स्वयं यह ज्ञान भी नहीं होगा कि वह हित कर रहा है या अहित। इन सारे गुणों को देखते हुए इसका एक ही नाम मुझे उचित प्रतीत होता है "विपक्ष"।

© - प्रशांत सेठ

Monday, May 11, 2020

माँ तुझे सलाम

सर पर उम्मीदों का सूरज
अधरों पर खिलती मुस्कान
देखो हाथ थामे कल का
तनकर चल रहा वर्तमान

अभावों की इस टोकरी में
शेष बहुत से सपने हैं
बांध लिए आँचल में उसने
भाव हृदय में जितने हैं

हंसती है लाली चेहरे की
राह की उड़ती धूल पे
रीझ गई है खुद ही डाली
अपने खिले फूल पे

दुनिया भर के अवरोधों से
राह ना उसकी रुक पाएगी
देखना इसके सपनों को
एक दिन मंज़िल मिल जाएगी

वो जननी है उसके आगे
आसमान भी झुक जाते हैं
एक दिवस उमड़ी श्रद्धा से
ऋण नहीं ये चुक पाते हैं

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, May 6, 2020

मद्य-प्रीति

डेढ़ माह का संयम आखिर
एक तलब में टूट गया
मदिरा के प्रिय आकर्षण में
राष्ट्र का वंदन छूट गया

अर्थशास्त्र ने पांसे फेके
धर्म द्यूत पे वार गए
अपनों के प्रति निष्ठारत थे
लेकिन संयम हार गए?

निष्फल हुई राम कथाएं
मर्यादा के पाठ भुलाए
मद्य की लहरों में हाये
गीता के सब श्लोक बहाए

रोक ना पाई ममता तुमको
ना रसोई की ही पुकार
ऐसे बंधन तोड़ के भागे
धन्य हो तुम हे पालनहार

पल भर का जो होश मिले तो
सोचो किस पथ चलते हो?
संस्कार अपने ही तजकर
भला किसे तुम छलते हो?

किए सदा अर्थ को अर्पित
तुमने जीवन मूल्य सभी
राजधर्म से चूके तुम भी
हे कौटिल्य के स्वप्न ऋषि

तुम्हें राष्ट्र का रथ सौंपा है
सारथी धर्म निभा पाओगे?
सिद्धांतों को ऐसे तज कर
विश्वगुरु की विभा पाओगे?

स्वप्न राष्ट्र गौरव के जिसके
सदा नेत्र में पलते हैं
सुनो सारथी, वर्तमान क्या
युग उसके पीछे चलते हैं

© - प्रशांत सेठ

Monday, April 27, 2020

बुद्धम शरणं गच्छामि। धम्मं शरणं गच्छामि। संघं शरणं गच्छामि।

बुद्धम शरणं गच्छामि - आध्यात्मिकता
धम्मं शरणं गच्छामि - धार्मिकता
संघं शरणं गच्छामि - साम्प्रदायिकता

लेख लंबा है परंतु आज के समय मे व्याप्त आध्यात्मिकता/धार्मिकता/साम्प्रदायिकता के भ्रम को चिह्नित करने का प्रयास है। इस लेख का संबंध लेखक के ज्ञानी अथवा आध्यात्मिक होने से ना जोड़ा जाए, क्योंकि यह अनेक विद्वजनों और मनीषियों से प्राप्त जानकारियों के आधार पर है।

1. आध्यात्मिकता - बुद्धम शरणं गच्छामि

अध्यात्म आपके भीतर का जगत है और आध्यात्मिकता इसी अंतर्जगत की यात्रा का नाम है। आध्यात्मिकता वही है जो बुद्ध को विलास के महलों की परिधि से दूर दुर्गम वन की ओर ले जाती है। इस ज्ञान यात्रा का लक्ष्य उस सत्य की खोज है जो खुली आँखों से नहीं देखा जा सकता। कोई इसे आत्मतत्व के बोध की, तो कोई नश्वर-अनश्वर के भेद की तो कोई ईश्वरीय स्वरूप को जानने की यात्रा कहता है। अतः बंद आँखों से ध्यानावस्था में बैठकर ज्ञान की प्राप्ति और अपने स्वरूप का बोध आध्यात्मिक व्यक्ति का लक्ष्य होता है। अपनी पहचान से पलायन करने को आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं कहते। बल्कि अपनी छोटी सी पहचान को उस विराट में समाहित करने का नाम आध्यात्मिकता है। यदि सांसारिक पहचान मिट गई है तो द्वंद भी समाप्त हो गया होगा, और यदि जीवन में द्वंद शेष है तो अभी आध्यात्मिकता अपूर्ण है।आध्यात्मिक व्यक्ति का ना कोई मित्र होता है ना शत्रु। ज्ञान ही मित्र है और अज्ञान ही उसका शत्रु है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब अपूर्ण आध्यात्मिक व्यक्ति आँख खोलता है और सामने यथार्थ को खड़ा पाता है। ज्ञान को उपलब्ध होकर जो कुछ नश्वर या अज्ञान के रूप में जाना, वही सामने संसार बनके खड़ा है। यहाँ इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि जो कुछ भी परिवर्तन हुआ है वह आपकी अंतर्दृष्टि में है, बाहर जगत में नहीं। बाह्य जगत को आपके भीतरी परिवर्तन और ज्ञान से क्या सरोकार? मात्र अपने अज्ञान का नाश कर लेना, किसी अन्य पर कोई उपकार नहीं है। यह कर्म का जगत है और प्राप्त ज्ञान की सार्थकता तभी है जब वह कर्म के रूप में सबके लाभ का विषय बने। यहीं से धर्म की उत्पत्ति होती है।

2. धार्मिकता - धम्मं शरणं गच्छामि
इस संसार के प्रति आपके कर्तव्य का नाम ही धर्म है; जैसे कि एक पिता, पति अथवा पुत्र के रूप में पारिवारिक धर्म, या जीविकोपार्जन के लिए व्यावसायिक धर्म, समाज के प्रति सामाजिक धर्म, राष्ट्रीय धर्म या प्रकृति के प्रति प्राकृतिक (मानव) धर्म। वास्तविक आध्यात्मिक व्यक्ति अपने समक्ष अनेक अज्ञानियों को भी पाता है तो घृणा नहीं, सहानुभूति रखता है। यदि वास्तव में थोड़ा बहुत भी बोध जागा होगा तो इस सत्य से भली भांति परिचित होगा कि अज्ञानियों में भी उसी का अंश है, जिस चेतना अथवा आत्मा का दर्शन उसने अपने भीतर किया है। और इस बात की भी स्वीकृति होगी कि बोध होने से पहले वह स्वयं भी अज्ञानी ही था। ऐसे में एक सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति, अत्यंत धैर्य के साथ सामाजिक चेतना के उत्थान हेतु कर्म में प्रवृत्त हो जाता है। तब धर्म ही बुद्ध को सघन वन से लौटाकर समाज में वापस ले आता है; जो कुछ पाया है, उसको बांटने। अतः भीतर से वास्तविक आध्यात्मिक व्यक्ति आपको कार्मिक रूप से धार्मिक प्रतीत होता है।

कर्म के द्वारा जब सामाजिक चेतना को जागृत करने कोई तत्वज्ञानी प्रवृत्त होता है तो निश्चित रूप से उसका सामना अज्ञान के वशीभूत, लोभ, भय और मोह से ग्रस्त, अधर्म में प्रवृत्त व्यक्तियों से होता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि कर्मयोगियों ने, सामाजिक धर्म के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करने वाले अधर्मियों से, शास्त्र अथवा शस्त्र के बल पर धर्म युद्ध भी लड़े हैं। चीन अथवा अन्य उत्तरपूर्व देशों में बौद्ध संतों भिक्षुकों में प्रचलित मार्शल आर्ट क्या इस बात का प्रमाण नहीं है। महाभारत हो या कर्बला की जंग, ईसाइयों के क्रूसेड या गुरु गोविंद सिंह जी का खालसा, सभी संप्रदायों में धर्मयुद्ध के प्रमाण हैं। यह समाज और राष्ट्र के उत्थान के लक्ष्य लेकर चलने वाले धार्मिक व्यक्ति और निजी स्वार्थ में लिप्त अधार्मिक व्यक्ति के बीच निरंतर चलने वाला संघर्ष है।

3. सांप्रदायिकता - संघं शरणं गच्छामि
सम्प्रदाय अथवा पंथ (हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, इत्यादि) का जन्म तब होता है जब अपनी विशेष उपासना पद्धतियों और मान्यताओं को लेकर कुछ लोग संगठित होते हैं। ईश्वर तक पहुंचने के या सत्य को जानने के अनेक मार्ग बताए गए हैं। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से किसी ना किसी सम्प्रदाय का होता ही है। उसको अपनी रुचि के मार्ग पर चलने का अधिकार भी है। यहाँ तक कि अनीश्वरवादी सम्प्रदाय का होने का भी अधिकार है। इसमें कोई बुराई नहीं है जब तक एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय को कष्ट नहीं देता, या अपनी मान्यताओं को दूसरों पर थोपने का प्रयास नहीं करता। जितने भी महात्माओं ने इस धरा पर जन्म लिया, और तत्कालीन संप्रदायों में प्रचलित कुरीतियों का विरोध किया, तो उनके अनुयायियों ने एक नया सम्प्रदाय बना लिया। यहाँ विशेष रूप से गौर करने वाली एक बात ये भी है कि किसी सम्प्रदाय अथवा धारणा का विरोध करते करते भी आप एक नए सम्प्रदाय को जन्म दे देते हैं। अतः स्वीकार करें या ना करें, प्रत्येक व्यक्ति साम्प्रदायिक भी होता है। इस सत्य से पलायन करके कोई समस्या नहीं सुलझने वाली। इसे स्वीकार करना ही समस्या के हल की दिशा में पहला कदम होगा।

अपनी मान्यताओं के प्रति दृढ़ होने में कोई बुराई भी नहीं है। आपकी प्रतिबद्धता अपने सम्प्रदाय के प्रति होनी ही चाहिए। परंतु यदि आप अपने सम्प्रदाय के सच्चे हितैषी मित्र हैं, तो उसमें व्याप्त कुरीतियों और ऐसी मान्यताओं का विरोध करें जो दूसरों के कष्ट का कारण बनती हों और मानव धर्म के विरुद्ध हों। सार ये है कि आपके सांप्रदायिक होने में कोई बुराई नहीं है, परंतु आप अपने सम्प्रदाय से कृष्ण जैसी मित्रता रखिये, कर्ण जैसी नहीं; जिससे कि सम्प्रदाय के पतन और तदुपरांत विनाश को रोका जा सके।

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, April 22, 2020

प्रेम गली अति सांकरी ...

विराट समुद्र की गोद में
तैरती हुई एक छोटी सी मछली
ढूंढती है समुद्र का अस्तित्व
जैसे माँ की कोख में अंगड़ाई लेता जीवन
प्रश्न करता हो
माँ के ही अस्तित्व पर

और थककर एक दिन
छोटी सी मछली करती है घोषणा
"धर्म अफीम है"
और "ईश्वर एक अंधविश्वास"

उधर समुद्र सोच रहा है...
अपने अस्तित्व को सिद्ध करने
मुझे करना होगा खुद से अलग
इस प्यारी सी खूबसूरत मगर जिद्दी मछली को
लेकिन अपनी जीत से अधिक प्रिय है
मुझे इसका जीवन

और तब नकार कर खुद ही खुदको
समर्पण की कोख से
जन्म लेता है संसार में
विराट प्रेम
मगर अदृश्य और निराकार

© - प्रशांत सेठ

Friday, April 17, 2020

अनुरागी

मन भंवरे के भीतर जागा, मेरे जब जब राग
दुनिया के पुष्पों से पाया, मैंने बहुत पराग

प्रकृति से देखा जुड़कर तो
राग हुए उत्पन्न
अंतहीन अनुबंध में पड़कर
थे सब लोग विपन्न

मन सारथी अश्व इंद्रियां
जीवन का ये रथ
जन्म जन्म तक चलकर देखा
आसक्ति के पथ

इच्छाओं के वृक्ष थे झुलसे, देह के हिस्से आग
एक दिवस तो थम ही जानी, थी ये भागम भाग

हाथ मोह से छुड़ाके देखा
जिस दिन शिव की ओर
वैरागी ने पकड़ा दी तब
वैराग्य की डोर

ज्ञान सारथी अश्व थे चिंतन
लौकिक ना थी चाह
एक झलक उस क्षण देखी
मैंने विरक्ति की राह

पतझर पहले उतरा, तब उतरा जीवन में फाग
मन के भीतर जागा था तब, तुझसे ही अनुराग

दृश्यमान इस जगत को देखा,
देखा दृष्टा बनके
अपने इसके उसके भीतर
अंदर तू ही मन के

गुंजित थी मुरली की धुन
उसके मन कानन में
विष भी अमृत बन कर उतरा
तब मीरा के तन में

कर्म ज्ञान के पथ पे चलकर, मिला राग-वैराग
पथिक चलो अब भक्ति मार्ग पर, जागेगा वीतराग

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, April 8, 2020

शर्म निरपेक्ष

तबलीगियों, जिहादियों के समर्थक एक कलम के बेईमान शायर को समर्पित मुक्तक ...

बहर में लिख लिख के बहरे हो गए
आदमी के कितने चेहरे हो गए
मरहूम यूँ इंसानियत भी हो गई
अल्फ़ाज़ पे मज़हब के पहरे हो गए
----------------------------

और ये सच्चे मगर मौन सेक्युलरों को चेतावनी भी, क्योंकि वो नहीं जानते वो क्या नहीं कर रहे। छद्म और एक-पक्षीय सेक्युलरों को कोई चेतावनी नहीं, क्योंकि वो हमेशा से जानते हैं वो क्या कर रहे हैं ...

नफरत फैली, तो आएंगे ज़द में सच्चे भी
बहन बेटी माँ बूढ़े जवां और बच्चे भी
रोक लो तुम खुद ही वहाँ मज़हबी जहालत
इधर मज़हबी ना हो जाएं कई अच्छे भी

© - प्रशांत सेठ