किसी पद विहीन नेता की तरह आवारा घूमते उस कुत्ते पर मुझे तरस आ गया। सभी जीवों में ब्रह्म की उपस्थिति की बात मुझे धार्मिक चिंतन की घुट्टी में जन्म से ही पिलाई गई थी। ये अलग बात है कि विषधरों के ब्रह्मतत्त्व को स्थूल दृष्टि से देख पाना बहुत कठिन जानकर, मैंने ब्रह्म को उसके हाल पर छोड़कर आगे बढ़ जाना ही हमेशा श्रेयस्कर समझा था। मगर उस आवारा कुत्ते की निरीह आँखों में से शायद उसके ब्रह्म ने ही मेरे भीतर के ब्रह्म को कॉल किया होगा। तभी तो सनातनी दया भाव ने जोर मारा।
मैंने श्रीमतीजी को आवाज़ लगाई और निवेदन किया कि मेरे और अपने हिस्से का एक एक वोट इसको दे देते हैं। माफ कीजिये वोट नहीं, रोटी कहना चाहता था मगर लॉक डाउन में सोशल मीडिया पर ज्यादा समय देने का परिणाम है कि बुद्धि में राजनीति के विषाणु प्रवेश कर गए हैं। श्रीमतीजी भी मेरी तरह से सनातनी परंपरा से हैं, मगर है तो पत्नी ही। इसलिए थोड़े बहुत औपचारिक ना-नुकुर के बाद मान गईं। हालांकि उन्होंने मुझे चेताया भी कि अब ये रोज़ आने लगेगा।
मैंने सुना है कि पत्नी की बात को ब्रह्माजी भी नहीं काट सकते, लिहाजा वही हुआ जो भविष्यवाणी उन्होंने कर दी थी। अब वह कुकुर कुलदीपक अपने हिस्से की मुफ्त की सब्सिडी लेने रोज आने लगा था। उसके लिए अब चार रोटी सुबह शाम मेरे गाढ़े पसीने की कमाई में से बनने लगी थीं। यहाँ मैं आपको स्पष्ट कर दूँ के समस्त आवश्यक वस्तुओं को क्रय करते समय दिए गए GST के अलावा आयकर, गृहकर, जल कर, इत्यादि देने के पश्चात भी यदि आपके बटुए में कुछ बच पाता है, तो उसे ही शास्त्रों में गाढ़े पसीने की कमाई कहा गया है। यदि आपके बटुए के भाग्य में यह सुख नहीं है तो आपकी संतुष्टि के लिए ही भगवद गीता में यह श्लोक कहा गया है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकमज़्णि॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 47)
अर्थात तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर अधिकार पहले देश की सरकार का है, उसके पश्चात ईश्वर नाम की किसी बड़ी सरकार का।
कुछ ही सप्ताह में स्थिति यह थी कि सब्सिडी, क्षमा कीजियेगा, रोटी मिलने में विलंब उसे बर्दाश्त नहीं था। और अब उसने स्थायी डेरा मेरे घर के द्वार पर बना लिया था। उसको देख देख कर मेरे पालक होने के अहंकार को तृप्ति भी मिल रही थी।
यह सच है कि सृष्टि में स्वाभिमान नाम की कोई चीज़ भी सृष्टा ने रची थी। संभवतः उसी की वजह से कभी कभी कर्तव्यबोध भी जागता है। वरना इस देश में जीने के लिए अधिकार बोध का होना ही पर्याप्त है। कदाचित ऐसी ही कोई क्रांति उस कुकुर कुलदीपक के जीवन में घटी हो। कर्तव्यबोध के चलते उसने हर राह चलते व्यक्ति से अपनी प्रकृति जन्य वाणी और मातृभाषा में वार्तालाप शुरू कर दिया था। पड़ोसियों ने उक्त कृत्य को "भौंकने" का नाम दिया था।
शीघ्र ही पड़ोस के वकील साहब के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय डेलीगेशन आपत्ति लेकर मुझसे मिलने आया। मैंने उन्हें अवगत कराया कि मेरे घर की रक्षा के तहत भौंकने का अधिकार इसको संविधान देता है। उन्होंने मुझे इतिहास दर्शन के माध्यम से समझाया कि अक्सर संविधान की छोटी सी चूक से राष्ट्रों के भूगोल बिगड़ जाया करते हैं। इसलिए आप अपनी इस सैन्य शक्ति को लाइन ऑफ कंट्रोल के अंदर रख लीजिए, यही आपके लोकतंत्र के अच्छे स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगा। प्रेम की अपेक्षा तर्कसंगत बात व्यक्ति को जल्दी समझ में आती है। लिहाजा सबकी राय से मैंने उसे अपनी घर की संसद में एक बोरी बिछाकर उचित स्थान दे दिया। अब वह हमारा निर्वाचित प्रतिनिधि बन चुका था और भौंकलाहट का लोकतांत्रिक अधिकार उसे प्राप्त हो गया था।
वकील साहब अनुभवी व्यक्ति थे। एक दिन उन्होंने कहा सेठजी, आप इसको समय समय पर बांध कर भी रखा कीजिये, क्योंकि यह मित्र और शत्रु के भेद को नहीं समझता है। यह आपके हर मित्र को और उसके प्रत्येक कृत्य को भी शक की दृष्टि से ही देखेगा। किसी दिन काट भी सकता है, यही इसका धर्म है। आपके यहाँ इसकी अराजकता के चलते फॉरेन इन्वेस्टर तो छोड़िए, आपके अपने मित्र भी आने से कतराने लगेंगे। और तो और कहीं इसके मित्र-मित्राणियों ने आना शुरू कर दिया तो जनसंख्या बढ़ते देर नहीं लगेगी। तब इतनी सी सब्सिडी से काम नहीं चलेगा। अतः आप कोई पार्ट टाइम काम भी बढ़ा लीजिए। वरना आपकी अर्थव्यवस्था बिगड़ते देर नहीं लगेगी और घर का सारा लोकतंत्र ढह जाएगा।
मैं वकील साहब की अनुभवी दृष्टि का कायल हो गया था। मैंने उन्हें प्रणाम किया और निवेदन किया कि जब आपने इतना किया है तो एक कृपा और कर दीजिये। अब आप ही इसका नामकरण भी कर दीजिए। उन्होंने कहा कि इस कुकुर कुलदीपक के स्वभाव को देखते हुए मैं ये जानता हूँ कि, अपने कुत्तत्व के अहम की संतुष्टि के लिए और कर्तव्यबोध के दबाव में, इसकी कार्यप्रणाली तो बदलने से रही। यह समय समय पर आपकी शांति भंग करके, अपने जीवित होने का प्रमाण देता रहेगा। आपकी अर्थव्यवस्था और संवैधानिक निर्णयों में इसका योगदान केवल गति अवरोधक का होगा। हो सकता है कि जब आप किसी समस्या से जूझ रहे हों, उसी समय इसका कर्तव्यबोध प्रबल हो। देखने वालों को प्रतीत होगा कि यह पूरी निष्ठा के साथ आपके लोकतंत्र की रक्षा कर रहा है, परंतु इसे स्वयं यह ज्ञान भी नहीं होगा कि वह हित कर रहा है या अहित। इन सारे गुणों को देखते हुए इसका एक ही नाम मुझे उचित प्रतीत होता है "विपक्ष"।
© - प्रशांत सेठ