Tuesday, January 21, 2020

शंखनाद

विद्वता के अधरों पे है
अधर्म सभा ने मौन जड़ा
फिर पाञ्चजन्य फूँको केशव
प्रतीक्षा में धर्म खड़ा

कुरुवंश के सत्ता मोह में
उपवन में आ गिद्ध डटे
ज्ञान नहीं है जिन्हें धर्म का
नकली सारे सिद्ध जुटे

चीर पर माँ भारती के
अहंकार ने पग धरा
फिर पाञ्चजन्य ....

कर्तव्य का गांडीव त्याग
सामर्थ्य आज हताश क्यों?
पार्थ के संकल्प को बांधे
भावुकता बाहुपाश क्यों?

धर्म-अधर्म के बीच निर्णय
असमंजस में क्यों पड़ा?
फिर पाञ्चजन्य ....

निज स्वार्थ में धर्मपथ से
हुआ च्युत जब राजवंश
युगों युगों तक मानवता ने
झेला उसका है विषदंश

आज भी तो प्रश्न वही
समक्ष राष्ट्र के पुनः खड़ा
फिर पाञ्चजन्य ....

सुनियोजित शनैः शनैः
किया नष्ट वेद भाष को
षडयंत्रों ने दिया प्रश्रय
संस्कृति के विनाश को

बूंद बूंद से कलिकाल ने
पाप का भर दिया घड़ा
फिर पाञ्चजन्य ....

नवनिर्माण के शौर्य रथ की
थाम सकेगा रास कौन?
तुम ही हो सारथी जिसके
बाहर विध्वंस भीतर मौन

शस्त्र शास्त्र के संगम का
तुमने ही दृष्टांत गढ़ा
फिर पाञ्चजन्य फूँको केशव
प्रतीक्षा में धर्म खड़ा

© - प्रशांत सेठ




Wednesday, January 15, 2020

मकरसंक्रांति

सम्पूर्ण मानवता को सनातन संस्कृति की शुभकामनाएं देता पर्व 🙏🏼

मुझे नहीं पता
तुम्हारे इस राशि से उस राशि में
प्रवेश का अर्थ
मगर, हे सूर्यदेव!
मैं देख रहा हूँ
माँ नर्मदा की गोद में
सर्द मौसम को पिघलते हुए

काश पिघल जाए इसी के साथ
संबंधों के पहाड़ पर पसरी
बर्फ सी सफेद चादरें
अहंकार की

इच्छाओं की पतंगे
खूब छुएँ आसमान
मगर बंधी रहें
सिद्धांतों की डोर से

ज्ञान का उदित सूर्य
मुक्त करे अस्तित्व को
माया के संक्रमण से
हम करें दान
अज्ञान से संचित सारे संग्रह

मुक्त हो जाए ये बूँद
पृथकता के संकल्प से
कर सके समर्पण
उस शाश्वत सागर की
अनंत गहराई में

छूट जाएं आज
शरशैया पर लेटे जीवन की
हठीली भीष्म प्रतिज्ञाएं
और मानवता हो चले मुक्त
अधर्म के पाश से

© - प्रशांत सेठ

Saturday, December 7, 2019

रुक जाना नहीं ...

राह बड़ी हो मुश्किल
हो दूर नज़र से मंजिल
ऊँची-नीची डगर से
यूँ ना तुम डरो
ओ दूर के मुसाफिर, तुम चलना शुरू करो

मिले ना कोई साथ
बढ़े ना कोई हाथ
तन्हाई पर रंज
ज़रा भी ना करो
चेहरे हों अनजाने, तुम मिलना शुरू करो

हवाओं में ज़हर हो
निगाहों में कहर हो
इस मौसम की ज़रा भी
ना परवाह तुम करो
ओ मासूम सी कली, तुम खिलना शुरू करो

ताक़तवर हो दुश्मन
कमज़ोर होता हो मन
लड़ने से पहले ही
यूँ हथियार ना धरो,
ओ कलयुग के अर्जुन, तुम लड़ना शुरू करो

हौसले कड़े हों
फलक से बड़े हों
मृत्यु से पहले ही,
क्योंकर तुम मरो,
ओ नीड़ परिंदे, तुम उड़ना शुरू करो

© - प्रशांत सेठ


Saturday, October 26, 2019

चॉक एंड डस्टर

तुमने देखा होगा
दुनिया लिखती है
तुम्हारे मन के ब्लैकबोर्ड पर
अपना अपना गणित

समय की सफेद चॉक
छोड़ जाती है बहुत से निशान
अनुभव के
और धीरे धीरे यही निशान
बन जाते हैं "जीवन दर्शन"

बस इतना करना
अगली कक्षा में जाने के पहले
मिटाते जाना हर एक निशान
प्रेम के डस्टर से

शून्य से शून्य तक
सृष्टि का विस्तार और सिमटना
निर्भर है तुम्हारी कला पर
क्या सौंप सकोगे वापस?
मन का ब्लैकबोर्ड
ज्यों का त्यों, कोरा ही

जीवन के स्कूल में
बुद्धत्व के पाठ से उपजा
एक प्रश्न

© - प्रशांत सेठ

Friday, October 25, 2019

गुरु भजन

गुरु की वाणी में कल कल
धार गंगा सी बहती है
चारों वेद अठारह पुराण की
बात यहीं तो रहती है

सतयुग में हरिश्चंद्र ने
गुरु को ही सर्वस्व दिया
त्रेता में रामचंद्र ने फिर
मर्यादा को प्रशस्त किया

द्वापर की तो बात कहें क्या
केशव की बलिहारी है
गुरु का ध्यान धरे हृदय में
स्वयं कृष्ण मुरारी है

कलिकाल का नर्तन देखो
धर्म कहाँ विलुप्त हुआ
लोभ विलास में पड़े मानव
ज्ञान भी ऐसा सुप्त हुआ

पापों का है वेग प्रचंड
बुद्धि इनसे हारी है
गुरु चरणों की सेवा ही
इस युग में तारणहारी है

किस दिशा में चलते हम हैं
लक्ष्य का हमको ज्ञान नहीं
सत्य को क्या जानें जबकि
स्व का हमको भान नहीं

परम सत्य के पथ पर उसकी
चलने की तैयारी है
गुरु शरण मे रहकर जिसने
दृष्टि भीतर उतारी है

अहं अपना कर समर्पित
गुरु चरणों को लीजे थाम
पथ का आनंद ना रोके तो
दूर नहीं है परम धाम

भक्ति भाव से श्रद्धा जिसने
गुरु पर अपनी वारी है
उसकी नैया भवसागर की
लहरों से कब हारी है?

© - प्रशांत सेठ

Thursday, October 24, 2019

!!सावधान!!

मैं बहुत समझाता हूँ मगर
तर्क करती है
अब नहीं बहलती किताबी ज्ञान से
समझने लगी है यथार्थ

मैं समझाता हूँ प्रेम
तो करती है प्रश्न अस्तित्व पर
प्रेम के लिए अनिवार्य है अस्तित्व

मैं समझाता हूँ
"अहिंसा परमो धर्म:"
कहती है
"धर्म हिंसा तथैव च:"

मैं समझाता हूँ "वसुधैव कुटुम्बकम"
वह कहने लगी है
"धर्मो रक्षति रक्षितः"

मैं जगाना चाहता हूँ
श्रद्धा और विश्वास
वो दिखाती है
इतिहास के आईने में
पीठ पर निशान "विश्वासघात" के

मैं सुनाता हूँ किस्से, देता हूँ दिलासा
पाप बढ़ने पर, ईश्वर के अवतार के
कहती है, अवतरित है सदा से
मेरे भीतर मेरा ईश्वर

मैं बहुत समझाता हूँ मगर
अब नहीं आती छलावे में
"धर्म निरपेक्ष" जैसे छद्म शब्दों के

सावधान!
अब यह मेरे बस की बात नहीं
तुम्हारी भी जिम्मेदारी हो चली है
मेरी "सहिष्णुता"
अब सयानी हो गई
जवाब देने लगी है

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, October 22, 2019

गाड़ी वाला आया, घर से कचरा निकाल

घर के बाहर
गीला-सूखा कचरा समेटे
दो डस्टबिन, हरे और नीले
बैठे रहते हैं तुम्हारी प्रतीक्षा में
मेरे घर की पवित्रता, ऋणी है तुम्हारी

लेकिन
हृदय की दहरी के भीतर
मेरे मन का गीला-सूखा कचरा
अब भी गंधाता है समाज को
इसे नहीं ले जाता कोई गाड़ीवाला

काश!
हमेशा खुला रहे
हमारी समझ का द्वार
हमारी दृष्टि जाए
अहं के दरवाजे से बाहर
हमारे मन का हो विस्तार
स्वार्थ की चौखट के उस पार भी
हमारे हृदय में समा जाए
क्षितिज के इस छोर से उस छोर तक
समूचा संसार

तब शायद
हम भी करने लगें प्रबंध
अपने नकार का

मैंने सुना है
कुछ लोग बना लेते हैं
मन के गीले-सूखे कचरे से खाद
फिर उगाते हैं फूल, जीवन की बगिया में
और महक जाता है उनका घर
भीतर भी, बाहर भी

© - प्रशांत सेठ