विद्वता के अधरों पे है
अधर्म सभा ने मौन जड़ा
फिर पाञ्चजन्य फूँको केशव
प्रतीक्षा में धर्म खड़ा
कुरुवंश के सत्ता मोह में
उपवन में आ गिद्ध डटे
ज्ञान नहीं है जिन्हें धर्म का
नकली सारे सिद्ध जुटे
चीर पर माँ भारती के
अहंकार ने पग धरा
फिर पाञ्चजन्य ....
कर्तव्य का गांडीव त्याग
सामर्थ्य आज हताश क्यों?
पार्थ के संकल्प को बांधे
भावुकता बाहुपाश क्यों?
धर्म-अधर्म के बीच निर्णय
असमंजस में क्यों पड़ा?
फिर पाञ्चजन्य ....
निज स्वार्थ में धर्मपथ से
हुआ च्युत जब राजवंश
युगों युगों तक मानवता ने
झेला उसका है विषदंश
आज भी तो प्रश्न वही
समक्ष राष्ट्र के पुनः खड़ा
फिर पाञ्चजन्य ....
सुनियोजित शनैः शनैः
किया नष्ट वेद भाष को
षडयंत्रों ने दिया प्रश्रय
संस्कृति के विनाश को
बूंद बूंद से कलिकाल ने
पाप का भर दिया घड़ा
फिर पाञ्चजन्य ....
नवनिर्माण के शौर्य रथ की
थाम सकेगा रास कौन?
तुम ही हो सारथी जिसके
बाहर विध्वंस भीतर मौन
शस्त्र शास्त्र के संगम का
तुमने ही दृष्टांत गढ़ा



