पिताजी अंधे हैं
लोग कहते हैं वो विद्वान हैं
मेरी कमियों से मगर अनजान हैं
मुझपर गर्व उन्हें हर क्षण है
उनका पुत्र दुनिया में विलक्षण है
नहीं देखते, मेरे मन पे जमी काई को
नहीं देखते, मुझमें किसी बुराई को
पिताजी निश्चित अंधे हैं
पिताजी बुरे हैं
वो छुड़ा लेते हैं मेरा हर सामान
मेरी पीड़ा सारी, मेरे दुःख तमाम
और छुपा ले जाते हैं मुझसे
अपने अकेलेपन की हर शाम
खुद का कोई सपना नहीं सजाते हैं
मेरे हर सपने को अपना बताते हैं
पिताजी वाकई बहुत बुरे हैं
पिताजी लापरवाह हैं
अनुराग में डूबे इतने हैं मगन
खो दिया यूँ ही सारा जीवन
तमाम उम्र खिलौने सहेजने में
खुद बिखरे हमें समेटने में
तिनका तिनका हमें जोड़ती गईं
उनकी इच्छायें दम तोड़ती गईं
पिताजी बेहद लापरवाह हैं
पिताजी बेपरवाह हैं
उनकी अपनी कोई सूरत नहीं है
उन्हें दर्पण की ज़रूरत नहीं है
अपने काव्य में ज्यूँ खुदको ढूँढ़ता कवि
खुुुश होते हैं देखकर, मुझमें अपनी छवि
लोग कहते हैं वो विद्वान हैं
मेरी कमियों से मगर अनजान हैं
मुझपर गर्व उन्हें हर क्षण है
उनका पुत्र दुनिया में विलक्षण है
नहीं देखते, मेरे मन पे जमी काई को
नहीं देखते, मुझमें किसी बुराई को
पिताजी निश्चित अंधे हैं
पिताजी बुरे हैं
वो छुड़ा लेते हैं मेरा हर सामान
मेरी पीड़ा सारी, मेरे दुःख तमाम
और छुपा ले जाते हैं मुझसे
अपने अकेलेपन की हर शाम
खुद का कोई सपना नहीं सजाते हैं
मेरे हर सपने को अपना बताते हैं
पिताजी वाकई बहुत बुरे हैं
पिताजी लापरवाह हैं
अनुराग में डूबे इतने हैं मगन
खो दिया यूँ ही सारा जीवन
तमाम उम्र खिलौने सहेजने में
खुद बिखरे हमें समेटने में
तिनका तिनका हमें जोड़ती गईं
उनकी इच्छायें दम तोड़ती गईं
पिताजी बेहद लापरवाह हैं
पिताजी बेपरवाह हैं
उनकी अपनी कोई सूरत नहीं है
उन्हें दर्पण की ज़रूरत नहीं है
अपने काव्य में ज्यूँ खुदको ढूँढ़ता कवि
खुुुश होते हैं देखकर, मुझमें अपनी छवि
कवि-कविता के बीच कोई नहीं होता
अपने काव्य के वो स्वयं ही हैं श्रोता
पिताजी दुनिया से बेपरवाह हैं
पिताजी नासमझ हैं
मेरा नजरिया ही उनकी दृष्टि है
मेरी दुनिया ही उनकी सृष्टि है
ईश्वर पिता है या पिता ही ईश्वर स्वरूप
वो सृजन करते रहे, मेरी इच्छा के अनुरूप
मेरी दुनिया ही उनकी सृष्टि है
ईश्वर पिता है या पिता ही ईश्वर स्वरूप
वो सृजन करते रहे, मेरी इच्छा के अनुरूप
उनकी अपनी कोई मंज़िल, कोई रास्ता नहीं है
उन्हें दुनिया में किसी से वास्ता नहीं है
पिताजी समझते नहीं हैं
पिताजी नरम गरम हैं
वक़्त की धूप में खुद तपते हैं
मुझको तो शीतल मगर लगते हैं
मेरे सफर में वो हौसलों का पाँव हैं
मेरी थकन को बरगद की छाँव हैं






