Sunday, June 16, 2019

पिताजी

पिताजी अंधे हैं
लोग कहते हैं वो विद्वान हैं
मेरी कमियों से मगर अनजान हैं
मुझपर गर्व उन्हें हर क्षण है
उनका पुत्र दुनिया में विलक्षण है
नहीं देखते, मेरे मन पे जमी काई को
नहीं देखते, मुझमें किसी बुराई को
पिताजी निश्चित अंधे हैं

पिताजी बुरे हैं
वो छुड़ा लेते हैं मेरा हर सामान
मेरी पीड़ा सारी, मेरे दुःख तमाम
और छुपा ले जाते हैं मुझसे
अपने अकेलेपन की हर शाम
खुद का कोई सपना नहीं सजाते हैं
मेरे हर सपने को अपना बताते हैं
पिताजी वाकई बहुत बुरे हैं

पिताजी लापरवाह हैं
अनुराग में डूबे इतने हैं मगन
खो दिया यूँ ही सारा जीवन
तमाम उम्र खिलौने सहेजने में
खुद बिखरे हमें समेटने में
तिनका तिनका हमें जोड़ती गईं
उनकी इच्छायें दम तोड़ती गईं
पिताजी बेहद लापरवाह हैं

पिताजी बेपरवाह हैं
उनकी अपनी कोई सूरत नहीं है
उन्हें दर्पण की ज़रूरत नहीं है
अपने काव्य में ज्यूँ खुदको ढूँढ़ता कवि
खुुुश होते हैं देखकर, मुझमें अपनी छवि
कवि-कविता के बीच कोई नहीं होता
अपने काव्य के वो स्वयं ही हैं श्रोता
पिताजी दुनिया से बेपरवाह हैं

पिताजी नासमझ हैं
मेरा नजरिया ही उनकी दृष्टि है
मेरी दुनिया ही उनकी सृष्टि है
ईश्वर पिता है या पिता ही ईश्वर स्वरूप
वो सृजन करते रहे, मेरी इच्छा के अनुरूप
उनकी अपनी कोई मंज़िल, कोई रास्ता नहीं है
उन्हें दुनिया में किसी से वास्ता नहीं है
पिताजी समझते नहीं हैं

पिताजी नरम गरम हैं
वक़्त की धूप में खुद तपते हैं
मुझको तो शीतल मगर लगते हैं
मेरे सफर में वो हौसलों का पाँव हैं
मेरी थकन को बरगद की छाँव हैं
जिसकी ज्योति से चन्द्रमा देदीप्यमान है
मेरी चमक के पीछे, वो सूर्य के समान हैं
पिताजी मेरी ऊर्जा हैं

© - प्रशांत सेठ


Sunday, June 9, 2019

धर्म

वेद पुराण गीता कुरान
शायद फिर से पढ़ना होगा
धर्म वही नई दृष्टि से अब
कदाचित फिर से गढ़ना होगा

निंदा करना सरल है किंतु
निंदा का यह सूत्र तो मानें
वंदित को जानें ना जानें
निंदित को अवश्य पहचानें

प्रकाश को समझना है तो
गहरे तम को पढ़ना होगा

मैं बड़ा हूँ, वह छोटा है
मन ने कितने वहम हैं पाले
मेरा कथन ही अंतिम सत्य है
बुद्धि पर ये अहं के ताले

दुनिया से क्या जूझ रहे हो
पहले खुद से लड़ना होगा

अपनी समझ का नित विस्तार
ना करे वो छात्र नहीं है
ग्रहण करो या करो निस्तार
ज्ञान बड़ा है, पात्र नहीं है

जड़ता के जो पोषक, उनको
ठहरे जल सा सड़ना होगा

मन शैतान मन फरिश्ता
मानव तेरा मर्म यही है
जीव का जीवों से रिश्ता
जो बतला दे धर्म वही है

करुणा के धागे से सबको
एक सूत्र में जुड़ना होगा

वेदों में विज्ञान को देखा
कुरान में शिव का स्वरूप
बहुत गहन है अगर मानो तो
कण कण है उसका ही रूप

अर्ध सत्य स्वीकार किया तो
भ्रम में फिर फिर पड़ना होगा

मुक्त होने को तत्पर मन हो
जब अपनी ही ग्रंथियों से
सनातन सत्य की राह चलना
मोह ना रखना पंथियों से

अज्ञात को पाना चाहो तो
ज्ञात से आगे बढ़ना होगा

© - प्रशांत सेठ


Sunday, May 26, 2019

एक गमला बचपन

मैं देखा करता था उसे
पीठ पर मन भर बस्ता लाद कर
स्कूल से लौटते हुए
फिर मन में बस्ता भर ख्वाहिशें देकर
नंबरों के पीछे दौड़ाते हुए तुम
उसे चढ़ा आते थे
कोचिंग सेंटर की सीढ़ियाँ

शिक्षा के कारखाने में
जमा की थीं तुमने
उसकी शरारतें, मासूमियत, जीवन की खुशबू
शाम ढले जब घर लौटता था
तब उसकी समझ पर लगा होता था
तुम्हारी पसंद का रंगीन चश्मा

एक दिन
वो लाया था खोदकर कहीं से गीली मिट्टी
बालकनी की मुंडेर पर
करीने से सजे हुए गमलों में भरने
उसने कहा था
इसमें पापा की पसंद के फूल खिलेंगे
उसकी समझ की कच्ची मिट्टी में
तुमने बो दिए थे चुपके से
अपनी नाकाम हसरतों के बीज

लेकिन अक्सर
ज़रा सी आँधी में उखड़ जाती हैं
कमज़ोर जड़ें
ज़रा से धक्के में गिरकर बिखर जाते हैं
बालकनी की मुंडेर पर सजे हुए गमले
तुम्हारी ख्वाहिशों की तीसरी मंजिल पर
टंगा हुआ बचपन भी
झुलस गया उस दिन, यथार्थ की आग में
तुमने सिखाया था उसे
सिर्फ और सिर्फ ऊपर बढ़ना

शायद तुमने सुना हो
तीसरी मंज़िल से
मौत की गोद में छलांग लगाते हुए
वो गमला, कह रहा था
"पापा, इस बार तुम भूल गए लेकिन
फिर कभी जब वक़्त गिराए मुझे ऊँचाई से
तुम खड़े रहना नीचे
मुझे थाम लेना
मैं टूट कर बिखरने से बच जाऊँगा
तुम्हारी पसंद के फूल खिलाऊँगा
शायद अगली बार"

© - प्रशांत सेठ


Sunday, March 10, 2019

युद्ध - कब किसके विरुद्ध?

इस देश में युद्ध के पश्चात ही बुद्ध पैदा हुए हैं। हमने अधर्म के कीचड़ में सदैव प्रेम के कमल खिलाये हैं। परंतु शांति और सौहाद्र के संदेश के बीच हिंदुस्तान की मूल संस्कृति भी विश्व को स्मृत रहे।

अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च: |
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एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

जिन हाथों ने थामी मुरली
जिन अधरों पर सजा संगीत
जिन आँखों में बसा प्रेम था
जिस हृदय में गुंजित गीत

एक सुर में रोम रोम फिर
क्यों बोला था क्रुद्ध अब हो?
एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

मर्यादा की जहाँ द्रौपदी
पंच तत्व का था वो गाँव
पंचेंद्रियाँ लीन कर्म में
हठ व दंभ का अड़ा था पाँव

कह उठा पुरुषार्थ भी तब
बहुत हुआ के शुद्ध अब हो
एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

निर्जन वन की पंचवटी में
छल लांघे जब लक्ष्मण रेखा
मन की पवित्रता को हरने
कुत्सित भावों में हो एका

ज्ञान संयम तप त्याग तब
कहा करते हैं बुध्द अब हो
एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

समक्ष अधर्म के मौन धरकर
वनवासों में फिरता पांडव
निकलता जब आनंद मठ से
सन्यासी भी करता तांडव

अतिक्रमण हो संस्कृति पे
धर्म यही ये सिद्ध अब हो
एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

अधिकार कैसा अशक्त को
कायर को ना सुहाए प्रीत
जहाँ शौर्य की गाथा ना हो
वहाँ प्रेम के कैसे गीत

नई पौध को उर्वर धरती
देकर तुम प्रबुद्ध अब हो
एक समय वह भी था जब
कहा कृष्ण ने युद्ध अब हो

© - प्रशांत सेठ


Friday, March 8, 2019

एक अपूर्ण कविता

स्त्री क्या है
और क्या नहीं
शायद वो खुद भी नहीं जान पाई
इसलिए होती रही परिभाषित
कवि से, उपासकों से
और शोषकों से

ईश्वर भी स्वयं की तलाश में
रच बैठा संसार
और होता रहा परिभाषित
ज्ञानियों से, उपासकों से
और शोषकों से

"मैं"
साध्य को साधन समझ
उलझा हूँ आज भी
अपने अनुरूप
एक नई परिभाषा गढ़ने में

© - प्रशांत सेठ


Saturday, March 2, 2019

एक बूँद की अभिलाषा

कविता क्या है?
शायद उद्गम से अंत तक
बहते हुए जीवन में
टकराते प्रश्नों के उत्तर की खोज

एक दिन मैंने पूछ लिया
बहती हुई नदी से...
दो पाटों के बीच प्रवाह का
इन पाटों के होने का
और होकर भी ना मिलने का रहस्य?

उसने कहा
किसी एक पाट को हटाकर देख लो
प्रवाह रुक जाता है
दिशा बदल जाती है
तुम बिखर जाते हो

मैंने जाना
नीति में पक्ष-विपक्ष का
जीवन में सुख-दुःख का
ज्ञान में सत्य-असत्य का
कर्म में धर्म-अधर्म का महत्व

दृश्य क्या है?
शायद देख लेना
महासागर में समाहित बूँद को
किसी ताप के प्रभाव से उड़ते हुए
और कभी कभी
मेघ बनकर पुनः बरसते हुए
मैंने जाना 
सृष्टि के अनवरत क्रम को

दर्शन क्या है?
शायद बंद आँख से झाँक लेना
नदी की गहराई में
और देख लेना
दोनों पाटों को मिलते हुए
जो कभी अलग थे ही नहीं
मैंने जाना
प्रकृति संपूर्ण है सदा से

कर्म क्या है?
शायद जान लेने के पश्चात भी
किसी बूँद का प्रवाह में रहना
प्यासों की प्यास बुझाने
मैंने जाना
इस धरा पर संतों के, ज्ञानियों के
और गुरु के होने का रहस्य

कवि क्या है?
शायद वही जो करता है युगों से
अपने छोटे से बर्तन में
बहती हुई नदी को भरने का प्रयास

© - प्रशांत सेठ
 

Friday, March 1, 2019

ठेठ वाणी - 1

यूँ तो मैं व्यक्ति आधारित राजनीति का पक्षधर नहीं हूँ, क्योंकि स्थायी समाधान के लिए विचार का स्थापित होना जरूरी है। परंतु ये भी सत्य है कि दृढ़ विचारों का वाहक दृढ़ व्यक्तित्व ही होता है। अंतर केवल इतना है कि व्यक्ति की एक उम्र होती है, परंतु विचार अमरत्व का वरदान लिए होते हैं, जो सृष्टि के अंत तक साथ चलते हैं। व्यक्तियों के पीछे चलने वाली उन्मादी भीड़ से आप विचारों का वाहक बनने की आशा नहीं कर सकते। इसलिए जो लोग व्यक्ति से प्रेम करते हैं, उनकी अपेक्षा मुझे वे लोग अधिक प्रिय हैं जो उस व्यक्तित्व के विचारों से प्रेम करते हैं और अपनाते हैं।

इस देश ने दस साल तक महा मौन रखा था। किसी की मृत्यु पर दो मिनट का मौन रखा जाता है, परंतु तब तो लोकतंत्र की मृत्यु हुई थी। ये निश्चित है कि इस महा मौन के बाद वाक तूफान तो आना ही था। ये प्रकृति का नियम है। ये भी उतना ही निश्चित है कि तूफान के बाद शांति होगी। व्यक्ति केवल निमित्त है।

लोग कह रहे हैं कि शहीदों की शहादत को वोट अर्जन का साधन बना लिया गया है। निश्चित ये दुःखद है; परंतु वोट तो जनता देती है; तो क्या विपक्षी ने भी चुपके से मान लिया कि युद्ध से वोट मिलेंगे? हाँ क्योंकि वो जानते हैं, वोट युद्ध को नहीं, दृढ़ता को मिलेंगे। इससे पहले भी जनता ने 1971 के बाद दृढ़ता को ही चुना गया था। आतंकवाद ने कुकर्म पहले भी किए हैं, परंतु उसकी नाक में नकेल बहुत वर्षों पश्चात डाली गई है।

दूसरा पहलू ये भी है कि कोई जवानों की लाश पर राजनीति कर रहा है तो कोई मासूम नागरिकों की लाश पर करता रहा। चाहे वो कश्मीर में हिंदुओं की हत्या और पलायन हो, या गोधरा हो, या मुम्बई अटैक, इत्यादि हो।

बुद्ध के देश में युद्ध किसी को प्रिय नहीं होता। परंतु ये बात नकारी नहीं जा सकती के आतंकवाद के जरिये विश्व पर आधिपत्य की कामना लिए एक वर्ग विशेष युद्ध को ही धर्म समझ रहा है। तब हमारे भीतर के बुद्ध को युगों तक जीवित रखने के लिए जंग का नाम ही महाभारत है। जिसका सिद्धांत मात्र इतना है कि आने वाली पीढ़ियों को शांति उपलब्ध कराने के लिए, शांतिप्रिय लोगों का जीवित रहना आवश्यक है। अतः बाहर चल रहे युद्ध का भीतर की शांति से गहरा संबंध है, प्रबुद्ध लोगों के जीवन में। मानवता, अहिंसा, दया, निष्ठा को मजबूत काँधों पर ही ढोया जा सकता है। पिलपिली जिव्हा पर ये गुण बहुत दूर नहीं जा सकते। मगर तुम यही करते रहे; कदाचित इसीलिए गाँधी के इस अहिंसात्मक और सत्यवादी देेश ने जितनी हिंसा, बेईमानी और मक्कारी का अनुुुभव किया हैै, उतना विश्व में शायद ही किसी और राष्ट्र ने किया हो। ध्यान रहे, प्रकृति भी कोमल बीजों को कठोर आवरण प्रदान करती है।

- प्रशांत सेठ