Tuesday, June 13, 2017

व्यंगबाण

हमारे व्यंगकार मित्र हैं शिरीष गोंटिया उर्फ़ उजड्ड जी। सत्य सिर्फ कड़वा ही नहीं उजड्ड भी होता है। ये अनुभव मैंने इनको देखकर ही प्राप्त किया है। इनकी महान सूक्तियों की व्याख्या करने का पुनीत कार्य मेरे जिम्मे है। अब देखिये ये तो सुबह सुबह का मॉर्निंग प्रवचन देकर निकल लेते हैं, परंतु भक्तों की जिज्ञासा को शांत करने के लिये व्याख्या मुझे करनी पड़ती है।

"व्यंग्यकार को शारीरिक रूप से पर्याप्त स्वस्थ होना चाहिए, आलोचक को कवि से अधिक कसरती होना चाहिये।"

- स्वामी उजड्डा नन्द

व्याख्या

बुद्धिजीवियों और संतों में एक बड़ा फर्क होता है। संतो के वचन व्यर्थ नहीं होते क्योंकि वो अनुभव की कोख से जन्म लेते हैं। जबकि बुद्धिजीवियों का ज्ञान टेस्ट ट्यूब बेबी की तरह नियंत्रित वातावरण में जन्म लेता है। बुद्धिजीवियों का ज्ञान यथार्थ के संघर्षों से मुक्त होकर जन्म लेता है और डार्विन के सिद्धांत को मुँह चिढ़ाकर; युगों तक जीवित रहने के उद्देश्य से, जीवन में नहीं सिर्फ किताबों में उतरना चाहता है।

स्वामीजी कहते हैं की व्यंग और आलोचना के शब्दबाण दूर से ही चलाये जाने चाहिये। धनुष की प्रत्यंचा को तान कर बाण छोड़ने के लिये, लक्ष्य से एक न्यूनतम दूरी रखना आवश्यक होती है। लक्ष्य जब करीब होता है तो धनुर्धारी को स्वयं उससे दूर जाकर वार करना चाहिये, वरना धनुष को त्याग कर मल्लयुद्ध की योग्यता भी रखनी चाहिये। इतिहास साक्षी है कि महारानी द्रौपदी द्वारा छोड़े गये व्यंग्यबाण की अंतिम परिणीति भीमसेन और दुर्योधन का मल्लयुद्ध ही था।

सर्वविदित है कि धनुर्धारी की वीरता का आँकलन उसके लक्ष्य की शक्ति से किया जाता है। अत: ये निश्चित है की सफल व्यंगकार अथवा आलोचक का लक्ष्य सदैव तगड़ा और समर्थ होना चाहिये। आपकी हैसियत हो ना हो, थलसेनाध्यक्ष को गरिया देने मात्र से आप एक सफल आलोचक की पदवी प्राप्त कर सकते हैं। व्यंगविधा में पारंगत स्वामी उजड्डा नन्द जी अपने अनुभव से बताते हैं कि जब बाण निशाने पर लगता है तो ताली बजाने वाले असंख्य प्रशंसक होते हैं। परंतु जब व्यंगकार रुपी द्रौपदी की मर्यादा अथवा आलोचक रुपी शिशुपाल का जीवन खतरे में पड़ता है, तब आज के युग में कोई भीमसेन अथवा दुर्योधन मदद के लिये आगे नहीं आता। तब माफ़ी माँगते हुये बयान भी वापस लेना पड़ जाता है। अतः व्यंगकार और आलोचक का शारीरिक रूप से स्वस्थ और कसरती होना भी उतना ही अनिवार्य है।

भक्त वत्सल स्वामी उजड्डा नन्द जी की प्रेरणा से ही मार्क ज़करबर्ग, आदि ने मुख पुस्तक, वॉट्सएप्प, ट्विटर आदि का सोशल प्लेटफार्म तैयार किया। इस मंच पर चढ़कर छोटे से छोटा धनुर्धारी भी बड़े से बड़े लक्ष्य पर, दूर से ही निशाना साध सकता है। प्रशंसकों के लाइक्स की गिनती करके स्वयं को स्थापित व्यंगकार भी घोषित कर सकता है। परंतु आभासी दुनिया के अपने दुष्परिणाम भी होते हैं। सोशल मीडिया पर निरंतर अभ्यास के चलते व्यंगकार और आलोचकों के अंगुष्ठ के अतिरिक्त शेष शरीर दुर्बल ही रह जाता है। तब मल्लयुद्ध की योग्यता उनमे नहीं रह जाती। अतः ऐसे अंगुष्ठबली वीरों के लिये स्वामीजी सलाह देते हैं कि वे सोशल मीडिया से बाहर आने का प्रयास ना करें। प्रशंसकों के प्रलोभन अथवा विरोधियों की ट्रॉलिंग के प्रति समदर्शी भाव रखें और इस मायाजाल में ना फँसें।

संतों में एक विशेष गुण ये भी होता है कि उनकी कथनी और करनी एक होती है। उनका आचरण भी उनके व्याकरण के अनुरूप ही होता है। स्वामी उजड्डा नन्द जी के प्रिय मित्र हैं सत्येंद्र रावत जी। स्वामीजी उनपर और उनकी काल्पनिक राजनीतिक पार्टी पर निशाना साध के निरंतर अभ्यास (नेट प्रैक्टिस) करते रहते हैं। रावत जी के कसरती शरीर को ध्यान में रखते हुये, स्वामीजी ने वॉट्सएप्प से बाहर दर्शन ना देने की कसम खा रखी है। स्वामीजी के व्यंगबाणों के कायल बहुत से प्रशंसकों और घायल बहुत से विरोधियों को आज तक उनके दर्शन नसीब नहीं हुये। यहाँ तक की अपने प्रिय शिष्य प्रशांत सेठ जी को भी उन्होंने बहुत दिनों से, अपने दर्शनों से वंचित रखा है। ऐसे संतों को नमन करने से हमारा और आपका जीवन धन्य हो जाता है।

तो बोलो व्यंग शिरोमणि, आलोचना वीर, दर्शन दुर्लभ श्री श्री 1008 स्वामी उजड्डा नन्द जी की जै

© - प्रशांत सेठ

Friday, June 9, 2017

मेरे देश की धरती

हवा में उड़ता हुआ
एक पत्थर आया
मेरी कॉर्पोरेट सरकार के
शीशे से टकराया
फिर धूल झाड़कर उठा
हौले से मुस्कुराया
पूछा तो परिचय उसने
कुछ यूँ बताया
खेत से उठता एक
सियासी तूफान हूँ
भाईसाहब, मैं कर्ज में दबा हुआ
देश का किसान हूँ

बोला, आप जानते हैं
किसान क्या होता है?
वही जो धरती के सीने पर
श्रम का हल होता है
आज की भूख दबाकर
कल की रोटी बोता है
फिर पसीने से उसे सींचकर
अच्छे दिन की बाट जोहता है
उम्मीद की टूटी खाट पर
जागता ना सोता है
और फसल आने पर पहले से
ज़्यादा गरीब होता है

हम कलमकारों की नीयत
हमेशा साफ़ होती है
हमारी मासूमियत भरी जिज्ञासा
हरदम माफ़ होती है
बुद्धिजीवियों के सवाल
बड़े पवित्र रहते हैं
इस बात को कोई और नहीं
स्वयं बुद्धिजीवी कहते हैं
मैंने डरते डरते पूछा
क्या आप और वो आपस में
रिश्तेदार सगे हैं?
जो पत्थर कश्मीर से आकर
दिल्ली को लगे हैं?

बोला, वो भी एक प्रकार के
परिश्रमी किसान हैं
फर्क इतना है कि उनके
भरे हुये खलिहान हैं
जिन्होंने देश की छाती पर
बँटवारे का हल चलाया है
जनमानस के ह्रदय में
नफरत का बीज लगाया है
सींचने के नाम पर
मासूमों का खून बहाया है
आज उनके परिश्रम से देखो
आतंकवाद लहलहाया है

सियासत ही हम दोनों को
जन्म देती आयी है
आपने ठीक पहचाना
वो मेरा सगा भाई है
आज उसी की प्रेरणा से
हम देश को जला रहे हैं
भोपाल से दिल्ली तक
किसी का रास्ता बना रहे हैं
अभी तो बहुत से मगरमच्छ
अश्कों की गंगा में बहायेंगे
हमारे काँधों पर चढ़कर
राजधानी तक जायेंगे
और हम जहाँ खड़े हैं वहीँ
खड़े खड़े मर जायेंगे

शास्त्रीजी ने हम को
जय किसान कहा था
तब किसान का ये अर्थ
किसी को पता कहाँ था?
हिंसक औलाद जनने से
एक माँ भी डरती है
शायद इसलिये आज बाँझ
हो चली ये धरती है
अपनी भूमि छोड़कर
पलायन को मजबूर है
गाँव का किसान आज
शहर में मज़दूर है

मैं सोच रहा हूँ,
हर उफान के पीछे
एक पीड़ा होती है
और हर पीड़ा पर इस देश में
राजनीतिक क्रीड़ा होती है
क्योंकि सियासत की दुनिया में
ये सिद्धांत खूब चलता है
फिर नहीं ऊगता वो सूरज
जो एक बार ढलता है
वो दिल्ली के मेले में गुम
होने से डरती है
सियासत तभी तो उन्माद का
हाथ थामकर चलती है

© - प्रशांत सेठ

Friday, June 2, 2017

त्रिशंकु

राख में दबी दबी सी
इक चिंगारी क्यों है?
तू अगर वैरागी है तो
मन संसारी क्यों है?

जैसे शाख का एक पंछी
आस करे नील गगन की
फिर नीड़ से प्रश्न करे वो
संग सोहबत में पवन की
एक परिंदे की तुझसे ये
नातेदारी क्यों है?
तू अगर...

उड़ने वाले जल्दी क्या है
मन कहता है और रुक ले
इन पाँखों का सौदा करके
पिंजरे का ही दाना चुग ले
तू अम्बर का राही है तो
मन व्यापारी क्यों है?
तू अगर...

इस असीम नभ की सीमा
है संशय कि हो ना हो
चल नीड़ के भीतर देखें
कदाचित कोई कोना हो
जहाँ मन से पूछ सके तू
व्यग्रता भारी क्यों है?
तू अगर...

प्रश्न खुद ही ले आयेगा
अपना उत्तर तेरे पास
कुआँ भी आता है चलकर
कभी कभी प्यासे के पास
इसी ठौर पे ठहर मन तू
पथ-पुजारी क्यों है?
तू अगर...

झाँक लिया निज अंतस में
जब अपने ही दृगकोर से
देह नीड़ से बँधा परिंदा
देख लिया मन की डोर से
क्या पूछना अब किसी से
मन मदारी क्यों है?
तू अगर...

© - प्रशांत सेठ

Monday, May 22, 2017

पद-अर्थ विज्ञान

मैंने सुना है
अत्यधिक दाब में
कोई भी ठोस पदार्थ
बन जाता है द्रव
शायद इसीलिए
पिघल जाता है अक्सर
मजबूत से मजबूत इंसान
और बह पड़ते है कभी कभी
आँखों के रस्ते
पाषाण ह्रदय भी

विज्ञान के इस सिद्धांत को
मानता है शायद
अर्थशास्त्र भी
तभी तो भूख के दाब में
पसीने सी पिघलकर
जब बहती है
एक मज़दूर की देह
तब बढ़ती है समाज में
तरलता
अर्थात लिक्विडिटी

मैंने सुना है
और अधिक दाब में
द्रव भी उड़ जाता है
भाप बनकर
तभी तो
एक अंतराल के बाद
स्वार्थ के नीचे दबे
समाज का
मर जाता है पानी
और सूख जाते हैं
ज़रूरतों के दाब में
गरीब के आँसू

अफसरशाही भी समझती है
विज्ञान के इस नियम को
और दबा लेती है
मुआवजे की फ़ाइल
तब भाप बन उड़ जाती है
क़र्ज़ में दबे किसान की आशा
शहीद की विधवा के सपने
उसके बच्चों का भविष्य
फिर समय के साथ
ओझल हो जाती है शहादत
हमारी दृष्टि और स्मृति पटल से
किसी सरकारी रिकॉर्ड में
सदा के लिये
दफ़न होने

इस वैज्ञानिक सिद्धांत को
खूब समझता है समाज
शायद इसलिये
दबा लेता है संवेदनायें
तब उड़ जाती है
भाप बनकर मानवता
बहुत सूक्ष्म होता है
ये परिवर्तन
नहीं दिखता कोरी आँख से
समाज से होता
इंसानियत का वाष्पीकरण

मैं सोच रहा हूँ
इसी सिद्धांत पर
चलती होगी नियति
जब कूटती है
जीवन की ओखली में
वक़्त की मूसल से
हमारा अहंकार
इतना महीन कि
निकल सके बाहर
छद्म आवरण के बारीक
भ्रम रुपी छिद्रों से
बह जाये तरल रूप में
आँख से
या उड़ जाये किसी दिन
धुआँ बनकर
मन के पात्र से

© - प्रशांत सेठ

Monday, May 15, 2017

भज गोविन्दम् तज संदेशम्

व्यक्ति को भज लेना किन्तु विचार को कभी मत भजना। अन्यथा जीवन में तिरस्कार और क्षोभ के अतिरिक्त कुछ प्राप्त ना होगा।

संसार में चिरकाल से नेतृत्व दो ही प्रकार के रहे हैं, विचारवादी और लक्ष्यवादी। किन्तु राजनेता एक ही प्रकार के पाये जाते हैं, लक्ष्यवादी। यहाँ इस बात पर बहस नहीं हो रही कि किसका विचार सही और किसका गलत। वो विचारवादियों का आंतरिक मसला है और किसी के अंदरूनी मामले में दखल देना हमारे हिंदुस्तानी संस्कारों में नहीं है। इसी संस्कार के तहत हम पडोसी के घर में लगी आग को उनका अंदरूनी मामला बताकर कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं।

बहरहाल विचारवादी किसी विचार को लेकर संघर्ष करते हैं और लक्ष्यवादी किसी लक्ष्य को लेकर। यानि की विचारवादियों का उद्देश्य यदि विचार की स्थापना होता है तो लक्ष्यवादियों का उद्देश्य होता है लक्ष्य की प्राप्ति। यह लक्ष्य येन केन प्रकारेण स्वयं को स्थापित करने और स्थापित रखने का होता है। विचारवादी परोक्ष रूप से अपने विचार के साथ खड़ा दिखता है और लक्ष्यवादी भी परोक्ष रूप में ही खड़ा दिखता है मगर किसी मुद्दे के साथ। कृपया भ्रमित ना हों, मुद्दे के साथ खड़ा होना और हल के साथ खड़े होने में फर्क है। चूँकि हमारे और आपके जैसे समर्थक किसी विचार के ही हो सकते हैं और सफलता भी समर्थकों पर ही निर्भर करती है, लिहाजा लक्ष्यवादियों को भी अस्थायी रूप से भेड़ की खाल रुपी एक विचार तो ओढ़ना ही पड़ता है। वो विचार सेकुलरिज्म, राष्ट्रवाद, जातिवाद, आपवाद कुछ भी हो सकता है।

यहाँ मैं आपको स्पष्ट कर दूँ की समर्थक किस चिड़िया का नाम होता है। समर्थक वह विश्वासु जीव होता है जो किसी विचार विशेष की स्थापना का स्वप्न देखता है और उसके लिए व्यक्ति विशेष को स्थापित करने में जी जान लगा देता है। व्यक्ति के स्थापित होते ही, विचार को स्थापित मानकर वह स्थापित व्यक्ति के समर्थन में सोशल मीडिया पर सक्रीय हो जाता है। अब जब नेता दो प्रकार के होते हैं तो समर्थक भी दो ही प्रकार के होते हैं, भक्त और अंधभक्त। और जो इन दोनों में से कोई नहीं होता वो जनता होती है। अंधभक्त एक ही प्रकार का होता है। समर्थन के एग्रीमेंट के तहत वो अपने नेतृत्व से प्रोग्रेस रिपोर्ट नहीं माँगता।

किन्तु भक्त दो प्रकार के होते हैं, जागरूक और स्वार्थचुक (नया शब्द है, मैंने भी पहली बार सुना है अपने मुँह से)। जागरूक अर्थात वो जो व्यक्ति के स्थापित होते ही समय समय पर प्रोग्रेस रिपोर्ट माँगते हैं। ये लक्ष्यवादी नेतृत्व के आचरण में उसके ही वक्तव्य को ढूँढने की भूल कर बैठते हैं और प्रथम चरण में ही अलग अलग तरीकों से सिस्टम से बाहर कर दिये जाते हैं। तदुपरांत उन्हें यह बोध होता है कि व्यक्ति की स्थापना और विचार की स्थापना दोनो अलग बातें हैं।

दूसरे प्रकार के भक्त कहलाते हैं स्वार्थचुक, अर्थात वो जिनका स्वार्थ चुकते ही उनकी भक्ति भी चुक जाती है। ये लेखा जोखा (हिस्सा माँगने से पूर्व माँगे जाने वाला आय व्यय का ब्यौरा) माँगने का दुस्साहस करते हैं। ये अलग अलग राजनीतिक दलों में अलग अलग नामों से पाये जाते हैं। ये द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, आदि चरणों में स्टेप बाय स्टेप बाहर किये जाते हैं। कालान्तर में, ये विलंब से जागने वाले स्वार्थचुक समर्थक, उसी गति को प्राप्त करते हैं, जिस गति को साहित्य जगत में एक चौपाये विशेष द्वारा धोबी के समर्थक होने की दशा में प्राप्त किया जाता है।

एक ओर जहाँ अंधभक्तों को सत्ता की नज़दीकी का भ्रम रहता है वहीँ भक्तों को ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान का वृद्धावस्था से बड़ा गहरा सम्बन्ध है। अतः ज्ञान प्राप्त होते होते भक्तगण राजनैतिक रूप से वृद्धावस्था को प्राप्त हो चुके होते है। इस बीच स्थापित व्यक्ति के भक्तों की नई फसल ऊग चुकी होती है। अब आप प्रकृति को अपना काम करने से तो नहीं रोक सकते ना।

आप सोच रहे होंगे कि सेठ जी इतने लंबे व्याख्यान के माध्यम से आखिर कहना क्या चाहते हैं? तो मैं आपको बता दूँ कि सेठ जी सोच रहे थे की भगवान ने सतयुग से लेकर कलयुग तक कई अवतार लिए, पैगम्बर भी भेजे और पुत्र भी भेजा। अनेक प्रतिनिधि संत भी सदा से विचरण कर रहे हैं। फिर भी यह संसार पतनोन्मुख क्यों है? शायद इसलिए की वही गलती अवतरित शक्तियों ने भी की। ये सभी व्यक्ति विशेष की स्थापना कर के निकल लिए। अब देखिये ना, लंका में विभीषण, हस्तिनापुर में पांडव, इत्यादि। इसके बाद ना तो कोई फीडबैक रिपोर्ट ली गई ना प्रोग्रेस रिपोर्ट। मैनेजमेंट की इस बड़ी चूक के कारण धर्म स्थापना का सिद्धांत कुछ दिन तक चला हो तो पता नहीं लेकिन आज तो...?? प्रोग्रेस रिपोर्ट लेना वो भूल गए या उन्हें मिली नहीं, इस विषय में कहीं उल्लेख नहीं मिलता। इतिहास में व्यक्ति के स्थापित होने के बाद का उल्लेख कम ही मिलता है। कदाचित इसलिए की इतिहास रचियता भी वही लोग हैं जो उक्त काल में स्थापित हुये थे।

सार ये है मित्रो, भाइयो और बहनो; यदि आप भी किसी नमो, सर जी या रागा को स्थापित करके प्रोग्रेस रिपोर्ट की उम्मीद लगाये हैं, तो आइये और राजनीतिक बुद्धत्व प्राप्त करने के लिए, मेरी तरह चुपचाप लाइन में खड़े हो जाइये।

- ठेठ वाणी

Thursday, May 11, 2017

पत्थर के सनम

दुष्यंत कुमार जी ने कहा था...

"कौन कहता है आसमाँ में सुराख नहीं होता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो"

लेकिन ज्ञान यदि गलत कानों में पड़ जाये तो दुरूपयोग की सम्भावना बढ़ जाती है और परिणाम वही होता है जैसे पाकिस्तान के हाथ में परमाणु बम। अब देखिये ना, यही शेर एक कश्मीरी पत्थर ने सुन लिया। फिर क्या, वही हुआ जिसका डर था। वह पूरी तबियत से उछलता हुआ आया और एक सुराख कर गया हमारी अखंडता में। सफलता एक ऐसी चीज़ है जो हमेशा दूसरों को प्रेरित करती है। लिहाजा एक पत्थर की सफलता देखकर बहुत से पत्थरों ने उछलना शुरू कर दिया। आज हमारी अखंडता के आसमान में सुराख ही सुराख हैं।

आजादी को बरस हो गए हैं सत्तर
लेकिन बरसना बंद नहीं हुये पत्थर
मैंने अपनी अस्मिता पर उछाले गए
उस पत्थर से पूछा
तू किधर से आया है, तुझे किसने उछाला है?
यूँ ही बड़ा हो गया या किसी ने पाला है?

बोला, मुझे नहीं पता
तुम्हारी उनकी किस बात पे ठनी है
ये परंपरा तो यहाँ बरसों की बनी है
मैं मुफ़्त में बदनाम हूँ बिना बात के
मैं तो इशारे पर चलता हूँ किसी हाथ के
नहीं मालूम ठिकाने पे हैं या खिसके हैं
इन हाथों के पीछे दिमाग किसके हैं

फिर मैंने हौले से एक हाथ को थामा
और पूछ ही लिया खरामा खरामा
बोला, हम तो निरंकुश और आज़ाद हैं
पके हुए फोड़े का बहता हुआ मवाद हैं
इतिहास की गलती से उपजा हुआ विवाद हैं
आप की ख़ामोशी से भड़कता उन्माद हैं

तब मैंने उन्माद से पूछा क्या चाहते हो?
क्यों मासूम नौजवानों को बहकाते हो?
बोला, हम तो जूनून का बहता एक दरिया हैं
मनुष्य की मूढ़ता के प्रदर्शन का जरिया हैं
हमने ऊँगली पकड़ी, सर चढ़ते चले गए
तुमने रोका नहीं तो हम बढ़ते चले गए

मैं सोच रहा हूँ,
ये कायरता है या हमारा मिजाज़ ही नर्म है
यदि खून में बाकी थोड़ी सी भी शर्म है
ईंट का जवाब पत्थर, पत्थर का पहाड़ से
सिंहपुत्र का परिचय तो होता है दहाड़ से
अहिंसा का त्याग करो, यही वीर का कर्म है
उन हाथों को काट दो, अब यही राष्ट्रधर्म है

हे सत्ताधारी हे राष्ट्र ऋषि
तुम मूक होकर क्यों देख रहे हो
सैनिक की कीमत पर सियासती
रोटियाँ क्यों सेक रहे हो
तुम रोक नहीं रहे पत्थर तो यकीन मानो
वो तुम ही हो जो फेक रहे हो

© - प्रशांत सेठ

Saturday, May 6, 2017

न्याय???

निर्भया कहो या मुझे दामिनी
मैं तुम्हारी वही लाडो
जिससे कभी तुम मिल नहीं पाये
क्योंकि
तुमने देखा ही नहीं
नज़र उठा के आस पास
दम तोड़ती हैं
कितनी निर्भयायें।

सुना है
तुमने मुझे न्याय दिया है
किन्तु
मैं तो जा चुकी हूँ
पाने और खोने की परिधि से
बहुत दूर
न्याय मुझको नहीं
शायद तुमने दिया है खुदको
मेरी कीमत पर लेकिन
आज भी अधूरा सा

मृत्यु देकर
सिर्फ अपराधी को
मुक्त नहीं हो सकते तुम
अपने दायित्व से
चार विषैले फल
तोड़ देने से
इन्साफ नहीं होगा पूरा
सोचो
इस वृक्ष की जड़ कहाँ है
बीज कहाँ है
कौन देता है इसको पोषण
कैसे ऊग आते हैं ये झाड़
सभ्य समाज की धरा पर

ये उगते हैं तब
जब तुम्हें फुरसत नहीं होती
अपनी भूख से,
नहीं नहीं हवस से
फिर ये पनप जाते हैं
पोषित होकर
इसी दूषित वातावरण से
बढ़ जाते हैं बेतरतीब
बिना किसी नियम के
क्योंकि
तुम नहीं कर सके
अपने हिस्से की बारिश

न्याय करना है यदि
थोड़ी सी फाँसी दो
उन माता पिता को
जो नहीं देते
अपनी संतान को कुछ भी
सिवाय उत्पत्ति के
थोड़ी सी फाँसी दो
उस साहित्य और कला को
जो परोस देते हैं
समाज में नग्नता
और बताते हैं खुदको
समाज का दर्पण

थोड़ी सी फाँसी दो
उस शराब को
जिसे पीकर
मनुष्य मनुष्य नहीं रहता
थोड़ी सी फाँसी दो
उस अपराधिक वयस्क मन को
जो छुपा बैठा है
किसी नाबालिग देह में
लेकिन
सबसे पहले फाँसी दो
अपनी मूकदर्शिता को
जो देती है जन्म भी
और साहस भी
इन अपराधों को

बोलो
क्या तुम न्याय कर सकोगे?
दे सकोगे मृत्युदंड
बीज को
जड़ को और वृक्ष को
या फिर तुम्हारे भीतर ही कहीं
छुपकर बैठे
एक नाकारा माली को...??

© - प्रशांत सेठ