हमारे व्यंगकार मित्र हैं शिरीष गोंटिया उर्फ़ उजड्ड जी। सत्य सिर्फ कड़वा ही नहीं उजड्ड भी होता है। ये अनुभव मैंने इनको देखकर ही प्राप्त किया है। इनकी महान सूक्तियों की व्याख्या करने का पुनीत कार्य मेरे जिम्मे है। अब देखिये ये तो सुबह सुबह का मॉर्निंग प्रवचन देकर निकल लेते हैं, परंतु भक्तों की जिज्ञासा को शांत करने के लिये व्याख्या मुझे करनी पड़ती है।
"व्यंग्यकार को शारीरिक रूप से पर्याप्त स्वस्थ होना चाहिए, आलोचक को कवि से अधिक कसरती होना चाहिये।"
- स्वामी उजड्डा नन्द
व्याख्या
बुद्धिजीवियों और संतों में एक बड़ा फर्क होता है। संतो के वचन व्यर्थ नहीं होते क्योंकि वो अनुभव की कोख से जन्म लेते हैं। जबकि बुद्धिजीवियों का ज्ञान टेस्ट ट्यूब बेबी की तरह नियंत्रित वातावरण में जन्म लेता है। बुद्धिजीवियों का ज्ञान यथार्थ के संघर्षों से मुक्त होकर जन्म लेता है और डार्विन के सिद्धांत को मुँह चिढ़ाकर; युगों तक जीवित रहने के उद्देश्य से, जीवन में नहीं सिर्फ किताबों में उतरना चाहता है।
स्वामीजी कहते हैं की व्यंग और आलोचना के शब्दबाण दूर से ही चलाये जाने चाहिये। धनुष की प्रत्यंचा को तान कर बाण छोड़ने के लिये, लक्ष्य से एक न्यूनतम दूरी रखना आवश्यक होती है। लक्ष्य जब करीब होता है तो धनुर्धारी को स्वयं उससे दूर जाकर वार करना चाहिये, वरना धनुष को त्याग कर मल्लयुद्ध की योग्यता भी रखनी चाहिये। इतिहास साक्षी है कि महारानी द्रौपदी द्वारा छोड़े गये व्यंग्यबाण की अंतिम परिणीति भीमसेन और दुर्योधन का मल्लयुद्ध ही था।
सर्वविदित है कि धनुर्धारी की वीरता का आँकलन उसके लक्ष्य की शक्ति से किया जाता है। अत: ये निश्चित है की सफल व्यंगकार अथवा आलोचक का लक्ष्य सदैव तगड़ा और समर्थ होना चाहिये। आपकी हैसियत हो ना हो, थलसेनाध्यक्ष को गरिया देने मात्र से आप एक सफल आलोचक की पदवी प्राप्त कर सकते हैं। व्यंगविधा में पारंगत स्वामी उजड्डा नन्द जी अपने अनुभव से बताते हैं कि जब बाण निशाने पर लगता है तो ताली बजाने वाले असंख्य प्रशंसक होते हैं। परंतु जब व्यंगकार रुपी द्रौपदी की मर्यादा अथवा आलोचक रुपी शिशुपाल का जीवन खतरे में पड़ता है, तब आज के युग में कोई भीमसेन अथवा दुर्योधन मदद के लिये आगे नहीं आता। तब माफ़ी माँगते हुये बयान भी वापस लेना पड़ जाता है। अतः व्यंगकार और आलोचक का शारीरिक रूप से स्वस्थ और कसरती होना भी उतना ही अनिवार्य है।
भक्त वत्सल स्वामी उजड्डा नन्द जी की प्रेरणा से ही मार्क ज़करबर्ग, आदि ने मुख पुस्तक, वॉट्सएप्प, ट्विटर आदि का सोशल प्लेटफार्म तैयार किया। इस मंच पर चढ़कर छोटे से छोटा धनुर्धारी भी बड़े से बड़े लक्ष्य पर, दूर से ही निशाना साध सकता है। प्रशंसकों के लाइक्स की गिनती करके स्वयं को स्थापित व्यंगकार भी घोषित कर सकता है। परंतु आभासी दुनिया के अपने दुष्परिणाम भी होते हैं। सोशल मीडिया पर निरंतर अभ्यास के चलते व्यंगकार और आलोचकों के अंगुष्ठ के अतिरिक्त शेष शरीर दुर्बल ही रह जाता है। तब मल्लयुद्ध की योग्यता उनमे नहीं रह जाती। अतः ऐसे अंगुष्ठबली वीरों के लिये स्वामीजी सलाह देते हैं कि वे सोशल मीडिया से बाहर आने का प्रयास ना करें। प्रशंसकों के प्रलोभन अथवा विरोधियों की ट्रॉलिंग के प्रति समदर्शी भाव रखें और इस मायाजाल में ना फँसें।
संतों में एक विशेष गुण ये भी होता है कि उनकी कथनी और करनी एक होती है। उनका आचरण भी उनके व्याकरण के अनुरूप ही होता है। स्वामी उजड्डा नन्द जी के प्रिय मित्र हैं सत्येंद्र रावत जी। स्वामीजी उनपर और उनकी काल्पनिक राजनीतिक पार्टी पर निशाना साध के निरंतर अभ्यास (नेट प्रैक्टिस) करते रहते हैं। रावत जी के कसरती शरीर को ध्यान में रखते हुये, स्वामीजी ने वॉट्सएप्प से बाहर दर्शन ना देने की कसम खा रखी है। स्वामीजी के व्यंगबाणों के कायल बहुत से प्रशंसकों और घायल बहुत से विरोधियों को आज तक उनके दर्शन नसीब नहीं हुये। यहाँ तक की अपने प्रिय शिष्य प्रशांत सेठ जी को भी उन्होंने बहुत दिनों से, अपने दर्शनों से वंचित रखा है। ऐसे संतों को नमन करने से हमारा और आपका जीवन धन्य हो जाता है।
तो बोलो व्यंग शिरोमणि, आलोचना वीर, दर्शन दुर्लभ श्री श्री 1008 स्वामी उजड्डा नन्द जी की जै
© - प्रशांत सेठ