Wednesday, April 12, 2017

अनुभूति

वो,
वो नहीं सुनता
मेरे भजन
श्रृंगार युक्त शब्द
नगाड़े का शोर
मंदिर का घंटा
मस्जिद की नमाज़
मेरी अनगिनत माँगें
अनंत इच्छायें
शायद
उसके कान ही नहीं हैं
वो बहरा है

वो,
वो नहीं देखता
मेरे ढकोसले
कोरा ज्ञान
अहंकारपूर्ण प्रदर्शन
मेरे सुख दुःख
पाप और पुण्य
मेरे कृत्य
सही या गलत
शायद
उसकी आँख भी नहीं है
वो अंधा है

वो,
वो नहीं पकड़ता
मेरा हाथ
कठिनाइयों में
नहीं रोकता
चलने से
गलत रास्तों पर
मैं स्वयं
गिरता संभलता हूँ
शायद
उसके हाथ नहीं हैं
वो लूला है

वो,
वो नहीं आता
मेरे पास
बुलाने से भी
ना ही जाता है
मुझसे दूर कहीं
स्थिर है
इसी जगत में
शांत चित्त
शायद
उसके पैर भी नहीं हैं
वो लंगड़ा है

लेकिन,
वो जान लेता है
हर कृत्य के पीछे
मेरा मंतव्य
दिखावों में छुपा
खोखलापन
मेरी दौड़
भूख से लालच तक
नहीं फँसता
मेरे शब्द जाल में
शायद
अंतरदृष्टि रखता है
ईश्वर दृष्टा है

कैसे
समझ लेता है
मेरी पीड़ा
प्रार्थना और पुकार
मन की गहराई में
उपजते भाव
प्रेम का मूक भाष्य
ह्रदय का
निश्छल स्पन्द
शायद
भाव तरंगों से
ईश्वर अनुभूति है

फिर
इन्हीं तरंगों से
जगा देता है
सोया हुआ साहस
और मैं
चल देता हूँ
एक बार फिर
अनिश्चित राह पर
उसके प्रकाश में
निर्भीक और निश्चिन्त
यकीनन
ईश्वर शक्ति है

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, March 8, 2017

रफूगर

एक रचना पढ़ने को मिली, जिसमें कवि एक रफूगर से निवेदन करता है की रिश्तों की चादर को रफू कर दो और पहले जैसा बना दो। उस कविता से उपजा एक ख्याल...

रफूगर

आइये बुन देता हूँ
रिश्तों की फटी चादर
शब्द के नाखून से उधड़ा
बिखरा हुआ मन
स्वार्थ की कैंची से कटा
प्रेम का महीन तार
लाइये बना दूँ परिपक्व
संबंधों का संसार

सारे शहर में पूछ लीजिये
मेरा बहुत नाम है
बस यूँ समझ लीजिये
घर की दुकान है
आप भी देखिये हुनर
मेरी जादूगरी का
कुशल कारीगर हूँ
रिश्तों की रफूगरी का

बना सकता हूँ मैं
बिगड़ी हुई बात को
जगा सकता हूँ मैं
सोये हुये जज़्बात को
सुबह का इंतज़ार
मत कीजिये हुज़ूर
मैं सूरज उगा सकता हूँ
आधी रात को

यूँ तो और भी रफूगर
शहर में मिल जायेंगे
झूठी मुस्कुराहटों से
गले मिलवायेंगे
कहने को गिले शिकवे
सारे धुल जायेंगे
रफू तो हो जायेगी साहब
दाग रह जायेंगे

आपकी चादर
पहले से बेहतर होगी
लेकिन मज़दूरी
काम से पेश्तर होगी
एक बार भरोसा कीजिए
इस खाकसार पर
नहीं तो चढ़ा आइये चादर
विश्वास की मज़ार पर

अरे अरे लेकिन ये क्या
यहाँ चादर छोड़कर मत जाइये
शिकायतों की मटकी भी
वापस उठाइये
छोड़ना है तो छोड़ जाइये अपना
क्रोध और गुरूर
मेरी मज़दूरी भी केवल
इतनी सी है हुज़ूर

छोड़ जाइये कड़वाहटें
ले जाइये सुकून
आइये छाँट दूँ
शब्द के पैने नाखून
भावों की जादुई सुई देता हूँ
रिश्ते आप खुद टाँक लीजिये
इस दुकान का पता बस यही है
ज़रा सा भीतर झाँक लीजिये

© - प्रशांत सेठ

Thursday, March 2, 2017

गर्दभ उवाच

गर्दभ उवाच

भाईसाहब, ज़रा सुनिये
उसने मुझे पीछे से टोका
मैं थोड़ा सा चौंका
पता नहीं आज किस्मत में क्या बदा था
मुड़कर देखा तो एक खूबसूरत गधा था

दरअसल गधा एक महान विभूति है
इस कौम से मुझे हमेशा सहानुभूति है
मैंने इंसानी गुरूर के विरुद्ध एक काम किया
और उसके गधत्व को झुककर प्रणाम किया

वह बोला,
आजकल राजनीति में हम ही हम छाये हैं
हम धोबीघाट से बहुत आगे निकल आये हैं
आपके एक वोट की दरकार है
अब हमको भी बनानी सरकार है

नाम धन सत्ता सम्मान पाने का
क्या हमको हक़ नहीं है चुने जाने का
बताइये हमारे अंदर कौन सी कमी है
सारी सियासत गधों पर ही तो जमी है

यही गधत्व जब मतदाता में समाता है
तो भ्रष्टाचार चुनाव जीत जाता है
जब नेता मुफ़्त की योजनाओं से लुभाता है
तो आपके भीतर के गधत्व को ही चराता है

आपके बच्चे भूखे हैं, कुपोषित हैं
वो आपको बताते हैं, आप शोषित हैं
70 बरस से आप वहीँ के वहीँ हैं
योजनायें घोषित थीं, घोषित हैं

कोई बताता है खतरे में तुम्हारा धर्म है
ये झंडा उठाओ अगर थोड़ी सी भी शर्म है
और तुम धीरे से वोट बैंक बन जाते हो
उसपर तुर्रा ये के गधा हमें बताते हो

हम पूरे होश में हैं, सिर्फ जोश नहीं है
हम सफ़ेद ज़रूर हैं, सफ़ेदपोश नहीं हैं
हम में और उनमें बड़े फर्क हैं
वो काल्पनिक स्वर्ग, हम यथार्थवादी नर्क हैं

वो देश को पचाकर भी रुष्ट हैं
हम रूखा सूखा खाकर संतुष्ट हैं
हम कर्तव्यवादी हैं, अधिकारवादी नहीं है
हम नैसर्गिक सफ़ेद हैं, कोई खादी नहीं है

दरअसल भावुकता ही वो तत्व है
जिसका दूसरा नाम गधत्व है
और ये आपके अंदर कूट कूट कर समाई है
इसलिए हम गधों को उम्मीद नज़र आई है

पंजा ना कमल ना झाड़ू न हत्थी
हमारा चुनाव चिह्न है खालिस दुलत्ती
सत्ता पाकर हम भी आपको दुलत्ती मारेंगे
आप किसी को भी चुनिये, आप ही हारेंगे

आप अपने वोट को मत बेकार कीजिये
हमारे प्रेमपूर्ण निवेदन को स्वीकार लीजिये
भौं भौं बहुत सुनी होगी, अब ढेंचू भी सुनिये
अपने गधत्वपूर्ण वोट से, गधों को ही चुनिये

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, March 1, 2017

दो दीवाने

लोकेश नदीश और प्रशांत सेठ
दो दीवाने शहर में....

तुम कभी आओ तो
मैं घुमाऊँ तुमको
खण्डहर सी ज़िन्दगी के
उस कोने में जहाँ
अब भी पड़ीं हैं
अरमानों की अधपकी ईंटें
ख़्वाबों के अधजले टुकड़े
अहसास का बिखरा मलबा
उम्मीद का भुरभुरा गारा
तुम कभी आओ तो
मैं दिखाऊँ तुमको
खुशियों की बेरंग तस्वीरें
अश्कों का लबालब पोखर
धोखों के घने जाले
रिश्तों की चौड़ी दरारें
तुम कभी आओ तो

©® लोकेश नदीश
---------------

मैं आऊँगा लेकर
हौसलों का मिस्त्री
तुम देना मुझे
अरमानो का कॉन्ट्रैक्ट
फिर खड़ा करेंगे
इन्ही खंडहरों में
इन्ही अधपकी ईंटों से
सपनों का नया महल

मैं आऊँगा लेकर
विश्वास की सीमेंट
घोलकर इन्ही अश्कों में
बनायेंगे हम गारा
पाट देंगे मिलकर
प्रेम के पलस्तर से
रिश्तों में पड़ी
ये चौड़ी दरारें

तुम सहेज कर रखना
मेरे आने तक
ये खँडहर सी यादें
टूटी हुई उम्मीदें
बिखरे बिखरे एहसास
दरारों का दर्द
तड़प के आँसू
और
बचा खुचा अस्तित्व

© - प्रशांत सेठ

Thursday, January 26, 2017

गणतंत्र कैसा?

गणतंत्र कैसा?

आज ह्रदय में उपज रहा ये
प्रश्न कैसा?
सिर्फ किताबों में है गणतंत्र
जश्न कैसा?

स्वतंत्रता का लक्ष्य नहीं
पूर्ण हुआ है
खंड खंड भारत कहाँ
सम्पूर्ण हुआ है
स्वाभिमान गिरवी रख, संघर्ष
खत्म कैसा?
सिर्फ किताबों में ...

देखो शत्रु की चुनौती
कितनी बड़ी है
और तरुणाई इस देश की
अकर्मण्य खड़ी है
है यौवन उत्सव में फिर भी       
मग्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...

तुम कहते हो राष्ट्र बढ़ रहा
प्रगति पथ पर
चंद लोग ही क्यों दिखते हैं
स्वर्ण रथ पर?
है किसान मज़दूर यहाँ तब
नग्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...

सत्ता लोलुप चढ़ाये हुये हैं
चेहरे पर चेहरे
पहचाने नहीं जायें रंग हैं
इतने गहरे
यथार्थ से मुँह चुराता इनका
यत्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ....

एकलव्य के हिस्से यहाँ
तिरस्कार लिखा है
पद्म विभूषण पे देखो तो
पवार लिखा है
सर शर्म से झुका दे वो
रत्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...

खून के बदले आज़ादी का
वो नारा था
हमें किसी गांधी सुभाष ने
क्यों तारा था
है अधूरा अभी संकल्प वो
भग्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...

काश हमारी ललकार से फिर
पहाड़ गूंजे
सिंहनियों की कोख से फिर
दहाड़ गूंजे
सिंह जनें ना माएँ तो शुभ
लग्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...

बदलनी है परिपाटी तो
उठना होगा
यदि बनना है तो पहले
मिटना होगा
जागो के अब नींद कैसी
स्वप्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, January 11, 2017

संस्कार माला

बेटी ने अपने आने वाले जन्मदिन (16 जनवरी) पर उपहार स्वरूप एक कविता की माँग रख दी। तब अपने जीवन के अनुभव, संघर्ष और गुरुजनों की प्रेरणा से उत्पन्न चिंतन को, संस्कारों की माला में पिरोकर उसे ये रचना दे रहा हूँ। अभी उसकी समझ में आये ना आये; भविष्य में अनिर्णय की स्थिति उत्पन्न होने पर अवश्य काम आएगी। क्योंकि,
म्हारी छोरी की छोरों से होड़ नहीं होवे है
म्हारी छोरी तो खुदई बेजोड़ होवे है...!!!
----------------
विभिन्न परिस्थितियों में, अलग अलग लोगों की मनस्थितियों भी अलग अलग होती हैं। लेकिन, महान वही कहलाये जिन्होंने संशय की स्तिथि में, स्व-अर्थ को त्याग कर परम-अर्थ को स्वीकार करने का निर्णय लिया।

संस्कार माला

जब
जीवन की ठोकर से उपजने लगे संगीत
ह्रदय की चोट बन जाए अहोभाव का गीत
मन धर्म रक्षार्थ मोह को तजने लगे
एक पाञ्चजन्य भीतर ही बजने लगे
तब समझ लेना
तुम अग्रसर निर्माण के पथ पर हो
हे अर्जुन, तुम केशव के रथ पर हो

जब
टूटने लगे "मैं" का भाव तुम्हारा
मिटने लगे भय का प्रभाव सारा
बाहर सजता भीषण कोई रण हो
और भीतर जागता एक समर्पण हो
तब समझ लेना
तुम्हारी सुप्त शक्ति जागरण को तत्पर है
हे हनुमंत, फिर लंका दहन का अवसर है

जब
संसार भर की दृष्टि हो जाये वक्र
और शत्रु रचते हों नित नये कुचक्र
महाबलियों से हो संग्राम तुम्हारा
मातृभूमि करे बलिदान का इशारा
तब समझ लेना
निज प्राणों का मोह छोड़ना होगा
हे अभिमन्यु, तुम्हें चक्रव्यूह तोड़ना होगा

जब
अशक्त रहो किन्तु हताश नहीं
निर्बल होकर भी परास्त नहीं
कर्तव्य से बढ़कर ना लगते हों प्राण
धर्म हेतु कर सको स्व का बलिदान
तब समझ लेना
ये मृत्यु नहीं, मुक्ति का वरण है
हे जटायु, तू राम की शरण है

जब
असत्य तुम्हें अपराधी कहता हो
ह्रदय घोर संताप सहता हो
धैर्य की परीक्षा लेता हो अभिशाप
और दंड बन जाये औरों का पाप
तब समझ लेना
फिर निष्प्राण शिला का उद्धार करेगा
हे अहिल्या, स्वयं ईश्वर तुझे अंगीकार करेगा

जब
भारहीन होने लगे मन
आसक्तियों के विनाश से
और विचरण करे मुक्त
मोह माया के पाश से
तब समझ लेना
अब भवसागर भी डुबा ना पायेगा
हे केवट, कोई राम उस पार ले जायेगा

जब
बीते जीवन पर करो तुम शोध कभी
स्व कर्म के पीछे हो अज्ञान का बोध तभी
ह्रदय में हो राम और मुँह से निकले मरा
निज अंतस में भाव किन्तु हो खरा
तब समझ लेना
निश्चित है फिर किसी रत्नाकर का अंत होना
हे वाल्मीक, असंभव नहीं डाकू का संत होना

जब
पथ निहारते हों नयन, आराध्य का
विरह बन जाये सुर, ह्रदय के वाद्य का
विष भी दे आनंद, ज्यों अमृत का पान
ना होश ही रहे ना देह का संज्ञान
तब समझ लेना
कोई कृष्ण कहीं आस पास है
हे मीरा, बस कुछ क्षण की और प्यास है

© - प्रशांत सेठ

Saturday, January 7, 2017

एक मूरत टूटी सी

पेड़ के नीचे रखी भगवान की टूटी मूर्ति को देख कर समझ आया कि..
परिस्थिति चाहे कैसी भी हो,
पर कभी ख़ुद को टूटने नही देना
वर्ना ये दुनिया जब टूटने पर भगवान को घर से निकाल सकती है तो फिर हमारी तो औकात ही क्या है।
-------------------
उपरोक्त पंक्तिया वॉट्सएप्प पर पढ़ने को मिलीं तो मन में कुछ भाव जागे। सोचा चलो किसी टूटी हुई मूरत से साक्षात्कार किया जाये...

एक मूरत टूटी सी...

हाँ, मैं खंडित सी मूरत में हूँ
हाँ, मैं तिरस्कार की सूरत में हूँ
हाँ, मैं तुम्हारे हर अपमान में हूँ
क्योंकि, मैं तुम्हारे निर्माण में हूँ

किन्तु,
तुमको भय लगता है
टूटने से
रिश्ते नाते और संसार
छूटने से
क्योंकि, ये संसार देता है आभास
तुम्हारे होने का
और तुम में नहीं है साहस
जो पास है, उसे खोने का

तुम्हारा जीवन
एक सुखद कल की तलाश भर है
और ये कल्पना भी
वर्तमान की लाश पर है
तुम्हारे असुरक्षित मन को छद्म
खोल चाहिए
तुमको संसार की दृष्टि में अपना
मोल चाहिए

इसलिये,
तुम पकड़ते हो झूठ के
सहारों को
इस संसार के मायावी
इशारों को
अनिर्मित को तुमने सदैव ही
नकारा है
तुम्हारी श्रद्धा ने केवल निर्मित को
स्वीकारा है

लेकिन,
मुझपर तो दायित्व है
तुम्हारे निर्माण का
तुम्हारा पथ करना है प्रशस्त
जन्म जीवन निर्वाण का
भ्रम का आवरण हटते ही
सत्य का ज्ञान है
तुम्हारी टूटन ही निर्माण का
प्रथम सोपान है

तुम्हारे लिए सरल है
टूटी मूरत को नकार देना
लेकिन जब कभी भी तुम टूटो
मुझे पुकार लेना
निर्माण योग्य हर मनुष्य
मेरी श्रद्धा का पात्र है
और तुम्हारा टूटना ही एक
विकल्प मात्र है

देखो,
किसी नवजात से पंछी में
सम्भावना के पर को
किसी अनगढ़े पत्थर में
छिपे अवसर को
हर टूटन के पीछे सुनो
निर्माण के स्वर को
इतना भी कठिन नहीं है
समझ पाना ईश्वर को

© - प्रशांत सेठ