Monday, July 11, 2016

अखबारी दुःख फेसबुकीय चिंता

दुःख दो प्रकार के होते हैं, व्यक्तिगत और सामाजिक/राष्ट्रिय। व्यक्तिगत दुःख वे होते हैं जो किसी अखबार में नहीं छपते। सामान्य तौर पे कोई भी व्यक्ति इनके प्रदर्शन से बचता है। ये वो दुःख होते हैं जिनसे समाज अथवा राष्ट्र को कोई लेना देना नहीं होता। ये वही दुःख होते हैं जिन्हें गीता में कर्मों का फल कहा गया है। जैसे गरीब की जमीन पर दबंग का कब्ज़ा, बिना इलाज के गरीब का मर जाना, पिट पिट कर मज़दूर की मौत, इत्यादि। चूंकि देश, समाज और अन्य लोगों की दृष्टि में इन दुखों का अस्तित्व ही नहीं होता, इसलिये इन दुखों की कोई उम्र भी नहीं होती। जिसका अस्तित्व ही नहीं है उसकी उम्र कैसी? ये दुःख भले ही किसी के लिए सदियों के बराबर हों परंतु वर्तमान व्यावसायिक भौतिक युग में अन्य लोगों का इससे कोई सरोकार नहीं होता। अतः इन पर चर्चा करना फिजूल है।

इसके विपरीत सामाजिक/राष्ट्रीय दुःख वे होते हैं जो अख़बार में छपते हैं, जैसे JNU के कन्हैया का भाषण, ढाका में आतंकवादी हमला, केजरीवाल जी के बयान, सलमान की फ़िल्म, कश्मीर समस्या, मोदी जी की विदेश यात्रा, इत्यादि। इनसे आपका सरोकार होना नितांत आवश्यक होता है अन्यथा अपने आस पास एवं सोशल मीडिया में आप पिछड़े, अपढ़ और गैर जागरूक माने जाते हैं। इन दुखों पर विचलित होने जैसी पोस्ट आपके संवेदनशील होने की निशानी मानी जाती है। ये दुःख नित नये होना चाहिए क्योंकि सुबह का अखबारीय दुःख अधिक से अधिक शाम तक आपके ज़हन में ज़िंदा रहता है। दफ्तर और चौराहों पर चर्चा करने और फेसबुक पर एक पोस्ट डालने के उपरान्त यह दुःख स्वतः मर जाता है। इस बात को समझते हुए मीडिया भी रोज़ नए दुःख परोसने के कार्य में ईमानदारी से संलग्न रहती है।

देश और समाज के प्रति आपकी फेसबुकीय चिंता आपके जागरूक होने की निशानी है। इस मीडियाई दुःख पर फेसबुकीय चिंता से आपको ये आत्म बोध भी होता है कि समाज बदल रहा है और इसको बदलने में आपका बहुत बड़ा हाथ है। और यदि आप उक्त दुःख पर कविता अथवा व्यंग लिख कर पोस्ट करते हैं तो आपका डिजिटल सम्मान कई गुना प्रगति कर जाता है। किन्तु यह परम आवश्यक है की शाम की चाय के साथ सम्बंधित दुःख को भी घोल कर पी जायें, क्योंकि बासी दुःख का प्रदर्शन सोशल मीडिया में उसी प्रकार अर्थहीन और उपेक्षित हो जाता है जैसे आपके घर में कोई बुजुर्ग।

एक ही दुःख से चिपके रहना बोरिंग हो जाता है और फिर लोग आपको गंभीरता से नहीं लेते। अतः कोई दुःख मरने से इनकार कर दे तो भी रात होने से पहले उसका गला घोंट दें। कहीं कोई सामाजिक/राष्ट्रिय दुःख आपके साथ एक रात के लिए सो गया तो सुबह तक आपके सामाजिक कार्यकर्ता बन जाने का खतरा है।

© - प्रशांत सेठ

Friday, July 8, 2016

एक था कुत्ता

इंसानो की बस्ती में, आज हम भी झाँक लिये
सूट बूट और टाई में सब, अपना कुत्तत्व ढाँक लिये
चाँद तक यूँ पहुँच गई है, हवस विकास के पुत्रों की
प्रयाग कोई जा पहुंचे ज्यूँ, इंसानियत की राख लिये

कभी स्कूल में पढ़ा था कि मनुष्य भी एक जानवर ही है और उसका बायोलॉजिकल नाम है "होमो सेपियन्स"।
चेन्नई में तीसरी मंज़िल की छत से जब उसने एक कुत्ते को फेका तो स्कूल में पढाई गई बात पर पहली बार मुझे विश्वास हुआ। आदमी और कुत्ते में ज़्यादा कुछ फर्क नहीं है, बस इतना है की आदमी स्कूल में पढ़ लिख गया है और कुत्ता....

एक था कुत्ता

कैं कैं की आवाज़ सुनकर
तीसरी मंज़िल से गिरते हुये
उस कुत्ते को हमने रोका
और रोक कर टोका

इतना क्यों चिल्ला रहे हो मित्र
ऐसी क्या बात हो गई विचित्र
तुमको इस कृत्य में क्यों दिखता अत्याचार है?
क्या आदमियत से तुम्हारा पहला साक्षात्कार है?

तुम्हारी चीखों में सहानुभूति की आशा है
हमारे लिये तो ये रोज़ का तमाशा है
अगर तुम्हें सच में न्याय की अभिलाषा है
मिमियाना छोडो, काटना सीखो, वही उचित भाषा है

लात खाते हो फिर भी दुम हिलाते हो
तभी तो इस तरह से फेके जाते हो
हम दोपाये इसलिये तुमसे अधिक श्रेष्ठ हैं
संवेदनाहीन हैं, पशुता में भी ज्येष्ठ हैं

गिरते गिरते भी वो रुक गया
मेरी आदमियत के आगे झुक गया
उस गिरते हुये कुत्ते में एक कमाल था
उसकी कातर आँखों में एक सवाल था

आज उसने गिरते हुये इंसान
और इंसानियत के उसूल देखे
उसके अंतिम अनुभव ने
आदमियत के मुखौटे उतार फेके

वो बोला,
मैंने सुना था ये हिंदुस्तान है
यहाँ पशुओं का बड़ा सम्मान है
विधाता ने जब पूछा, मैंने यही कहा था
मुझे अपने भारतीय कुत्तत्व पर अभिमान है

हे मनुज श्रेष्ठ, मैं तुम्हारा वंदन करता हूँ
और मीडिया की इस बात का खंडन करता हूँ
की इस देश में
पशु का जीवन आसान नहीं है
कौन कहता है,
यहाँ पशुओं के संरक्षण का इंतज़ाम नहीं है?

अगर तुम्हारी परम्पराओं को समझ पाते
तो आज हम चौपाये भी पनप जाते
हम पशु होकर भी पशुता से वंचित हैं
सारी पशुता तो मनुष्यों में संचित है

इस देश में,
पशुओं का चारा मंत्री जी निगलते हैं
तिहाड़ के सिक्के चुनावों में चलते हैं
नशे में धुत्त रईसजादे, फुटपाथियों को कुचलते हैं
और गरीब के जनाजे रोज़ निकलते हैं

ओवरटेक करने पर गोली मिलती है
आतंक के साये में जनता पलती है
फिर इंसाफ की अंधी देवी, जब हाथ मलती है
तब शरीफ को अपनी शराफत बहुत खलती है

अपनी हवस को तुमने गिद्ध कर लिया है
मनुष्य ने पशुता को सिद्ध कर लिया है
जो बहा लेता है खून धर्म की बात पर
वही राज करता है आदम की ज़ात पर

पशुओं के समान रोज़ कृत्य करते हैं
सत्ता के वो पुत्र खुले विचरते हैं
उनकी सुरक्षा का यहाँ पुख्ता इंतज़ाम है
मनुष्य रूप में जो भी पशुओं के समान हैं

जिसमें पशुता का लेशमात्र भी अंश नहीं है
इस धरती पर आज उसका वंश नहीं है
इसलिये
अपने जीवन की डोर मैं तोड़ जाता हूँ
ये संसार तुम्हारे लिये ही छोड़ जाता हूँ

मेरा उठा हुआ सर झुक गया है
वो कुत्ता गिरकर भी उठ गया है
अब आईना भी मुझसे चौंक रहा है
मेरे भीतर का कुत्तत्व, मुझ पर ही भौंक रहा है

मुझे दुःख नहीं है उसके मरने का
दुःख है तो आदमियत के गिरने का
आँख मिलाकर खुदसे, आईना तो देख पाते
काश हम कुत्ता नहीं, कुत्तत्व को फेक पाते

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, July 6, 2016

जूनून

मेरी अपनी मंज़िल, अपना ही रस्ता है
मैं जब ये कहता हूँ, ज़माना हँसता है

वो कहते हैं जुनूँ में, जाँ निकल जाती है
मैं हंसकर ये कहता हूँ, सौदा सस्ता है

क्यों ठहरें समंदर से, होगा क्या हासिल
ये जुनूँ है कि दिल में, दरिया सा बसता है

इक बूँद गालों पर, आकर ये कहती है
दिल का एहसास ये, आँखों से रिसता है

इक सफ़र है ज़िन्दगी, मुश्किलें आनी जानी
कब एक ही मंज़र से, ये भी वाबस्ता है

ज़िद छोडो, घर से निकलो, नज़ारे और भी हैं
ठहरे तो दीवारें, चल दिये तो रस्ता है

© - प्रशांत सेठ

Sunday, June 26, 2016

मनुज धर्म

ये सच है की मनुष्य इस धरती पर सबसे शक्तिशाली जीव है। ये भी सच है की प्रकृति को उसने सिर्फ लूटा है। कदाचित इसलिये इस पृथ्वी पर अगर कोई दुखी है, तो वो है सिर्फ मनुष्य। क्योंकि जीवन का आनंद तो बाँटने में है; और बाँट वही सकता है जिसके हृदय में कृतज्ञता का भाव हो।

पग पग पथ पर कदम बढ़ायें
चलो पथिक का धर्म निभायें

धूप छाँव स्वीकार करें
जो मिला है आभार करें
उलाहनों में क्या रखा है
आओ जीवन से प्यार करें
उठती गिरती बहती नदी सा
गीत कोई हम भी गायें
चलो पथिक का धर्म निभायें

ये मिला और वो नहीं है
ये गलत है, वो सही है
लेखा जोखा क्यों रखें हम
ह्रदय कोई खाता-बही है?
हिसाबों से परे चलकर
खुदको बे-मतलब लुटायें
चलो धरा का धर्म निभायें

दिन ऊगे उड़ जाना है
साँझ ढले घर आना है
अपने हिस्से का दाना हमको
वैसे भी मिल जाना है
कल की फ़िक्र में क्यों अपना
आज हम व्यर्थ गँवायें
चलो पंछी का धर्म निभायें

क्यों घबरायें दुःख के शूल से
धूप, बारिश और धूल से
मुस्कुराना सीखें हम भी
किसी डाल पर खिले फूल से
सारी ऋतुयें जी लें खुलकर
समय से पहले क्यों मुरझायें
चलो पुष्प का धर्म निभायें

खुद जलकर दिया है जिसने
औरों को सदा उजियारा
गिरा नहीं है वो कभी जो
दूसरों का बना सहारा
अंधेरों की जहाँ सत्ता हो
वहां चलकर दीप जलायें
चलो सूरज का धर्म निभायें

परहित का संकल्प लेकर
ठहर जायें किसी राह में
बनें आश्रय थके पथिक का
दें विश्राम अपनी छाँह में
पत्थर की चोटों का मोल
मीठे फल से हम चुकायें
चलो वृक्ष का धर्म निभायें

किसी निर्बल का बल बनकर
सबलता के मर्म को समझें
मौन और निःस्वार्थ कर्म में
निहित वास्तविक धर्म को समझें
उड़ने योग्य किसी पंछी के
पंखों का हम बल बन जायें
चलो वायु का धर्म निभायें

पर्वत जंगल शहर गाँव हो
भेद रहित मन का भाव हो
रीत जायें आओ वहां पे
जहाँ कहीं भी अभाव हो
जो मिला है बाँटें उसको
कृतज्ञता से भर भर जायें
चलो मेघ का धर्म निभायें

रंग बिरंगा ये संसार
इस अदभुत जीवन का सार
बहुत दिया देने वाले ने
कोटि कोटि उसका आभार
बूँद बूँद सींचा है जिसने
उस माली को शीश नवायें
चलो मनुष्य का धर्म निभायें

© - प्रशांत सेठ

Sunday, June 19, 2016

एक शाश्वत प्रश्न?

स्वयं के अज्ञान का बोध ही शायद ज्ञान की ओर पहला कदम होता है...

एक शाश्वत प्रश्न?

स्वप्न सदृश्य इस जगत में
मन क्यों इतना मगन है बोलें
कोई खिड़की उस तरफ की
हे ईश्वर अब आप ही खोलें

हाँ, बहुत सुंदर है माना
इस जगत का ताना बाना
किन्तु है ये रहस्य अभी भी
कहाँ से आये, कहाँ को जाना
अंधे की भांति हम कब तक
खोयी हुई राह टटोलें
कोई खिड़की...

शाश्वत नहीं, सत्य नहीं है
जीवन किन्तु असत्य नहीं है
मार्ग है ये किस गंतव्य का
ज्ञात इसका तथ्य नहीं है
मार्ग के दृश्यों को अपने
मन में कैसे हम संजो लें
कोई खिड़की…

प्रश्न कहो या कहो जिज्ञासा
ये पथिक है ज्ञान का प्यासा
करुणा की बस एक झलक से
मन को दे दें आप दिलासा
अपनी व्याकुलता को हम भी
सिवा आपके किससे बोलें
कोई खिड़की...

बाहर भीतर ऊपर नीचे
चल दें बोलो अब किस ओर
अंतहीन इस राह का भी
निश्चित कहीं होगा छोर
आप तक जाती हो, उस ही
राह पर अब हम भी हो लें
कोई खिड़की...

© - प्रशांत सेठ

Saturday, May 14, 2016

भीष्म-द्वन्द

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

- रामधारी सिंह दिनकर जी

समर्थ है फिर भी पराजित है, ज्ञान है फिर भी बंधन में है, नीति के ज्ञाता हैं फिर भी अनीति के साथ हैं। ऐसे ही चरित्र को भीष्म कहते हैं। जैसे ज्ञान होते हुए भी मार्ग से भटका हुआ कोई संत या सामर्थ्य होते हुए भी निष्क्रिय नेतृत्व।
अनीति के समक्ष जब भी सामर्थ्य और ज्ञान ने सर झुकाया है, तब परिणाम स्वरुप पश्चाताप ही पाया है। कहीं ना कहीं जीवन में हम सब भी तो थोड़े थोड़े भीष्म हो जाते हैं। विशेषकर तब, जब अनीति के समक्ष मौन धारण कर लेते हैं।

भीष्म-द्वन्द

मुक्ति का सामान सब है
सामर्थ्य शौर्य ज्ञान सब है
हूँ शर शैया पर किन्तु फिर भी
चिंतन को विश्राम कब है

मिट रही भ्रांतियाँ मन की
देख रहा त्रुटियाँ जीवन की
लौट रहीं स्मृतियाँ फिर से
बीते गये हर एक क्षण की

परिवर्तित होता हर पल ये
कालचक्र किसने देखा है
कभी मर्यादा की सीता भी
लांघ जाती लक्ष्मण रेखा है

फल मेरे ही कर्म अकर्म का
शत्रु रूप है आज धर्म का
बहुत विलम्ब से जाना मैंने
अर्थ सृष्टा के मर्म का

एक संकल्प लिया था मैंने
भावुकता के ज्वार में
मैं अपराधी हुआ सत्य का
मोह समक्ष उस हार में

उस संकल्प में बंधकर फिर
देख रहा हूँ द्यूत सभा को
मौन धारण किये ज्ञान को
कर्तव्य की विलुप्त प्रभा को

अहंकारमय एक चित्त अधीर
खींच रहा मर्यादा का चीर
और समय लिख रहा मुझको
अधर्म समक्ष एक निष्क्रिय वीर

निज संकल्पों का बंदी हूँ
मैं नियति का प्रतिद्वंदी हूँ
मार रहा हूँ खुद को खुद ही
मैं स्वयं ही तो शिखंडी हूँ

वर्षों पहले इस कृत्य का
फल मैंने ही वरण किया था
एक स्त्री की मर्यादा का
जब मैंने भी हरण किया था

अधर्म संग प्रतिबद्धता खड़ी है
निज प्रतिज्ञा धर्म से बड़ी है
मेरे संकल्प की शत्रु बनकर
इसलिये नियति स्वयं लड़ी है

कब तक लड़ेगा स्वप्न, यथार्थ से
पराजित भीष्म को होना है पार्थ से
अपने अपने जीवन काव्य को
हम भी समझ लें इसी भावार्थ से

© - प्रशांत सेठ

Thursday, May 12, 2016

एक दिन माँ

उस दिन बहुत खुश हो गई माँ
#हैश टैग के सहारे ट्वीट हो गई
और वॉट्सएप्प पर वायरल भी
फेसबुक पर उमड़ा मातृ प्रेम
लाइक्स और कमेंट्स में
सहेज रहा था अपना अस्तित्व

कुछ बटोरी हुई भावनाओं के साथ
"माँ" हो गई थी अपडेट
पोस्ट हो गई थीं तस्वीरें
हर बार की तरह
इस वर्ष भी
श्रवण कुमार की फेसबुक वॉल पर

हर तरफ माँ-मयी डिजिटल मंज़र
सिर्फ और सिर्फ श्रवण कुमार
टीपे हुये ढेर सारे भाव
वॉट्सएप्प से फेसबुक के बीच
"माँ" होती रही उस दिन
कट कॉपी और पेस्ट

मैं सोच रहा हूँ
उस दिन माँ ने फिर दर्द सहा होगा
उतना ही, जितना कि जब तुम जन्मे थे
नहीं, बल्कि थोडा अधिक ही
क्योंकि इस बार तुम पैदा हुए थे
कुछ कुछ मरे हुये

काश तुम्हारा जन्म भी डिजिटल होता
और माँ रहती प्रसव की वेदना से मुक्त
या टीप लाती वो तुम्हें
किसी सरोगेट मदर से
और चिपका देती स्टेटस की तरह
घर की दीवार पर

साल में एक दिन बदलती तुम्हारा डायपर
और उस दिन को कहा जाता "सन डे"
संडे वो नहीं, जो बावन होते हैं हर साल में
सन डे यानि पुत्र दिवस
जब माँ करती पोस्ट कुछ तस्वीरें
"आज मैंने छोना बेबी का डायपर बदला, मुआआआआह्"

काश तुम्हारे शब्द ही तुम्हारे अपने होते
तो तुम्हें मालूम होता
कितना कठिन है
अपनी कलम से सृजन करना
ह्रदय की कोख से
भावों को जन्म देना

मुक्त कर दो माँ को
और खुद को भी
इन एक दिवसीय छद्म भावनाओं से
आज तुम सिर्फ एक शब्द लिख दो
"माँ"
और कृतज्ञता से देख लो उसकी तरफ

और यदि माँ सिमट गई हो
किसी फोटो फ्रेम में
तो उसकी तस्वीर से ही कह दो
"माँ"
देखना, इधर तुम्हारी आँख में बूँद होगी
उधर उसकी छाती में फिर सागर हिलोरें लेगा

उसकी आँखों से छलकेगा वात्सल्य
उसकी कोख फिर गर्व से भर जायेगी
और यकीन मानो,
तुम्हारी मूक कृतज्ञता से
आज मातृत्व सम्पूर्ण हो जायेगा !!!

© - प्रशांत सेठ