Sunday, March 13, 2016

धर्म-द्वन्द

लो भैया!! अब ये पसर गए की भारत माता की जय नहीं बोलूंगा। जिनके अपने ईमान का ठिकाना नहीं है, वो ठेकेदार बने बैठे हैं धर्म के। और इन ठेकेदारों (चाहे वो भगवाचन्द हों या हरीमुल्ला) का तथाकथित धर्म जरा जरा सी बात में खतरे में पड़ने लगता है। और ये मिटटी के क्षणभंगुर पुतले, धर्मरक्षक होने का दावा ठोकने लगते हैं। सच तो ये है की यदि ये लोग जहर ना उगलें तो इनका राजनीतिक अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा।

सुनो हे धर्म के ठेकेदार!! तुम्हारा धर्म एक रंगी है इसलिये खतरे में पड़ जाता है। क्योंकि अन्य रंग तुम्हें स्वीकार नहीं हैं और अन्य रंगों को तुम। सच तो ये है कि वास्तविक धर्म कहीं भी कभी भी खतरे में नहीं है। धर्म तो वह है जो इंद्रधनुष के सातों रंग को स्वीकार करता है। जो कुछ भी सृष्टा ने रचा है, उसे स्वीकार्य होता है। प्रकृति में विविधता तुम्हारे स्वीकार ना करने से नष्ट नहीं होगी। वैसे भी किसी वस्तु की रक्षा करने या नष्ट करने के लिए उसके स्थान का ज्ञान होना आवश्यक है। तुम क्या किसी धर्म की रक्षा करोगे या अन्य धर्मों को नष्ट करोगे? धर्म के मर्म की बात छोडो, तुम्हें तो ये भी नहीं पता कि हमारा धर्म रहता कहाँ है।

हमारा धर्म रहता है हमारे आचरण में, विचारों में, आस्था में। और ये तुम्हारे मिटाये से ना मिटेगा। किसी के मिटाये से ना मिटेगा। ये मिटेगा जब हम स्वयं ही धर्म विमुख आचरण करेंगे। और तब भी वह मिटेगा तो मात्र हमारे जीवन से, संसार से नहीं। हमारे धर्म को यदि खतरा है तो हम ही से। वैश्विक धर्म तो सत्य है, इसलिये सनातन है और अनश्वर है।

इसी बात पर एक गरिष्ठ सी रचना। गरिष्ठ इसलिये क्योंकि मुझे मालूम है ये तुम्हें हजम नहीं होगी।

उन्माद मत बनाओ रण का
विषय है ये अंतःकरण का
निज आस्था और प्रण का
धर्म विषय है आचरण का

ना अर्जुन का ना ही कर्ण का
ना जाति का ना ही वर्ण का
धर्म विषय नहीं हार जीत का
ये विषय है निज समर्पण का

मार्ग है मुक्ति के वरण का
और बंधनों के हरण का
जीवन का भी अर्थ यही है
यही तात्पर्य है मरण का

भटके हुए पथिक को जैसे
तरुवर दे विश्वास शरण का
धर्म वही शक्ति है जैसे
बल होता है माँ के चरण का

देखो गौर से देह नश्वर है
त्यागो अहंकार एक ज्वर है
रक्षक होना मिथ्या भ्रम है
मनुज कौन सा यहाँ अमर है?

सुनो भीतर उपजता स्वर है
सनातन सत्य ये अनश्वर है
धर्म सदा रक्षित है क्योंकि
रक्षक उसका स्वयं ईश्वर है

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, March 8, 2016

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ...

"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तंत्र देवताः"

सुना है आज महिला दिवस है। होगा!
मेरे लिए तो ऐसा कोई दिन नहीं है जिस दिन स्वयं को किसी नारी का ऋणी ना पाया हो। माँ, बहन, बेटी, पत्नी इनके बिना अस्तित्व ही संभव नहीं है। मैं क्या, आप क्या, स्वयं सृष्टि का निर्माता भी अपनी इस रचना से उपकृत होगा।

नारी यानि सृजन, नारी यानि पोषण, नारी यानि जीवन। नारीत्व को धन्यवाद स्वरुप, एक पुरानी रचना आज दोबारा साझा कर रहा हूँ....

नारी

बहुत की है कोशिश हमने
इतनी छोटी बात नहीं है
सच कहूँ तो तुमपर लिखना
मेरी तो औकात नहीं है

विस्तृत नीले नभ के जैसी
सागर से भी गहरी तुम हो
तुम नारी हो तुमसे बढ़कर
सृष्टि की सौगात नहीं है

संस्कारों की जननी तुम हो
मानवता की तुम शिल्पी हो
तुम नारी हो बिना तुम्हारे
आदम की ही जात नहीं है

भक्ति का आधार तुम्ही से
शक्ति का संचार तुम्ही से
तुम दुर्गा हो तुम लक्ष्मी हो
अबला जैसी बात नहीं है

सीता तुम हो राधा तुम हो
राम कृष्ण की गाथा तुम हो
जीवन को आकार जो देती
प्रेरणा तुम सी ज्ञात नहीं है

सृष्टि का श्रृंगार भी तुम हो
हर रचना का सार भी तुम हो
सात रंग और सात सुरों का
ऐसा कहीं अनुपात नहीं है

प्रिया का भी काजल तुम हो
कभी माँ का आँचल तुम हो
प्रेम के इस भाष्य से बढ़कर
ईश्वर का संवाद नहीं है

© - प्रशांत सेठ

Sunday, March 6, 2016

यदा यदा ही धर्मस्य .....

हमने तो सुना था की जब जब धर्म की हानि होगी तब तब कन्हैया का अवतार होगा। मगर हे केशव, ये कैसा कन्हैया है? भारतीय राजनीति में इसका अवतरण भी जेल जाकर ही हुआ है। और अबकी बार तो प्रायोजक भी साथ हैं और मीडिया भी। अभी बाल अवस्था में है, इसलिये थोडा चंचल है। कल जब बड़ा होगा (क्षमा कीजियेगा "बड़ा बना दिया जायेगा") तो महाभारत रचेगा। इसने भी सत्ताधीशों को ही चुनौती दी है। फल (जेल) की चिंता किये बगैर कर्म (राजद्रोह) कर रहा है। इसके रथ पर भी पंच दलीय पांडव सवार होकर युद्ध कर रहे हैं। कल ये भी सत्तासीन कौरवों से, विस्थापित आतंकवादियों के लिए पांच गाँव (कश्मीर) मांगेगा (विस्थापित इसलिये क्योंकि इन आतंकवादियों का जन्मदाता देश ही इन्हें अपना मानने से इनकार कर देता है)। यही एक घंटे का उदबोधन गीता कहलायेगा और JNU कहलायेगा कुरुक्षेत्र। जीत हार का तो पता नहीं, लेकिन एक बात तय है कि इस तथाकथित राष्ट्रधर्म के युद्ध में चीरहरण होगा तो सिर्फ भारत माँ का। ये कैसी लीला है प्रभु?

सुनो वत्स!
इतिहास गवाह है की मैंने कभी पुरानी स्क्रिप्ट नहीं दोहराई। हर अवतार में नयी स्क्रिप्ट लेकर आता हूँ। क्योंकि मुझे पहले ही वह मंत्र पता है "नक्कालों से सावधान"। ये वैसा ही नकली कन्हैया है, जैसा नकली तुम्हारा (राष्ट्र) धर्म है। इसलिये मेरी नई घोषणा सुनो।

"जब जब धर्म के नकली स्वरुप को आचरण में धारण करते रहोगे, तब तब नकली अवतार होते रहेंगे। जब जब निजी मान्यताओं को धर्म बताकर दूसरों पर थोपोगे तब तब (राष्ट्र) धर्म की हानि होती रहेगी। ऐसे किसी भी धर्म को राष्ट्र और मानवता से ऊपर रखोगे तो ऐसे ही कन्हैया (कुमार) और (आशा) राम उत्पन्न होते रहेंगे।"

अत: इस कलयुग में असली अवतार की प्रतीक्षा करो और तब तक नकली का भजन जपो। और हाँ, अपने भजन में उन तत्वों का भी गुणगान करना मत भूलना जिन्होंने ऐसे तमाम कलयुगी कन्हैयाओं के अवतरण में मुख्य भूमिका निभाई है।

जो आज्ञा प्रभु!

प्रभु स्वप्न में आज्ञा देकर अंतर्ध्यान हो गए और हमने इन कलयुगी कन्हैयाओं की शान में एक भजन टाइप का रच डाला। आइये जाप करें...

हाथी घोड़ा पालकी
जय कन्हैयालाल की

इशरत के सवाल की
आरक्षण के भूचाल की
JNU के बवाल की
जय बोलो कन्हैया लाल की

कोरे बज रहे गाल की
टेढ़ी मेढ़ी चाल की
दिल्ली के नटवरलाल की
जय बोलो ....वाल की

धोती के रुमाल की
खाल निकाले बाल की
नित नये नये धमाल की
जय बोलो मीडियाई चौपाल की

कर्ज से जुटाये माल की
सेंसेक्स के उछाल की
माल्या के कमाल की
जय बोलो कॉर्पोरेट कंगाल की

सेकुलरिज्म के जाल की
धर्म के इस्तेमाल की
जी के इस जंजाल की
जय बोलो लोकतंत्र के हाल की

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, March 1, 2016

अर्थ-शस्त्र

दर्द कहीं दवा कहीं। बजट चाहे जैसा हो मगर व्यवस्था तो वही पुरानी है। इस प्रजातांत्रिक देश के अर्थशास्त्र पर एक व्यंग रचना...

पड़ोस वाले शर्मा जी का सिर फिर गया
वो सेंसेक्स की तरह धड़ाम से गिर गया
दर्द जाट आंदोलन की तरह भड़क रहा था
वो गरीब हिंदुस्तान की तरह तड़प रहा था

मैंने कहा, तुम भारतीय मुद्रा की तरह रो रहे हो
अर्थव्यवस्था की तरह कमज़ोर हो रहे हो
चलो किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाते हैं
क्यों मिडिल क्लास उम्मीदों की तरह खो रहे हो

बोले, सीने में दर्द है, बुरा हाल है
इस बजट ने बना दिया कंगाल है
सर्विस टैक्स, उसपे सेस, ये कैसा न्याय है
गोया की ये ग्वाले हैं और जनता गाय है

मैंने कहा मोहल्ले में नया डॉक्टर आया है
अच्छे दिनों का नुस्खा लाया है
पित्त विशेषज्ञ है, डॉ. करुण केटली नाम है
सुना है अडानी-अम्बानी सबको आराम है

माना की तुम्हारा बरसों पुराना मर्ज़ है
लेकिन एक बार दिखा लेने में क्या हर्ज़ है
दर्द मिट जाये तो समझ लेंगे चमत्कार है
वरना हर बार की तरह ये भी स्वीकार है

मैंने उनकी सोई हुई उम्मीद को जगाया
और डॉक्टर केटली के घर तक ले आया
मतदान समझकर जैसे ही बटन दबाया
वो तथाकथित चमत्कार बाहर आया

बोला सेठ जी, मेरे पास एक चमत्कारी दवाई है
वो तुम्हें खानी होगी, क्योंकि शर्मा जी का बीपी हाई है
टैक्स रुपी दवाई को महंगाई रुपी दूध में मिला लो
ज़्यादा नखरे मत करो, चुपचाप दवाई खा लो

हमने पूछा डॉ साहब ये कैसा इलाज है
मर्ज़ इनका, दवाई मुझे, इसमें क्या राज है?
वो बोले, मैंने अपने बड़े भाई से सीखा है
इलाज का ये एक नायाब तरीका है

गरीबी की तरह ये बीमारी भी एक तुलनात्मक रोग है
आप बीमार हैं जब तक आपके आस पास स्वस्थ लोग हैं
इसलिये अच्छे भले स्वस्थ आदमी को बीमार करो
मिडिल क्लास को गरीब बनाने पर विचार करो

समस्या देश में भ्रष्टाचार, कालाधन, आतंक है
बेईमानी राजा है और ईमानदारी रंक है
बीमार भले ही ये सड़ा हुआ सरकारी तंत्र है
दवाई प्रजा को खानी है, यही मूल मंत्र है

© - प्रशांत सेठ

Monday, February 22, 2016

आरक्षण

चार्ल्स डार्विन ने विकासवाद का सिद्धांत दिया था। प्रकृति के निरंतर बदलते रूप के चलते, वे प्रजातियां मिट गयीं जो संतुलन स्थापित ना कर सकीं और श्रेष्ठ गुणों का अर्जन ना कर सकीं।

प्रकृति और प्राकृतिक सिद्धांतों को चुनौती देना बुद्धिजीवी होने का लक्षण है। और ये तो सभी जानते हैं की भारत बुद्धिजीवियों का देश है। इसलिये हमने सोचा की हमारी अयोग्यता का संरक्षण होना नितांत आवश्यक है।

तब देश के बुद्धिजीवियों ने आरक्षण का नियम बनाया। शिक्षा में नहीं बल्कि रोजगार में और आर्थिक आधार पर नहीं वरन जातिगत आधार पर। क्योंकि यदि पिछड़े वर्ग को शिक्षित और कुशल बना दिया तो उनकी अयोग्यता ही समाप्त हो जायेगी। फिर हम संरक्षण किसका करेंगे। अत: काफी मंथन के बाद यह निष्कर्ष निकला की यदि अयोग्यता को संरक्षित करना है तो उसे श्रम से दूर रखा जाये और किसी भी परिस्थिति में योग्य बनने से रोका जाये।

हम भारतियों ने हमेशा संरक्षण पर विश्वास किया है, निर्माण पर नहीं। हम आज भी अतीत के गौरवशाली इतिहास को संरक्षित पहले करते हैं और भविष्य का निर्माण बाद में करते हैं। इसी गौरवशाली परंपरा के समर्थन में संपूर्ण विश्व से हम भारतियों के लिये आरक्षण की मांग करती एक (व्यंग) रचना....

(इस व्यंग के माध्यम से मैं पिछड़ों को पिछड़ा बनाये रखने की स्वार्थपूर्ण राजनीतिक साज़िश का विरोध करता हूँ)

आरक्षण

बौद्धिक वमन के अतिरिक्त
योग्यता हमारे पास नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है

रेल रोकें पटरी उखाड़ें
यही विध्वंसक शक्ति है
ऐसा हमारा गौरव है और
यही राष्ट्र की भक्ति है
सेवा का हम अवसर मांगते
दायित्वों का आभास नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है

मुंह में चम्मच देकर खिलाओ
बच्चों की भांति हैं हम
शिक्षित हमको होना नहीं है
पढ़ा ले जिसमें होवे दम
सरकारी अनुदानों पर जीना
इससे ज़्यादा आस नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है

शर्म क्या है नहीं जानते
मुफ्तखोरी की लत लगी है
राशन छप्पर दारु जो भी
दे दे वो सरकार सगी है
एक बोतल में वोट ले लो
कीमत कोई ख़ास नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है

हम हिंसक हैं क्योंकि हमारी
भूख अधिक है क्षमता कम है
पशुओं की भांति जीते हैं
स्वार्थ बड़ा है ममता कम है
केवल इतना ही अंतर है कि
जंगल में अब वास नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है

कौन सहेगा जीवन की ये
सर्दी गर्मी बारिश धूप
मिट ना जायें सुविधा भोगी
डार्विन के सिद्धांत अनुरूप
प्रतिभाओं से स्पर्धा कर लें
इतना हम में साहस नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है

© - प्रशांत सेठ

Sunday, February 21, 2016

सर्पदंश

आतंक और अत्याचार का कोई धर्म नहीं होता और ना ही होता है गद्दारों का। वो जयचंद भी हो सकता है और मीर जाफर भी। इसी तरह देशभक्ति का भी कोई धर्म नहीं होता। वो भगत सिंह भी हो सकता है और अशफ़ाक़ुल्ला भी। मज़हब की आस्तीन में पनप रहे सियासी सर्पों पर एक व्यंग...

सर्पदंश

पता ही नहीं चला वो कब इतना बड़ा हो गया
आज आस्तीन से निकला और सामने खड़ा हो गया
उसकी आँखों में विषैली चमक और आशा थी
इधर हमारे मन में हमेशा की तरह जिज्ञासा थी

मैंने पूछा, हे सर्प देव, बरसों से मेरी आस्तीन में पलते हो
आज नाराज़ होकर अचानक तुम किधर चलते हो?
यहाँ बहुतों की राजनीती आपकी कृपा से जमी हुई है
आपके भरण पोषण में बताओ कहाँ कमी हुई है?

वह बोला
हे सहिष्णुता के देवता आप बहुत भोले हैं
हम कल के सांप हैं आज भले ही संपोले हैं
हमारे विष के दांत अभी तो और बढ़ेंगे
स्कूल से जा रहे हैं अब यूनिवर्सिटी में पढ़ेंगे

सारे देश को डसने का मेरा मन कर रहा है
मगर तुम्हारी आस्तीन में मेरा टेलेंट मर रहा है
हम सपना देख रहे हैं कश्मीर की आज़ादी का
बस ज़रा सा संरक्षण मिल जाये खादी का

हमने पूछा हुज़ूर ये कैसा भेद करते हैं
जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं
हमारी आस्तीन में आपको पूरा संरक्षण भी मिलेगा
आप यहीं रहेंगे तो कल आरक्षण भी मिलेगा

वो बोला हम दुनिया के आम साँपों से भिन्न हैं
आस्तीन के साँपों का यही तो विशेष चिह्न हैं
हमारा मन भी हमारे तन की तरह काला है
हमने उसी को डसा है जिसने हमें पाला है

हमारे पुरखे जयचंद भी हैं, मीर जाफर भी
और हमारे लिए है ये लाइफ टाइम ऑफर भी
हमारा मज़हब है डसना, हमारे खून में शर्म नहीं है
हमारा स्वार्थ के अतिरिक्त और कोई धर्म नहीं है

मैंने सोचा ये कितना मासूम और भला है
क्यों ना होगा आखिर मेरी आस्तीन में पला है
संपेरों की बीन में जहाँ सर्प बाँधने की कला है
ये नादान उस देश के टुकड़े करने चला है

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, जो मर्ज़ी कह ले
जब तक बाँहें नहीं चढ़ीं, आस्तीन में रह ले
सहिष्णुता की हद तक कोई कुछ नहीं कहेगा
मगर देश के खिलाफ बोलेगा तो कौन सहेगा

मैंने कहा हम भोले हैं क्योंकि ये भोले शंकर का देश है
यहाँ सर्वशक्तिमान भी रखता फ़कीर का वेश है
वो नीलकंठ है, उसके कंठ में विष अटका है
वो नागेश्वर है क्योंकि गले में सर्प लटका है

उसके दो नेत्रों में जरूर प्रेम और सदभाव है
मगर तीसरे नेत्र में शुद्ध विध्वंस का भाव है
ये जब तक बंद है तब तक सहिष्णु है वो भी, ये देश भी
पाल रहा तब तक विष्णु है, वरना प्रलयंकारी महेश भी

© - प्रशांत सेठ

Friday, January 1, 2016

सशर्त शुभकामनायें

शुभकामनाओं का आदान प्रदान तो हर वर्ष होता है, मगर दुआयें सबको फलीभूत क्यों नहीं होतीं?

केवल शुभकामनाओं से आपका समय बदलता हो, तो हम भी दिए देते हैं। परंतु सच तो ये है कि केवल शुभकामनाओं से, ना मेरा कुछ बदलेगा, ना आपका।

हमारी शुभकामनाओं को फलीभूत होने के लिए आवश्यकता है, आपके निश्छल प्रयास की। क्योंकि केवल तिथि बदलने से परिस्थिति नहीं बदलेगी। इसलिये आज नव वर्ष पर हम भी आपको शुभकामनायें अवश्य देंगे, मगर सशर्त ...

अगर तुम्हारी झोली में
कुछ सपने हैं
और उन सपनो में शामिल
तुम्हारे अपने हैं
नित नई चुनौतियों से
मिलने का साहस है
और लक्ष्य को समर्पित
निश्छल प्रयास है
तो मैं नहीं कहता
नया साल मुबारक हो
तुम्हारा हर साल
मुबारक है मुबारक है मुबारक है

द्वेष रहित ह्रदय में
क्षमा है, आभार भी
जीवन के हर रंग से
तुम्हें है प्यार भी
विष पीकर भी तुम
बाँट सके हो अमृत
और मधुरता ही शेष है
आज मन में स्मृत
तो मैं नहीं कहता
नया साल मुबारक हो
तुम्हारा गया साल भी
मुबारक है मुबारक है मुबारक है

अगर तुम्हारी झोली में
खट्टी मीठी यादें हैं
और इन यादों में
अनुभव की सौगातें हैं
अगर तुमने बोये हैं
बीज खुशियों के
तो हमारी भी
दुआओं की बरसातें हैं
मैं नहीं कहता
नया साल मुबारक हो
तुम्हारा हर दिन
मुबारक है मुबारक है मुबारक है

© - प्रशांत सेठ

सशर्त शुभकामनायें http://prasantseth.blogspot.com/2016/01/blog-post.html