Sunday, February 21, 2016

सर्पदंश

आतंक और अत्याचार का कोई धर्म नहीं होता और ना ही होता है गद्दारों का। वो जयचंद भी हो सकता है और मीर जाफर भी। इसी तरह देशभक्ति का भी कोई धर्म नहीं होता। वो भगत सिंह भी हो सकता है और अशफ़ाक़ुल्ला भी। मज़हब की आस्तीन में पनप रहे सियासी सर्पों पर एक व्यंग...

सर्पदंश

पता ही नहीं चला वो कब इतना बड़ा हो गया
आज आस्तीन से निकला और सामने खड़ा हो गया
उसकी आँखों में विषैली चमक और आशा थी
इधर हमारे मन में हमेशा की तरह जिज्ञासा थी

मैंने पूछा, हे सर्प देव, बरसों से मेरी आस्तीन में पलते हो
आज नाराज़ होकर अचानक तुम किधर चलते हो?
यहाँ बहुतों की राजनीती आपकी कृपा से जमी हुई है
आपके भरण पोषण में बताओ कहाँ कमी हुई है?

वह बोला
हे सहिष्णुता के देवता आप बहुत भोले हैं
हम कल के सांप हैं आज भले ही संपोले हैं
हमारे विष के दांत अभी तो और बढ़ेंगे
स्कूल से जा रहे हैं अब यूनिवर्सिटी में पढ़ेंगे

सारे देश को डसने का मेरा मन कर रहा है
मगर तुम्हारी आस्तीन में मेरा टेलेंट मर रहा है
हम सपना देख रहे हैं कश्मीर की आज़ादी का
बस ज़रा सा संरक्षण मिल जाये खादी का

हमने पूछा हुज़ूर ये कैसा भेद करते हैं
जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं
हमारी आस्तीन में आपको पूरा संरक्षण भी मिलेगा
आप यहीं रहेंगे तो कल आरक्षण भी मिलेगा

वो बोला हम दुनिया के आम साँपों से भिन्न हैं
आस्तीन के साँपों का यही तो विशेष चिह्न हैं
हमारा मन भी हमारे तन की तरह काला है
हमने उसी को डसा है जिसने हमें पाला है

हमारे पुरखे जयचंद भी हैं, मीर जाफर भी
और हमारे लिए है ये लाइफ टाइम ऑफर भी
हमारा मज़हब है डसना, हमारे खून में शर्म नहीं है
हमारा स्वार्थ के अतिरिक्त और कोई धर्म नहीं है

मैंने सोचा ये कितना मासूम और भला है
क्यों ना होगा आखिर मेरी आस्तीन में पला है
संपेरों की बीन में जहाँ सर्प बाँधने की कला है
ये नादान उस देश के टुकड़े करने चला है

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, जो मर्ज़ी कह ले
जब तक बाँहें नहीं चढ़ीं, आस्तीन में रह ले
सहिष्णुता की हद तक कोई कुछ नहीं कहेगा
मगर देश के खिलाफ बोलेगा तो कौन सहेगा

मैंने कहा हम भोले हैं क्योंकि ये भोले शंकर का देश है
यहाँ सर्वशक्तिमान भी रखता फ़कीर का वेश है
वो नीलकंठ है, उसके कंठ में विष अटका है
वो नागेश्वर है क्योंकि गले में सर्प लटका है

उसके दो नेत्रों में जरूर प्रेम और सदभाव है
मगर तीसरे नेत्र में शुद्ध विध्वंस का भाव है
ये जब तक बंद है तब तक सहिष्णु है वो भी, ये देश भी
पाल रहा तब तक विष्णु है, वरना प्रलयंकारी महेश भी

© - प्रशांत सेठ

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