Saturday, September 26, 2015

अर्जुन

कर्ण से लेकर अर्जुन तक की यात्रा में प्रथम पड़ाव थी मेरी पूर्व रचना "कर्ण"। मेरा निवेदन है कि इस रचना को पढ़ने से पूर्व "कर्ण" को अवश्य पढ़ें।

http://prasantseth.blogspot.in/2015/09/blog-post_20.html

सच कहूँ तो झूठ नहीं लिखा था, परंतु सच भी पूरा नहीं लिखा था एवं जानबूझकर कुछ अनुत्तरित प्रश्न छोड़ दिए थे। आशा थी कि गुणीजनों से ऐसे उत्तर मिल जायेंगे जो नकारात्मकता एवं पूर्वाग्रह से ग्रसित ना होकर, दोनों पक्षों के गुण-दोष का निष्पक्ष चिंतन करेंगे और मर्म तक पहुंचेंगे। बहुत अच्छी और श्रेष्ठ चिन्तनयुक्त प्रतिक्रियाएं मिली किन्तु फिर भी पूर्ण संतुष्टि नहीं मिली। तब मैंने सोच लिया की अब उत्तर भी वहीँ से लाऊंगा जहाँ से प्रश्न आये थे और मुझे विश्वास था की उत्तर अवश्य मिलेगा।

मैंने निवेदन किया था की कर्ण और अर्जुन की तुलना में कोई ना उलझे क्योंकि दोनों एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। सच तो यह है कर्ण के बिना अर्जुन को समझा नहीं जा सकता। हम लोग (मैं भी) बड़ी जल्दी अपने अल्प ज्ञान से किसी के भी चरित्र की समीक्षा ही नहीं करते, वरन निर्णय भी सुना देते हैं। सच तो ये है की उस युग के तथाकथित अधर्मी भी इस युग के मनुष्यों से कहीं आगे थे ज्ञान में, कर्म में, बल में, बुद्धि में। अत: तुलना करनी ही है तो स्वयं से की जानी चाहिए। तब निर्णय सुनाने की बजाय कदाचित हम निर्णय लेना शुरू कर दें।

कर्ण और अर्जुन, दोनों के कर्म में कोई निजी स्वार्थ नहीं था। हाँ, कर्ण, भीष्म, द्रोण, आदि ने निज संकल्पों को धर्म से ऊपर रखा, इसलिए अधर्मी ना होते हुए भी संकल्पों एवं उपकारों से बंधे हुए, अधर्म की तरफ खड़े दिखाई दिए। इनको परास्त करने का सामर्थ्य अर्जुन में नहीं था। परंतु जिसमें सामर्थ्य था वह अर्जुन के साथ था। और वह अर्जुन के साथ क्यों था, इस पर चिंतन ही इस रचना का उद्देश्य है। फिर किसी भावुक कर्ण का दोहन ना हो और भावनायें सही जगह समर्पित हों ऐसा प्रयास है।

महाभारत आज किसके जीवन में नहीं है? जीवन में उत्पन्न विभिन्न परिस्थितियों में निर्णय लेते समय, यदि इन ग्रंथों से मार्गदर्शन लिया जाए तो संभव है हमारे आपके जीवन की महाभारत भी समाप्त हो जाए। समर्पण किसके प्रति हो? जीवन रुपी रथ पर, इन्द्रियों रुपी अश्वों की लगाम थामे, ईश्वर रुपी सारथी के प्रति या धृतराष्ट्र रुपी मोह और दुर्योधन रुपी लालसाओं के प्रति। सक्षम होते हुए भी तथा अधर्मी ना होते हुए भी यदि जीवन में पराजय है तो हमें अपने बंधनों को पहचान कर तोडना होगा। अपने अंदर के कर्ण को सही दिशा देनी होगी। मैंने अपनी अल्प समझ से गीता का यही सार समझा है।

मुझे विश्वास है की इस रचना को भी सराहना अवश्य मिलेगी, (शायद उतनी नहीं)। "कर्ण" ने यदि आपके ह्रदय को छुआ था तो "अर्जुन" आपके मस्तिष्क पर अवश्य चोट करेगी...

अर्जुन

कर्ण, तुम मेरे भ्राता भी हो, ज्येष्ठ भी
धनुर्धर, मुझसे कहीं अधिक श्रेष्ठ भी
मित्र मोह में किन्तु समझ सके ना मर्म को
उपकृत कौशल तुम्हारा समर्पित रहा अधर्म को

मेरे अपने संकल्प का यहाँ कोई अर्थ नहीं है
तुम्हें पराजित कर सकूं, मेरा सामर्थ्य नहीं है
तुम्हारे शौर्य, पराक्रम, दानवीरता का सदैव वंदन है
तुम्हारा शत्रु यह पार्थ नहीं, केवल निज मोह बंधन है

विश्वास, लक्ष्य, संकल्प जहाँ सब अर्पित हो
प्रभु चरणों में जिनका जीवन ही समर्पित हो
निज सामर्थ्य का नहीं कभी जो गीत गाते हैं
वो वानर भी, अजेय लंका को जीत लाते हैं

कृष्ण सा सारथी जिसके भी पास है
यश और कीर्ति सदैव उसकी दास है
वह सारथी नहीं है केवल मेरे रथ का
वह स्वयं धर्म है, मैं पथिक धर्मपथ का

पराजित अहंकार था मेरा, संकल्प भग्न था
मैं क्षत्रिय जब शस्त्र त्याग कर हुआ नग्न था
वह केशव था जिसने शस्त्र पुनः धारण किया
मैं नहीं, कृष्ण ने अधर्मियों का संहारण किया

क्रिया भी, कार्य भी, जो कुछ है प्रभु है
उस विराट के समक्ष निज अस्तित्व लघु है
मन, बुद्धि, अहंकार जिसके वशीभूत, वही सर्वस्व है
सवार तो सदा से वही है, यह अर्जुन मात्र अश्व है

मैं पराजित था जब तक स्वयं युद्धरत था
युद्ध उसका था, धर्म स्थापना जिसका व्रत था
नियति अधीन है उसके, वह कालजयी है
वरना कर्ण तो सदा विजयी था, विजयी है

हे कर्ण, जीवन मूल्यों का मैंने भी मान किया है
कुल और मित्र के समक्ष अहंकार का दान किया है
किन्तु धर्म, सत्य, मानवता पर संकट के क्षण में
भविष्य पर सदा बलिदान, निज वर्तमान किया है

आत्मा अनश्वर है, देह-बंधन माया है
मैंने यही गीता अमृत उससे पाया है
स्थूल दृष्टि से परे यही चित्र है कोई
ना शत्रु है कहीं, ना मित्र है कोई

मुझे सफल कहो, सबल कहो, ना समर्थ कहो
ना धर्म का पर्याय कहो मुझे, ना ही अर्थ कहो
युगों युगों तक वंदना केवल निष्काम कर्म की होगी
विजय कर्ण की ना अर्जुन की, सदैव धर्म की होगी

© - प्रशांत सेठ


Wednesday, September 23, 2015

चिंतन

दो दिन पूर्व कर्ण के मनोविज्ञान को समझने का प्रयास करती हुई एक रचना पोस्ट की थी। तबसे अद्भुत अनुभव और प्रतिक्रियाएं भी प्राप्त हो रही हैं। रचना नितांत भावनात्मक है और एक पक्षीय चिंतन है। विशेषकर उस पराजित पक्ष का जिसे अक्सर विजय के दंभ में चिंतन के योग्य भी नहीं समझा जाता।

प्रतिक्रियाएं तो सभी प्रेरक हैं परंतु कुछ एक मश्तिष्कवादियों ने स्वयं को कर्ण और अर्जुन की तुलना में उलझा लिया। किसी ने सही गलत का फैसला सुना दिया तो किसी ने असहमति प्रदान कर दी। एक सज्जन ने तो सहानुभूति प्राप्त करने का तरीका ही कह दिया। मुझे समझ में नहीं आया की इस युग में बेचारे कर्ण को किसी की सहानुभूति से या सहमति से क्या लेना देना। एक सज्जन ने तो बर्बरीक के कथन को अंतिम सत्य कह के चिंतन पर ही विराम लगा दिया।

एक बार फिर स्पष्ट कर दूं, यह रचना केवल और केवल कर्ण के दृष्टिकोण और मनोभावों को व्यक्त करने का प्रयास भर है। उसके पक्ष को उचित ठहराने का कोई उद्देश्य नहीं है। बेचारा कर्ण आज फिर निहत्था था और विद्वानों के पूर्वाग्रह ने उसे मृत्युदंड दे दिया।

भावों के समंदर में उतरे बिना उसकी गहराई का माप बताने वालों को मैं यह बात अवश्य कहना चाहता हूँ कि...

"केवल अध्ययन से ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता। उसके साथ साथ चिंतन मनन ना हो तो नवीन विचारों की उत्पत्ति संभव नहीं है।"

एक छोटी सी रचना के माध्यम से मेरी बात..

चिंतन

कितना भी गहरा हो किन्तु
जो ठहर गया वो खारा है
चिंतन में प्रवाह हो सतत्
ज्ञान तो बहती धारा है

प्रश्न कर्ण है ना अर्जुन ही
वो सब उत्तर पा गए हैं
प्रश्न है अपनी जिज्ञासा का
हम कहाँ तक आ गए हैं?

विशिष्ट विचार बोध केवल
अहंकार है, भ्रम मात्र हैं
तर्क वितर्क में ज्ञानी उलझें
जिज्ञासा तो सदैव छात्र है

विजयी लिखते इतिहास सदा
पराजित सहता उपहास है
जय पराजय सब क्षणभंगुर
कालचक्र में विलुप्त श्वांस है

धर्म की सदा विजय होती या
विजयी कथन ही धर्मशास्त्र है
इस पर भी चिंतन करने की
समग्र दृष्टि किसके पास है?

कहें बर्बरीक, देव या यम
या कहते हों कृष्ण स्वयं
सत्य अन्वेषण धर्म यही है
चिंतन प्रवाह ना जाये थम

© - प्रशांत सेठ

Monday, September 21, 2015

कर्ण

जीवन में अक्सर उन लोगों को पिछड़ते देखा है जो नैतिकता और सिद्धांतो को ज़्यादा महत्त्व देते हैं, संबंधों को निभाते हैं, भावनाओं को जीते हैं। जो इन्हें त्याग देते हैं, वो आगे बढ़ जाते हैं। यह सफलता (केवल भौतिक) प्राप्त करने का मन्त्र आज भी है, कल भी था और शायद कल भी रहेगा।

समाज के इस चेहरे को दर्शाने के लिए उस युग का केवल सन्दर्भ लिया है। कर्ण और अर्जुन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों अपनी अपनी जगह सफल हैं और अपने अपने दृष्टिकोण से संतुष्ट भी। फर्क है तो दोनों की दृष्टि में सफलता के अर्थ का। एक जीने के लिए रिश्तों को त्याग रहा है; दूसरा रिश्तों के लिए जीवन को। लेकिन एक कड़वा सच ये भी है की सांसारिक दृष्टि में सफल तो अर्जुन को ही माना जाता है।

आज के युग के सफल अर्जुनों को नमन करते हुये एक नवीन दृष्टिकोण केवल भावुक लोगों के लिए। एक आवश्यक बात और। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है की जब बात देश, समाज, धर्म और सत्य की हो तब ऐसी निजी भावुकता को त्याग देना चाहिए। संभवतः उस युग के कर्ण की पराजय इसलिए आवश्यक भी थी और हुई भी।

निवेदन: यह रचना कर्ण और अर्जुन के चरित्र का तुलनात्मक अध्ययन नहीं है, केवल कर्ण के मनोविज्ञान को समझने का एक छोटा सा प्रयास मात्र है। इतिहास साक्षी है की पराजित वर्ग के विचारों को, भावनाओं को अधिकांश लोग चिंतन में स्थान नहीं देते। मेरी इस धृष्टता को क्षमा करें।

कर्ण

पार्थ, तुम सफल हो, सबल हो, समर्थ हो
धर्म का पर्याय तुम, आज तुम ही अर्थ हो
युगों युगों तक तुम्हारा यशोगान होना है
मैं तो कर्ण हूँ, पराजय ही मेरे नाम होना है

कौशल में कहो, कहाँ तुमसे मैं कम हूँ
किन्तु पराजित हूँ आज और अक्षम हूँ
सच तो यह है, अपने भाग्य का मैंने ही हरण किया है
मैंने स्वयं ही बढ़कर पराजय का वरण किया है

अपनी ही सेना का भक्षक, फिर भी परमार्थी
मैंने चाहा ही नहीं ऐसा धर्मरथ, ऐसा सारथी
मित्र से घात, ये मेरा संस्कार नहीं है
जीवन का ये मूल्य, मुझे स्वीकार नहीं है

होकर भी नहीं रहा अपनी माता की संतान
मैं जानता हूँ रिश्तों की कीमत, उनका मान
अभिमन्यु, घटोत्कच के शवों पर विजय गान
मैं नहीं ले सकता स्वार्थ के लिये, पुत्रों का बलिदान

चढ़कर एकलव्य के अंगुष्ठ सोपान पे
या फिर रथ पर मिथ्या अभिमान के
विजयश्री आई है तुम्हारे पास चलकर
किन्तु कीमत पर निज आत्मसम्मान के

मैं निष्प्राण होकर भी जीवित स्वाभिमान हूँ
मैं नहीं कपटपूर्ण कवच कुंडल का दान हूँ
शस्त्रविहीन, उसपर मर्यादाओं में कसा हुआ
हाँ, मैं रथ का पहिया हूँ, धरती में धंसा हुआ

लिया नहीं छल असत्य का सहारा
मैंने किसी अश्वत्थामा को नहीं मारा
इस दृष्टि से भी देखो अर्जुन, ये चित्र है तुम्हारा
मैं कर्ण हूँ, जो हारकर भी नहीं हारा

मैं केवल अग्नि नहीं, जल भी हूँ, समीर भी
मैं क्षत्रिय वीर हूँ, सूतपुत्र भी, दानवीर भी
मैं जीवन मूल्यों का सदा ही मान करता हूँ
इसलिए, ऐसी विजय मैं तुम्हे दान करता हूँ

भेद सकता है लक्ष्य को तुम्हारा हर तीर
दांव पर लगा सकते हो तुम द्रौपदी का चीर
सफल रहते हैं कदाचित, तुम जैसे ही संसार में
भावनाओं से शून्य लोग, स्वार्थ के प्रति गंभीर

अर्जुन, तुमने सदा चिड़िया की आँख देखी है
और मैंने चिड़िया की आँखों में दर्द देखा है
मेरी पराजय और तुम्हारी अपराजय के बीच
भावुकता की यही एक महीन सी रेखा है

© - प्रशांत सेठ

Sunday, September 6, 2015

एक भाव ह्रदय का

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें

परिभाषा किसी भी रिश्ते को बाँध देती है, शर्तों में। प्रत्येक सम्बन्ध किसी ना किसी अपेक्षा के इर्द गिर्द ही घूम रहा है। परिभाषित रिश्तों में एक दूरी भी होती है। लेकिन एक रिश्ता है जहाँ कोई परदा नहीं होता। जो अनंत है और शाश्वत है।

अपेक्षा रहित सच्ची मित्रता ईश्वर का ही तो दर्शन है। मित्र में ईश्वर और ईश्वर में मित्र को महसूस करती हुई और इच्छाओं और अपेक्षाओं के कारावास से निकालकर, उसको ह्रदय के गोकुल में ले जाने का प्रयास करती हुई एक रचना ....

एक प्रश्न का लेकर के बोझ
मेरा मन भटकता है रोज
शायद आज पूर्ण हो जाये
उस शाश्वत रिश्ते की खोज

ना निर्मित का निर्माता से
ना पुत्र का जैसे माता से
इन रिश्तों में एक दूरी है
दूरियां कैसी विधाता से?

हर रिश्ते में है शर्त कड़ी
मर्यादा की दीवार बड़ी
और मुझे स्वीकार नहीं है
ये बंधनयुक्त जकड़ा जकड़ी

फिर.....

क्या भक्ति ही एक संबंध है?
या वो भी सिर्फ अनुबंध है?
तुम्हारे गुणों के गान में
मुक्ति का ये कैसा प्रबंध है?

भय है, ज्ञान है, जिज्ञासा है
या फिर कोई अभिलाषा है
इस युग में तुम्हारी भक्ति की
सबकी अपनी परिभाषा है

कुछ रस्मों का संधारण है
या फिर दुखों का निवारण है
मैंने अपनी भक्ति में देखा
स्वार्थ ही एकमात्र कारण है

तुम्हारी हर इच्छा अव्यक्त है
और मेरा सब कुछ व्यक्त है
इसी अपूर्ण रिश्ते का नाम
क्या भगवान है और भक्त है?

नहीं....

भक्ति का एक और रूप है
ना परिभाषित ना कुरूप है
सुन्दर सा एक रिश्ता है जो
निश्छल प्रेम का स्वरुप है

इस रिश्ते में शर्त नहीं है
स्वार्थ की कहीं पर्त नहीं है
यही इसकी सुंदरता है कि
छुपा हुआ कोई अर्थ नहीं है

जैसे....

ब्रजबाला का नन्दलाल से
या गऊओं का गोपाल से
मुरली का जैसे तुम्हारी
श्वांसों के सुर और ताल से

तो फिर....

सम्बन्ध हो मित्र सुदामा सा
या फिर ऊधव श्रीदामा सा
अव्यक्त होकर भी व्यक्त हो तुम
जिधर प्रेम हो सखी राधा सा

© - प्रशांत सेठ

Saturday, August 15, 2015

एक बेताल की व्यथा

कल रात सारा देश जब एक दूसरे को शुभकामनायें देने में व्यस्त था, मैं अपनी तलाश पर निकल चुका था। अंत में मेरी तलाश तो पूरी हो गई मगर मैं भाषण और जलसों से चूक गया। इस बार स्वतंत्रता दिवस पर शुभकामनाएं नहीं दूंगा; बल्कि एक कथा सुनाऊंगा, विक्रम बेताल की...

आखिर फुटपाथ पर सोता हुआ मिल गया
उसकी दुर्दशा देखी तो मैं हिल गया
पास जाकर देखा सांस चल रही थी
फिर भी आँखों में एक उम्मीद पल रही थी

मैंने कहा बाबा उठो, रात भर ढूँढ़ ढूँढ़ कर परेशान हो चुका हूँ
तुम निष्ठा की तरह गायब हो, मैं हिंदुस्तान हो चुका हूँ
क्या आज के दिन भी तुम्हें इस तरह से सोना चाहिये?
वहाँ लाल किले पर भाषण होना है, जल्दी आइये

वो बोला, शायद फिर से पंद्रह अगस्त आ रहा है
इसलिये इतनी व्यग्रता से मुझे ढूँढ़ा जा रहा है
चलो चलता हूँ, आज के भाषण में तो मुझे होना होगा
कल भले ही मेरी किस्मत में फुटपाथ का कोना होगा

लेकिन एक शर्त है, मैं तेरी पीठ पर चढूँगा
अपने पैरों से एक कदम भी नहीं चलूँगा
बेताल की तरह मुझे कांधों पर ढोना तेरी मजबूरी है
मैं राष्ट्रवाद हूँ, इसलिए तुझे विक्रमादित्य होना ज़रूरी है

रास्ते भर मैं अपनी कथा सुनाऊंगा
अड़सठ बरस की व्यथा बताऊंगा
और अपने कुछ प्रश्नों का जवाब मांगूंगा
आज़ादी के बाद का पूरा हिसाब मांगूंगा

सिर्फ भाषण और जुलूस में नहीं सम्मान चाहिए
मुझे हर हालत में समस्या का समाधान बताइये
सच तू बोल नहीं सकेगा, झूठ मैं सुन नहीं पाऊंगा
और उत्तर ना दिया तो किसी पेड़ से लटक जाऊंगा

अब सुन, आज़ादी के पहले मेरी बड़ी शान थी
आज फुटपाथ पर हूँ, तब ज़िन्दगी आलिशान थी
मुझसे अंग्रेजी हुकूमत भी थरथराती थी
बच्चे बच्चे में मेरी छवि नज़र आती थीं

मैं था तब सत्याग्रहियों की टोली में
स्वाभिमान की खद्दर वाली झोली में
मैं था विलायती कपड़ों की होली में
मैं था आज़ाद की अंतिम गोली में

गर्मी में, बरसात में या सर्दी में
मैं रहता था सुभाष की वर्दी में
मैं था उन जेलों में अंडमान की
भविष्य जहाँ लेता था आहुति वर्तमान की

वो बूढा जब आधी धोती में अड़ा रहता था
तब हिंदुस्तान सर उठाकर खड़ा रहता था
गूंजते थे धरती गगन स्वाधीनता के नारों से
मैं मरा नहीं कभी गोरों के अत्याचारों से

आज मैं मर रहा हूँ दस लाख के सूट में
कोयले की खदानों में, व्यापम की लूट में
मेरा जीवन संसद की तरह ठप्प है
मेरा अस्तित्व छप्पन इंच छाती जैसी गप्प है

मैं पूछता हूँ उनसे भी जो विपक्ष में बैठे हैं
किस बात का गुरूर है, किस बात पे ऐंठे हैं?
ये संसद जागीर नहीं है तुम्हारे बाप की
ये देश क्यों ढोता है गठरी किसी के पाप की?

अंत में, मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम वर्तमान हो
और उनसे भी जो भविष्य का हिंदुस्तान हो
तुम भी तो रिश्वत और घूसखोरी के आदि हो
तुम राष्ट्र की शक्ति नहीं, महज़ सवा सौ करोड़ की आबादी हो

बिस्मिल और अशफ़ाक़ुल्लाह के देश में
तुम उलझे हो मंदिर मस्जिद के क्लेश में
स्वार्थ कबसे मज़हब का मर्म हो गया?
बोलो, राष्ट्र से ऊँचा कबसे धर्म हो गया?

मैंने कहा हे राष्ट्रवाद, माना के आपके प्रश्न सटीक हैं
लेकिन आप फुटपाथ पर ही भले हैं, ठीक हैं
इसके आगे मेरा स्वर गले में अटक चुका था
और राष्ट्रवाद? वो तो कबका पेड़ पर लटक चुका था

© - प्रशांत सेठ

Monday, July 27, 2015

सुखन

हमारे एक मित्र (बड़े भाई) होते हैं ______ उर्फ़ उस्ताद। बहुत ही खतरनाक आदमी हैं। खतरनाक इसलिये क्योंकि दिल से पाक-साफ़ हैं। अब आप सोच रहे होंगे की पाक-साफ़ आदमी खतरनाक कैसे हो सकता है? अरे भाई जब नवाज़ शरीफ, शरीफ हो सकता है तो हमारे उस्ताद भी खतरनाक हो सकते हैं। आगे का वाकया पढ़के खुद ही समझ लीजिये।

तो हुआ यूँ की कल उनसे एक शेर हो गया। हो गया तक तो ठीक, मगर वो शेर फेसबुक की अदालत में पेश हो गया। दुर्भाग्य से वो गरीब शेर, लाइक और कमेंट्स के फेसबुकिया अनुदान से वंचित रह गया। हमारे उस्ताद ने मान लिया की शेर ठीक नहीं हुआ इसलिये उसे सज़ा-ए-मौत सुना दी। अब शेर है मियां, कोई याकूब मेमन तो है नहीं की फांसी दे दो। हमने अपील दायर की; हुज़ूर शेरों की औकात को फेसबुक के लाइक्स और कमेंट से नहीं तौला जाता। उन्होंने प्रश्न किया, फिर कैसे तौला जाता है?

इस प्रश्न के उत्तर में एक ख्याल, व्याकरण से बहुत दूर मगर अन्तःकरण के पास, आपकी अदालत में पेश है...

बहर रदीफ़ काफिये से ही, मत समझो शेर हुआ
भीग जाये मन तुम्हारा, तब समझो शेर हुआ

गोर-ए-दिल में दफ़्न कई, अफ़साने तो हैं लेकिन
ज़ख्म कोई जब बह निकले, तब समझो शेर हुआ
(गोर = कब्र)

कहने को बज़्म में उनकी, हर कोई ही शायर है
लफ़्ज़ों में जब दर्द उतरे, तब समझो शेर हुआ

बात पुरानी हो जाती है, इस पल की उस पल में
वक़्त दोहराये लफ़्ज़ों को, तब समझो शेर हुआ

अशआरों के तीर नहीं, पल भर को तड़पाते है
इसी दम गर जाँ निकले जब, तब समझो शेर हुआ
अशआर = शेर

आह वाह की बैसाखी पे, दूर कितना जायेगी
बात फलक तक जा पहुंचे जब, तब समझो शेर हुआ

जज़्ब हैं एहसास कई 'सेठ' की इस खामोशी में
ज़ुबाने-कलम जब आ निकलें, तब समझो शेर हुआ

© - प्रशांत सेठ

Saturday, July 11, 2015

गुरु भजन

जन्म जन्मों से भटकते हुये मानव मन को त्रिविध तापों से मुक्ति दिलाने वाले और शीतलता प्रदान करने वाले गुरु चरणों में समर्पित ...

गुरुवर मेरे व्याकुल मन को, शीतलता अब पाने दो
पावन चरणों से तुम्हारे, आज मिलन हो जाने दो

ज्ञान ज्योति पाकर भी मैं, समझ सका ना उसका सार
व्याप्त था जीवन में मेरे, गहन अज्ञान और अंधकार
भक्ति के विस्मृत मेघों को, मन पटल पर अब छाने दो
गुरुवर ...

कामनाओं का गगन असीम, मैं उड़ता था पंख पसार
खूब किया मैंने अपनी, इच्छाओं के नभ का विस्तार
स्वप्न के पीछे उड़ता पंछी, साँझ ढले घर आने दो
गुरुवर ...

अश्रु भरे इन नयनों से ,बरस रहा है प्रेम अपार
भाव ह्रदय को पिघला कर, मथ रहा है बारम्बार
आज अविरल इन आँखों से, भावों को बह जाने दो
गुरूवर मेरे व्याकुल मन को शीतलता अब पाने दो

चरण अनुरागी
प्रशांत सेठ