Tuesday, January 22, 2019
धर्मक्षेत्रे चुनावक्षेत्रे
Sunday, December 23, 2018
डरना जरूरी है
तुम्हें डरना भी चाहिए
जब
तुमने किया हो शोषण
हद से ज़्यादा
व्यक्ति का या व्यवस्था का
तुम्हें डरना भी चाहिए
तुमने लिया ही लिया हो
समाज से
मगर दिया कुछ भी नहीं
तुम्हें डरना भी चाहिए
जब
परखा हो तुमने
बार बार
किसी की सहनशीलता को
तुम्हें डरना भी चाहिए
जब
तुम्हें मोह हो
सिर्फ अपनी मान्यताओं से
और बदल नही पाओ तुम
बदलती दुनिया के साथ
यहाँ डरने जैसा कुछ भी नहीं
अगरचे
तुमने किया हो सम्मान
औरों की भी आज़ादी का
अगरचे
तुम नहीं हो समर्थक
धर्म के तालिबानी संस्करणों के
Saturday, November 17, 2018
बीज-गणित
Sunday, October 14, 2018
#MeToo
एक स्वप्न आँखों में लेकर
लक्ष्य दूर से दिखलाकर मैं
आगे अकेले बढ़ने दूँगा
उसको उसकी दुनिया खुद ही
देखना, मैं गढ़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
सहारों के खोने पर ही
पा लेता है कोई खुदको
आसमान में उड़ना है तो
थोड़ा धरती पर भी फुदको
अपने पंख जब खोलेगी
मैं उसे तब उड़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
सिद्धांतों की पगडंडी पर
संस्कारों का कुछ धन देकर
चरित्र प्रथम है सदा लक्ष्य से
ऐसा ही इक दृढ़ मन देकर
सफलता के सोपानों पर
हौले हौले चढ़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
सही गलत का ज्ञान हो तो
मन विवेक से स्वयं सध लेगा
बाहर दुनिया नहीं बदलती
जीवन भीतर से बदलेगा
साहस का इक बीज बो कर
धूप वक़्त की पड़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
भौतिकता की अंधी दौड़ में
समझौतों की राह न पकड़ना
मीटू वीटू क्या होता है
शोषण से तत्क्षण भिड़ना
पाठ जीवन की किताब से
निर्भयता का पढ़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
समक्ष अन्याय के मौन ना रखना
सब खोने का स्वाद भी चखना
तुम द्रौपदी हो माना मैंने
किसी कृष्ण की राह ना तकना
सहारों की आस छुड़ाकर
दुर्गा बनकर लड़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
धन पद सत्ता की भूख
तज कर मन को करो स्वतंत्र
अपनी शर्तों पर जीने का
एक यही होता है मंत्र
मृत्यु के भी भय से मुक्त
राह कर्म की बढ़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
© - प्रशांत सेठ
Thursday, September 20, 2018
विक्रम वेताल
किसी देश में एक राजा विक्रमादित्य था
भुजाओं से क्षत्रिय, बुद्धि में पांडित्य था
योगी का आदेश जब संकल्प में बदलने लगा
वो सच्चा शिष्य
अच्छे दिनों की तलाश में निकलने लगा
योगी ने कहा
घनघोर काली अमावस की रात में चलना
हाथ में तलवार, हृदय में साहस रखना
मरघट के वीराने में एक सूखा हुआ दरख़्त है
डरना मत विक्रम, तू तो राम का भक्त है
इसी वृक्ष पर एक लाश लटकती है
जिसकी हँसी नीरवता में खटकती है
उसी लाश को उतार कर लाना है
मेरे यज्ञ की बलिवेदी पर चढ़ाना है
मगर सावधान
इस वृक्ष पर अनगिनत शाखायें हैं
एक को काटो तो दूसरी निकल आती है
और वो लाश फिर वृक्ष पर लटक जाती है
उसको लाने की एक ही शर्त है, मौन रहना
किसी भी सूरत उसके प्रश्न का उत्तर ना देना
मगर इसमें भी प्राणों पर संकट आयेगा
अगर उत्तर मालूम होते हुए भी ना दिया
तो सर फट जायेगा
विक्रम ना दलित था, ना सवर्ण था
राष्ट्रवाद ही उसका वर्ण था
पेट्रोल की कीमत से बेपरवाह, विक्रम अश्वधारी था
उसे पता भी नही था, डॉलर क्यों रुपये पर भारी था
राजा लोग रोजगार की फिक्र नही करते
भरे पेट वाले महँगाई का ज़िक्र नही करते
जो भुजाओं से होते हैं सबल,
जिनमें होता है बुद्धि का बल
वो भक्ति पहले करते हैं,
चिंता करते हैं कल
विक्रम की कुल परंपरा सनातन संस्कृति की अनुगामी थी
इसलिए सही या गलत, योगी की हर बात में हामी थी
आगे की कहानी सब जानते हैं
बेताल पहेलीनुमा बहुत सी कथायें सुनायेगा
राजा उत्तर पे उत्तर दिए जाएगा
विक्रम पहेलियों में उलझकर फिर त्रस्त होगा
योगी अपने अनुष्ठान में फिर मस्त होगा
काश कोई चेतना विक्रम को जगा जाती
आँख से असत्य का आवरण हटा पाती
काश मन और विवेक में घर्षण होता
तब शायद इस दृश्य का दर्शन होता
ये मरघट सी नीरवता भारत देश की है
इस प्रजातंत्र की कहानी स्वार्थ और द्वेष की है
संस्कृति और सिद्धांत के पत्ते झड़ चुके हैं
इसकी जड़ में अकर्मण्यता के कीड़े पड़ चुके हैं
इसे त्याग और श्रम के जल से नहीं,
रक्त से सींचा गया है
माली की प्रवृत्ति वही है,
बस चेहरा नया है
इस वृक्ष पर चोटें हैं बेहिसाब युद्धों की
ये अनगिनत शाखायें हैं विभिन्न मुद्दों की
कहीं भ्रष्टाचार है, कहीं धार्मिक बवाल है
कहीं घोटालों का उपजता सवाल है
नक्सलवाद, जातिवाद, कश्मीर का मवाद है
कहीं आरक्षण, तो कहीं किसानों का उन्माद है
एक डाल कटेगी, दूसरी पर लटक जाएगा
ये बेताल, दीमक की तरह इस वृक्ष को खायेगा
उधर जनेऊधारी विधर्मी भी शिवभक्त बनकर लुभाते हैं
कभी सोमनाथ कभी कैलाश की यात्रा पर जाते हैं
धार्मिक उन्माद के रास्तों की यही विडंबना है
साँप से बचो तो, नाग गले पड़ जाते हैं
शायद यही कलयुग का अब चरम है?
शायद राष्ट्रवादी अनुष्ठान भी मात्र एक भरम है?
धैर्य चुक जायेगा एक दिन, कभी तो मौन टूटेगा
क्रोध का लावा किसी दिन, विक्रम का भी फूटेगा
सुना था प्रजातंत्र में, ऐसी कोई नीति है
प्रधान सेवक होता है, जनता राजा की तरह जीती है
लेकिन योगी के जाल में फँसे विक्रम की यही आपबीति है
वेताल के भेष में, ये देश की राजनीति है
छद्म योगियों की भक्ति में विक्रम
जब जब भटका है
स्वार्थ की लड़ाई में राष्ट्र का उत्थान
तब तब अटका है
और प्रजातंत्र के वृक्ष पर राजनीति का बेताल
आज भी लटका है
© - प्रशांत सेठ
Sunday, August 5, 2018
एक नया अंदाज़-ए-गुफ्तगू
"रिश्ते"
रिश्तों के समंदर में, उतर जाओ मगर यूँ
भीगे भी रहो साहब, तुम डूबो भी नहीं
"जिंदगी"
जिंदगी के हर सितम को, सह जाओ इस तरह
खामोश ना रहो ठीक, तुम चीखो भी नहीं
"सियासत"
हालात हैं ऐसे इस, दौर-ए-सियासत में
खुलती नहीं आँखें अगर, तुम मींचो भी नहीं
"बुराई"
ये माना के हर तरफ, पाप है बुराई है
कटे ना ये शज़र तुमसे, तो सींचो भी नहीं
"फासला"
इतनी ही पसंद हमको, दूरी-ए-दरमियाँ
थामे भी रहो बाँहों में, तुम भींचो भी नहीं
"आँसू"
एहसास की सीपें हैं, दिल की गहराई में
आँसू ना सहेजो मगर, तुम बेचो भी नहीं
"गुफ्तगू"
सीखना चंद लफ़्ज़ों में, कहना सुनना "सेठ"
वक़्त-ए-जिंदगी कम है, तुम खींचो भी नहीं
© - प्रशांत "सेठ"
Sunday, July 29, 2018
एक पाठक की कविता
आजकल डर लगता है पढ़ने से
कागज़ से उठती हुई भड़ास
अपूर्ण इच्छाओं की टीस
रिश्तों में अपेक्षाओं की कड़वाहट
कवि के अवसाद का वमन
सच कहूँ तो डर लगता है
जब यथार्थ से दूर तुम ले जाते हो
श्रृंगार की स्वप्निल दुनिया में
जहाँ से लौटना पड़ता है मुझे तन्हा
प्रिय कवि
तुम मत लिखना अपने मन की पीड़ा
तुम लिखना
पीड़ा सिर्फ और सिर्फ समाज की
या फिर तब लिखना
जब एक हो जाये
तुम्हारी और समाज का दर्द
खड़े करना प्रश्न विसंगतियों पे
मगर एक शर्त है
हल भी देना होगा ढूँढ के
तुम्ही को
मत छोड़ देना मुझे ले जाकर
उसी अंधी गली में फिर
जहाँ छोड़ गयी थी मुझ को
सियासत
मैं युगों से भटक रहा हूँ अंधेरों में
उनकी तलाश में
जिनके पास है पता
रोशनी का
क्या तुम्हारे पास है तरकीब?
जिससे निकल सके
यथार्थ के छत्ते से
जीवन की शहद
तुम लिखना अवश्य लिखना
मैं ज़रूर पढूँगा उसे
जो होगी इस मुर्दा समाज में
एक ज़िंदा कलम
© - प्रशांत सेठ





