Tuesday, January 22, 2019

धर्मक्षेत्रे चुनावक्षेत्रे

कुरुक्षेत्र (चुनाव) के मैदान में इस बार अर्जुन (वोटर) फिर भ्रमित था। ई वी एम के सामने उसने अपना अँगूठे रूपी गाण्डीव को घर दिया। तभी केशव (चुनाव अधिकारी के रूप में) प्रकट होते हैं।

केशव - वोट डालो पार्थ!

अर्जुन - नहीं केशव, यह मुझसे नहीं होगा। यह पंजा, फूल, हाथी, साईकल, झाड़ू सभी मेरे अपने हैं। सभी मेरे विकास की बात कर रहे हैं। मैं इनमें से किसके लिए अड़ूँ? मुझे तो यह भी समझ में नहीं आ रहा कि ये सब आपस में क्यों लड़ रहे हैं? तुम धर्मराज को समझाओ कि युद्ध व्यर्थ है, राष्ट्रधन की बर्बादी है। मैं असमंजस में हूँ केशव।

केशव - उठो पार्थ! क्या तुम्हें द्वापर में दिया ज्ञान विस्मृत हो गया है?

अर्जुन - नहीं केशव, मुझे भली प्रकार से याद है, तुम्हारे कहने पर ही मैंने इस विचार को धारण किया है कि "मैं देह नहीं आत्मा हूँ"। मुझे प्रत्येक जीव में आत्मा रूपी तुम्हारा ही अंश दिखाई देता है। फिर यह घृणा कैसी और प्रीति भी कैसी केशव?

केशव - पार्थ, युगों तक बारम्बार जन्म जीवन और मरण के चक्र में पड़कर जीवात्मा स्वयं का एक स्वभाव प्राप्त कर लेती है। मन बुद्धि अहंकार रूपी चित्त इसी स्वभावानुसार पसंद नापसंद को धारण कर लेता है। उसके संचित कर्म उसके अवचेतन में स्मृति रूप में दर्ज रहते हैं, जो प्रारब्ध कहलाते हैं। इसी कारण उसके चित्त में कुछ पूर्व धारणाएं बनी रहती हैं। यही उसका स्वभाव बन जाती हैं और इन्ही के प्रभाव में जीव नए कर्म करता है। यही कर्म का चक्र है पार्थ।

अर्जुन - जैसे मुझे अश्व और श्वान प्रिय प्रतीत होते हैं, परंतु सर्पों की ओर दृष्टि करना भी रुचिकर नहीं है। किंतु इस संसार में ऐसे लोग भी हैं जो सर्पों को गले में लटकाए घूमते हैं। जैसे यह भोली भाली प्रजा, यहाँ तक की स्वयं भगवान भोलेनाथ भी। कदाचित इसीलिए बहुत से राजनेता कैलाश की ओर उन्मुख हैं प्रभु।

केशव - इस सृष्टि में सर्पों की भी अपनी उपयोगिता है। सृष्टि के संतुलन के लिए प्रत्येक प्रजाति उपयोगी है। सर्पों के कारण चूहे नियंत्रित रहते हैं, अन्यथा धरा पर उनका आधिपत्य हो जाता। मैंने कुछ भी निरर्थक नहीं बनाया पार्थ। तुम्हारी निजी पसंद-नापसंद का यहाँ कोई महत्व नहीं है। राष्ट्रधर्म की रक्षार्थ वोट डालना ही होगा पार्थ।

अर्जुन - प्रभु, ये कैसी विडंबना है। प्रत्येक जीव में आत्मा रूपी तुम्हारा ही दर्शन कर रहा हूँ। परंतु इन ठगों में और शोषकों में भी तुम हो? दुर्योग से धन संग्रह करने वाले दुर्योधनों में भी तुम हो? ये कैसी लीला है केशव?

केशव - हाँ अर्जुन, मैं उनमें भी हूँ। पक्ष में भी, विपक्ष में भी, मैं ही हूँ। मैं ही जनता जनार्दन हूँ। मेरे द्वारा प्रदत्त समर्थन से इनकी राजनीतिक महत्वकांक्षाएं को प्राण मिलते हैं। मेरे दिव्य स्वरूप का दर्शन करो पार्थ।

(भगवान अपने विराट स्वरूप में आ जाते हैं)

केशव - मैं ही शोषक में हूँ, मैं ही शोषित में हूँ। जिस प्रकार कई युगों से बारम्बार जन्म लेते लेते तुमने अपना चित्त प्राप्त किया है, उसी प्रकार इन्होंने भी किया है पार्थ।

पार्थ - आपने तो मुझे और भ्रमित कर दिया केशव। अब इतने सारे शोषकों और ठगों में से मैं किसको चुनूँ? मैं अपने शोषण का अधिकार किसको दूँ, हे केशव।

केशव - मैं सम-भाव से प्रत्येक जीव में हूँ। मैं ही प्राण स्वरूप हूँ। मैं ही चेतन रूप आत्मतत्व हूँ। मैंने मनुष्य को जन्म दिया है, किंतु इन्हें ठग और शोषक तो तुमने बनाया है पार्थ।

अर्जुन (फटी फटी आँखों से) - मैंने? वो कैसे केशव?

केशव - गौर से देखो पार्थ। तुम्हारे जीवन में इन ठगों और शोषकों का प्रवेश कैसे हुआ? तुम्हारे व्यक्तित्व में कुछ कमियाँ हैं और इन्ही चोर दरवाजों से ये प्रवेश करते हैं पार्थ।

अर्जुन - मैं समझा नहीं केशव।

केशव - तुम्हारा लोभ ही ठगों को जन्म देता है और तुम्हारा भय ही शोषण को आमंत्रण देता है। तुम मुफ्त राशन, आरक्षण, कर्ज माफी, मुफ्त बिजली पानी सब चाहते हो। तब कोई दुर्बुद्धिमान मनुष्य ठग बनकर उत्पन्न हो जाता है। जब तुम्हारे भीतर भय का जन्म होता है, तभी किसी शोषक का भी जन्म होता है पार्थ। जब तुम अहंकारी हो रहे होते हो तो कहीं कोई चापलूस भी जन्म लेता है। जब तुम दूसरे मनुष्यों के भीतर के ईश्वर को नकार देते हो, तब कोई तुम्हें मंदिर के स्वप्न दिखाता है, तो कोई 72 हूरों की जन्नत का। जब तुम व्यवहारिकता को त्याग कर अति भावुक होते हो, तब तुम्हें उकसाकर ठग लेना सरल हो जाता है पार्थ। यही सृष्टि में संतुलन बनाये रखने की मेरी प्रक्रिया है।

अर्जुन - प्रभु!

केशव - तुम कलयुगी अर्जुन हो, इसीलिए तुम्हें तुम्हारी भाषा में समझाता हूँ। इस युग में मनुष्य स्वार्थ और मोह में अंधा है। मोह से ही भय उत्पन्न होता है। मैंने द्वापर में भी समझाया था कि इस नश्वर देह और जीवन से मोह कैसा? निष्काम भाव से कर्म ही मुक्ति का उपाय है। परंतु गीता की कसम खाते खाते तुम कब गीता को ही खा गए, तुम्हें इसका बोध नहीं है।

सुनो पार्थ, तुम्हारे संचित कर्म और चित्त के बंधन पुनः इसी धरा पे जन्म लेने को बाध्य करेंगे। तुम स्वार्थी हो इसीलिए भावी पीढ़ी की चिंता भले ही मत करो, परंतु अपने ही अगले जन्मों की चिंता अवश्य करो। ये पंजा, फूल, हाथी, साईकल, झाड़ू तुम्हें तब भी मिलेंगे।

अर्जुन - उपाय क्या है केशव? इस राजनीतिक चक्रव्यूह को कैसे तोड़ूँ प्रभु।

केशव - जिस प्रकार यह संसार तुम्हारी अपनी कमियों का छाया रूप है, उसी प्रकार इस ईवीएम से भी तुम्हारे अपने कर्मों की प्रतिध्वनि ही सुनाई देगी। इसलिए अपने लोभ को, भय को, अहंकार को मारो पार्थ। सत्य और ईमानदारी को धारण करो। तभी किसी सच्चे नेता का उदय होगा। जिस प्रकार लोभ से ठगों का अस्तित्व है, भय से शोषक का; उसी प्रकार सत्य, ईमानदारी, निर्भयता से राष्ट्रधर्म का अस्तित्व है और निस्वार्थ वोटर से कर्मठ नेतृत्व का।

वोट जरूर डालना पार्थ!

केशव तो अंतर्ध्यान हो गए। अब कुरुक्षेत्र में अर्जुन और उसका गाण्डीव ईवीएम को मुस्कुराकर देख रहे हैं।

© - प्रशांत सेठ


Sunday, December 23, 2018

डरना जरूरी है

डर लगता है?
तुम्हें डरना भी चाहिए
जब
तुमने किया हो शोषण
हद से ज़्यादा
व्यक्ति का या व्यवस्था का

डर लगता है?
तुम्हें डरना भी चाहिए
जब
तुमने किया हो संग्रह
हद से ज़्यादा
धन का या घृणा का

डर लगता है?
तुम्हें डरना भी चाहिए
जब
तुमने लिया ही लिया हो
समाज से
मगर दिया कुछ भी नहीं

डर लगता है?
तुम्हें डरना भी चाहिए
जब
परखा हो तुमने
बार बार
किसी की सहनशीलता को

डर लगता है?
तुम्हें डरना भी चाहिए
जब
तुम्हें मोह हो
सिर्फ अपनी मान्यताओं से
और बदल नही पाओ तुम
बदलती दुनिया के साथ

अन्यथा
यहाँ डरने जैसा कुछ भी नहीं
अगरचे
तुमने किया हो सम्मान
औरों की भी आज़ादी का
अगरचे
तुम नहीं हो समर्थक
धर्म के तालिबानी संस्करणों के

© - प्रशांत सेठ


Saturday, November 17, 2018

बीज-गणित

भाव, भाव से विचार, और विचार से जन्म लेता है कर्म। स्वार्थ अहं से मुक्त भाव जन्म देता है निष्काम कर्म को ...

तुमने देखा होगा
प्रतिकूलताओं की धूप
और कीचड़ में
एक बीज धारण कर लेता है
जब कठोरता का आवरण
परिस्थितियों की मिट्टी तले
जड़ें जमाने को संघर्षरत
उसके भीतर
गहरे में कहीं रह जाती है शेष
थोड़ी सी कोमलता
देख लेती है प्रकृति
कोमल अन्तःकरण में
एक विराट वृक्ष की
संभावना

लेकिन
तुमने सोचा ना होगा
कैसे हो सकती है?
पाषाण के हृदय में उर्वरता
यदि सोच पाते
तो कर लेते किसी दिन
पाषाण के विग्रह में
शिव का दर्शन

तुमने देखा भी होगा
बीज का वृक्ष में परिवर्तन
लेकिन ढूँढ़ा है कभी?
सृजन के पश्चात बीज का अस्तित्व
यदि ढूँढ़ पाते
तो फिर कभी ना पूछते पता
ईश्वर का

पत्ती में, डाली में, जड़ में
फूल में और शूल में
मित्र में, शत्रु में
अनूकूल में, प्रतिकूल में
उतना ही औरों में
जितना कि खुद के भीतर
तुम ढूँढ ही लेते अस्तित्व
सृष्टि के बीज का

कभी मिल जाए तो पूछ लेना
किसी बीज से
या खुद ही कर देखना
कोई निःस्वार्थ सृजन
फिर कभी नही पूछोगे
कैसे कर सकता है कोई
गुणों से प्रेम, अ-गुणों से भी प्रेम
खुद से अधिक
खुद की रचना से प्रेम

कैसे
प्रेम के निराकार
एक छोटे से बीज में समाहित
विराट संभावना
लेती है सृष्टि का आकार
जान लेते हैं जानने वाले
बीज बनकर
बीज के मर्म को

तुम्हारी जिज्ञासा
बुद्धि के रथ पर सवार
जिसका सारथी हो शुद्ध प्रेम
जब चल देगी
चिंतन की राह पर
कौन रोक पाएगा इस यात्री को
पहुँचने से मर्म तक

© - प्रशांत सेठ


Sunday, October 14, 2018

#MeToo

जब घर से निकलेगी बेटी
एक स्वप्न आँखों में लेकर
लक्ष्य दूर से दिखलाकर मैं
आगे अकेले बढ़ने दूँगा
उसको उसकी दुनिया खुद ही
देखना, मैं गढ़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...

सहारों के खोने पर ही
पा लेता है कोई खुदको
आसमान में उड़ना है तो
थोड़ा धरती पर भी फुदको
अपने पंख जब खोलेगी
मैं उसे तब उड़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...

सिद्धांतों की पगडंडी पर
संस्कारों का कुछ धन देकर
चरित्र प्रथम है सदा लक्ष्य से
ऐसा ही इक दृढ़ मन देकर
सफलता के सोपानों पर
हौले हौले चढ़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...

सही गलत का ज्ञान हो तो
मन विवेक से स्वयं सध लेगा
बाहर दुनिया नहीं बदलती
जीवन भीतर से बदलेगा
साहस का इक बीज बो कर
धूप वक़्त की पड़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...

भौतिकता की अंधी दौड़ में
समझौतों की राह न पकड़ना
मीटू वीटू क्या होता है
शोषण से तत्क्षण भिड़ना
पाठ जीवन की किताब से
निर्भयता का पढ़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...

समक्ष अन्याय के मौन ना रखना
सब खोने का स्वाद भी चखना
तुम द्रौपदी हो माना मैंने
किसी कृष्ण की राह ना तकना
सहारों की आस छुड़ाकर
दुर्गा बनकर लड़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...

धन पद सत्ता की भूख
तज कर मन को करो स्वतंत्र
अपनी शर्तों पर जीने का
एक यही होता है मंत्र
मृत्यु के भी भय से मुक्त
राह कर्म की बढ़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...

© - प्रशांत सेठ


Thursday, September 20, 2018

विक्रम वेताल

किसी देश में एक राजा विक्रमादित्य था

भुजाओं से क्षत्रिय, बुद्धि में पांडित्य था

योगी का आदेश जब संकल्प में बदलने लगा

वो सच्चा शिष्य

अच्छे दिनों की तलाश में निकलने लगा


योगी ने कहा

घनघोर काली अमावस की रात में चलना

हाथ में तलवार, हृदय में साहस रखना 

मरघट के वीराने में एक सूखा हुआ दरख़्त है

डरना मत विक्रम, तू तो राम का भक्त है


इसी वृक्ष पर एक लाश लटकती है

जिसकी हँसी नीरवता में खटकती है

उसी लाश को उतार कर लाना है

मेरे यज्ञ की बलिवेदी पर चढ़ाना है


मगर सावधान

इस वृक्ष पर अनगिनत शाखायें हैं

एक को काटो तो दूसरी निकल आती है

और वो लाश फिर वृक्ष पर लटक जाती है

उसको लाने की एक ही शर्त है, मौन रहना

किसी भी सूरत उसके प्रश्न का उत्तर ना देना

मगर इसमें भी प्राणों पर संकट आयेगा

अगर उत्तर मालूम होते हुए भी ना दिया

तो सर फट जायेगा


विक्रम ना दलित था, ना सवर्ण था

राष्ट्रवाद ही उसका वर्ण था

पेट्रोल की कीमत से बेपरवाह, विक्रम अश्वधारी था

उसे पता भी नही था, डॉलर क्यों रुपये पर भारी था

राजा लोग रोजगार की फिक्र नही करते

भरे पेट वाले महँगाई का ज़िक्र नही करते

जो भुजाओं से होते हैं सबल,

जिनमें होता है बुद्धि का बल

वो भक्ति पहले करते हैं,

चिंता करते हैं कल


विक्रम की कुल परंपरा सनातन संस्कृति की अनुगामी थी

इसलिए सही या गलत, योगी की हर बात में हामी थी

आगे की कहानी सब जानते हैं

बेताल पहेलीनुमा बहुत सी कथायें सुनायेगा

राजा उत्तर पे उत्तर दिए जाएगा

विक्रम पहेलियों में उलझकर फिर त्रस्त होगा

योगी अपने अनुष्ठान में फिर मस्त होगा


काश कोई चेतना विक्रम को जगा जाती

आँख से असत्य का आवरण हटा पाती

काश मन और विवेक में घर्षण होता

तब शायद इस दृश्य का दर्शन होता


ये मरघट सी नीरवता भारत देश की है

इस प्रजातंत्र की कहानी स्वार्थ और द्वेष की है

संस्कृति और सिद्धांत के पत्ते झड़ चुके हैं

इसकी जड़ में अकर्मण्यता के कीड़े पड़ चुके हैं

इसे त्याग और श्रम के जल से नहीं,

रक्त से सींचा गया है

माली की प्रवृत्ति वही है,

बस चेहरा नया है


इस वृक्ष पर चोटें हैं बेहिसाब युद्धों की

ये अनगिनत शाखायें हैं विभिन्न मुद्दों की

कहीं भ्रष्टाचार है, कहीं धार्मिक बवाल है

कहीं घोटालों का उपजता सवाल है

नक्सलवाद, जातिवाद, कश्मीर का मवाद है

कहीं आरक्षण, तो कहीं किसानों का उन्माद है

एक डाल कटेगी, दूसरी पर लटक जाएगा

ये बेताल, दीमक की तरह इस वृक्ष को खायेगा


उधर जनेऊधारी विधर्मी भी शिवभक्त बनकर लुभाते हैं

कभी सोमनाथ कभी कैलाश की यात्रा पर जाते हैं

धार्मिक उन्माद के रास्तों की यही विडंबना है

साँप से बचो तो, नाग गले पड़ जाते हैं

शायद यही कलयुग का अब चरम है?

शायद राष्ट्रवादी अनुष्ठान भी मात्र एक भरम है?

धैर्य चुक जायेगा एक दिन, कभी तो मौन टूटेगा

क्रोध का लावा किसी दिन, विक्रम का भी फूटेगा

सुना था प्रजातंत्र में, ऐसी कोई नीति है

प्रधान सेवक होता है, जनता राजा की तरह जीती है

लेकिन योगी के जाल में फँसे विक्रम की यही आपबीति है

वेताल के भेष में, ये देश की राजनीति है


छद्म योगियों की भक्ति में विक्रम

जब जब भटका है

स्वार्थ की लड़ाई में राष्ट्र का उत्थान

तब तब अटका है

और प्रजातंत्र के वृक्ष पर राजनीति का बेताल

आज भी लटका है

© - प्रशांत सेठ

Sunday, August 5, 2018

एक नया अंदाज़-ए-गुफ्तगू

एक नया अंदाज़-ए-गुफ्तगू

"रिश्ते"
रिश्तों के समंदर में, उतर जाओ मगर यूँ
भीगे भी रहो साहब, तुम डूबो भी नहीं

"जिंदगी"
जिंदगी के हर सितम को, सह जाओ इस तरह
खामोश ना रहो ठीक, तुम चीखो भी नहीं

"सियासत"
हालात हैं ऐसे इस, दौर-ए-सियासत में
खुलती नहीं आँखें अगर, तुम मींचो भी नहीं

"बुराई"
ये माना के हर तरफ, पाप है बुराई है
कटे ना ये शज़र तुमसे, तो सींचो भी नहीं

"फासला"
इतनी ही पसंद हमको, दूरी-ए-दरमियाँ
थामे भी रहो बाँहों में, तुम भींचो भी नहीं

"आँसू"
एहसास की सीपें हैं, दिल की गहराई में
आँसू ना सहेजो मगर, तुम बेचो भी नहीं

"गुफ्तगू"
सीखना चंद लफ़्ज़ों में, कहना सुनना "सेठ"
वक़्त-ए-जिंदगी कम है, तुम खींचो भी नहीं

© - प्रशांत "सेठ"


Sunday, July 29, 2018

एक पाठक की कविता

सच कहूँ तो
आजकल डर लगता है पढ़ने से
कागज़ से उठती हुई भड़ास
अपूर्ण इच्छाओं की टीस
रिश्तों में अपेक्षाओं की कड़वाहट
कवि के अवसाद का वमन
सच कहूँ तो डर लगता है
जब यथार्थ से दूर तुम ले जाते हो
श्रृंगार की स्वप्निल दुनिया में
जहाँ से लौटना पड़ता है मुझे तन्हा

प्रिय कवि
तुम मत लिखना अपने मन की पीड़ा
तुम लिखना
पीड़ा सिर्फ और सिर्फ समाज की
या फिर तब लिखना
जब एक हो जाये
तुम्हारी और समाज का दर्द
खड़े करना प्रश्न विसंगतियों पे
मगर एक शर्त है
हल भी देना होगा ढूँढ के
तुम्ही को
मत छोड़ देना मुझे ले जाकर
उसी अंधी गली में फिर
जहाँ छोड़ गयी थी मुझ को
सियासत

मैं युगों से भटक रहा हूँ अंधेरों में
उनकी तलाश में
जिनके पास है पता
रोशनी का
क्या तुम्हारे पास है तरकीब?
जिससे निकल सके
यथार्थ के छत्ते से
जीवन की शहद
तुम लिखना अवश्य लिखना
मैं ज़रूर पढूँगा उसे
जो होगी इस मुर्दा समाज में
एक ज़िंदा कलम

© - प्रशांत सेठ