भाव, भाव से विचार, और विचार से जन्म लेता है कर्म। स्वार्थ अहं से मुक्त भाव जन्म देता है निष्काम कर्म को ...
तुमने देखा होगा
प्रतिकूलताओं की धूप
और कीचड़ में
एक बीज धारण कर लेता है
जब कठोरता का आवरण
परिस्थितियों की मिट्टी तले
जड़ें जमाने को संघर्षरत
उसके भीतर
गहरे में कहीं रह जाती है शेष
थोड़ी सी कोमलता
देख लेती है प्रकृति
कोमल अन्तःकरण में
एक विराट वृक्ष की
संभावना
लेकिन
तुमने सोचा ना होगा
कैसे हो सकती है?
पाषाण के हृदय में उर्वरता
यदि सोच पाते
तो कर लेते किसी दिन
पाषाण के विग्रह में
शिव का दर्शन
तुमने देखा भी होगा
बीज का वृक्ष में परिवर्तन
लेकिन ढूँढ़ा है कभी?
सृजन के पश्चात बीज का अस्तित्व
यदि ढूँढ़ पाते
तो फिर कभी ना पूछते पता
ईश्वर का
पत्ती में, डाली में, जड़ में
फूल में और शूल में
मित्र में, शत्रु में
अनूकूल में, प्रतिकूल में
उतना ही औरों में
जितना कि खुद के भीतर
तुम ढूँढ ही लेते अस्तित्व
सृष्टि के बीज का
कभी मिल जाए तो पूछ लेना
किसी बीज से
या खुद ही कर देखना
कोई निःस्वार्थ सृजन
फिर कभी नही पूछोगे
कैसे कर सकता है कोई
गुणों से प्रेम, अ-गुणों से भी प्रेम
खुद से अधिक
खुद की रचना से प्रेम
कैसे
प्रेम के निराकार
एक छोटे से बीज में समाहित
विराट संभावना
लेती है सृष्टि का आकार
जान लेते हैं जानने वाले
बीज बनकर
बीज के मर्म को
तुम्हारी जिज्ञासा
बुद्धि के रथ पर सवार
जिसका सारथी हो शुद्ध प्रेम
जब चल देगी
चिंतन की राह पर
कौन रोक पाएगा इस यात्री को
पहुँचने से मर्म तक
© - प्रशांत सेठ

No comments:
Post a Comment