जब घर से निकलेगी बेटी
एक स्वप्न आँखों में लेकर
लक्ष्य दूर से दिखलाकर मैं
आगे अकेले बढ़ने दूँगा
उसको उसकी दुनिया खुद ही
देखना, मैं गढ़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
सहारों के खोने पर ही
पा लेता है कोई खुदको
आसमान में उड़ना है तो
थोड़ा धरती पर भी फुदको
अपने पंख जब खोलेगी
मैं उसे तब उड़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
सिद्धांतों की पगडंडी पर
संस्कारों का कुछ धन देकर
चरित्र प्रथम है सदा लक्ष्य से
ऐसा ही इक दृढ़ मन देकर
सफलता के सोपानों पर
हौले हौले चढ़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
सही गलत का ज्ञान हो तो
मन विवेक से स्वयं सध लेगा
बाहर दुनिया नहीं बदलती
जीवन भीतर से बदलेगा
साहस का इक बीज बो कर
धूप वक़्त की पड़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
भौतिकता की अंधी दौड़ में
समझौतों की राह न पकड़ना
मीटू वीटू क्या होता है
शोषण से तत्क्षण भिड़ना
पाठ जीवन की किताब से
निर्भयता का पढ़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
समक्ष अन्याय के मौन ना रखना
सब खोने का स्वाद भी चखना
तुम द्रौपदी हो माना मैंने
किसी कृष्ण की राह ना तकना
सहारों की आस छुड़ाकर
दुर्गा बनकर लड़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
धन पद सत्ता की भूख
तज कर मन को करो स्वतंत्र
अपनी शर्तों पर जीने का
एक यही होता है मंत्र
मृत्यु के भी भय से मुक्त
राह कर्म की बढ़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
© - प्रशांत सेठ
एक स्वप्न आँखों में लेकर
लक्ष्य दूर से दिखलाकर मैं
आगे अकेले बढ़ने दूँगा
उसको उसकी दुनिया खुद ही
देखना, मैं गढ़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
सहारों के खोने पर ही
पा लेता है कोई खुदको
आसमान में उड़ना है तो
थोड़ा धरती पर भी फुदको
अपने पंख जब खोलेगी
मैं उसे तब उड़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
सिद्धांतों की पगडंडी पर
संस्कारों का कुछ धन देकर
चरित्र प्रथम है सदा लक्ष्य से
ऐसा ही इक दृढ़ मन देकर
सफलता के सोपानों पर
हौले हौले चढ़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
सही गलत का ज्ञान हो तो
मन विवेक से स्वयं सध लेगा
बाहर दुनिया नहीं बदलती
जीवन भीतर से बदलेगा
साहस का इक बीज बो कर
धूप वक़्त की पड़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
भौतिकता की अंधी दौड़ में
समझौतों की राह न पकड़ना
मीटू वीटू क्या होता है
शोषण से तत्क्षण भिड़ना
पाठ जीवन की किताब से
निर्भयता का पढ़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
समक्ष अन्याय के मौन ना रखना
सब खोने का स्वाद भी चखना
तुम द्रौपदी हो माना मैंने
किसी कृष्ण की राह ना तकना
सहारों की आस छुड़ाकर
दुर्गा बनकर लड़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
धन पद सत्ता की भूख
तज कर मन को करो स्वतंत्र
अपनी शर्तों पर जीने का
एक यही होता है मंत्र
मृत्यु के भी भय से मुक्त
राह कर्म की बढ़ने दूँगा
जब घर से निकलेगी बेटी...
© - प्रशांत सेठ

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