Thursday, September 20, 2018

विक्रम वेताल

किसी देश में एक राजा विक्रमादित्य था

भुजाओं से क्षत्रिय, बुद्धि में पांडित्य था

योगी का आदेश जब संकल्प में बदलने लगा

वो सच्चा शिष्य

अच्छे दिनों की तलाश में निकलने लगा


योगी ने कहा

घनघोर काली अमावस की रात में चलना

हाथ में तलवार, हृदय में साहस रखना 

मरघट के वीराने में एक सूखा हुआ दरख़्त है

डरना मत विक्रम, तू तो राम का भक्त है


इसी वृक्ष पर एक लाश लटकती है

जिसकी हँसी नीरवता में खटकती है

उसी लाश को उतार कर लाना है

मेरे यज्ञ की बलिवेदी पर चढ़ाना है


मगर सावधान

इस वृक्ष पर अनगिनत शाखायें हैं

एक को काटो तो दूसरी निकल आती है

और वो लाश फिर वृक्ष पर लटक जाती है

उसको लाने की एक ही शर्त है, मौन रहना

किसी भी सूरत उसके प्रश्न का उत्तर ना देना

मगर इसमें भी प्राणों पर संकट आयेगा

अगर उत्तर मालूम होते हुए भी ना दिया

तो सर फट जायेगा


विक्रम ना दलित था, ना सवर्ण था

राष्ट्रवाद ही उसका वर्ण था

पेट्रोल की कीमत से बेपरवाह, विक्रम अश्वधारी था

उसे पता भी नही था, डॉलर क्यों रुपये पर भारी था

राजा लोग रोजगार की फिक्र नही करते

भरे पेट वाले महँगाई का ज़िक्र नही करते

जो भुजाओं से होते हैं सबल,

जिनमें होता है बुद्धि का बल

वो भक्ति पहले करते हैं,

चिंता करते हैं कल


विक्रम की कुल परंपरा सनातन संस्कृति की अनुगामी थी

इसलिए सही या गलत, योगी की हर बात में हामी थी

आगे की कहानी सब जानते हैं

बेताल पहेलीनुमा बहुत सी कथायें सुनायेगा

राजा उत्तर पे उत्तर दिए जाएगा

विक्रम पहेलियों में उलझकर फिर त्रस्त होगा

योगी अपने अनुष्ठान में फिर मस्त होगा


काश कोई चेतना विक्रम को जगा जाती

आँख से असत्य का आवरण हटा पाती

काश मन और विवेक में घर्षण होता

तब शायद इस दृश्य का दर्शन होता


ये मरघट सी नीरवता भारत देश की है

इस प्रजातंत्र की कहानी स्वार्थ और द्वेष की है

संस्कृति और सिद्धांत के पत्ते झड़ चुके हैं

इसकी जड़ में अकर्मण्यता के कीड़े पड़ चुके हैं

इसे त्याग और श्रम के जल से नहीं,

रक्त से सींचा गया है

माली की प्रवृत्ति वही है,

बस चेहरा नया है


इस वृक्ष पर चोटें हैं बेहिसाब युद्धों की

ये अनगिनत शाखायें हैं विभिन्न मुद्दों की

कहीं भ्रष्टाचार है, कहीं धार्मिक बवाल है

कहीं घोटालों का उपजता सवाल है

नक्सलवाद, जातिवाद, कश्मीर का मवाद है

कहीं आरक्षण, तो कहीं किसानों का उन्माद है

एक डाल कटेगी, दूसरी पर लटक जाएगा

ये बेताल, दीमक की तरह इस वृक्ष को खायेगा


उधर जनेऊधारी विधर्मी भी शिवभक्त बनकर लुभाते हैं

कभी सोमनाथ कभी कैलाश की यात्रा पर जाते हैं

धार्मिक उन्माद के रास्तों की यही विडंबना है

साँप से बचो तो, नाग गले पड़ जाते हैं

शायद यही कलयुग का अब चरम है?

शायद राष्ट्रवादी अनुष्ठान भी मात्र एक भरम है?

धैर्य चुक जायेगा एक दिन, कभी तो मौन टूटेगा

क्रोध का लावा किसी दिन, विक्रम का भी फूटेगा

सुना था प्रजातंत्र में, ऐसी कोई नीति है

प्रधान सेवक होता है, जनता राजा की तरह जीती है

लेकिन योगी के जाल में फँसे विक्रम की यही आपबीति है

वेताल के भेष में, ये देश की राजनीति है


छद्म योगियों की भक्ति में विक्रम

जब जब भटका है

स्वार्थ की लड़ाई में राष्ट्र का उत्थान

तब तब अटका है

और प्रजातंत्र के वृक्ष पर राजनीति का बेताल

आज भी लटका है

© - प्रशांत सेठ

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