सच कहूँ तो
आजकल डर लगता है पढ़ने से
कागज़ से उठती हुई भड़ास
अपूर्ण इच्छाओं की टीस
रिश्तों में अपेक्षाओं की कड़वाहट
कवि के अवसाद का वमन
सच कहूँ तो डर लगता है
जब यथार्थ से दूर तुम ले जाते हो
श्रृंगार की स्वप्निल दुनिया में
जहाँ से लौटना पड़ता है मुझे तन्हा
प्रिय कवि
तुम मत लिखना अपने मन की पीड़ा
तुम लिखना
पीड़ा सिर्फ और सिर्फ समाज की
या फिर तब लिखना
जब एक हो जाये
तुम्हारी और समाज का दर्द
खड़े करना प्रश्न विसंगतियों पे
मगर एक शर्त है
हल भी देना होगा ढूँढ के
तुम्ही को
मत छोड़ देना मुझे ले जाकर
उसी अंधी गली में फिर
जहाँ छोड़ गयी थी मुझ को
सियासत
मैं युगों से भटक रहा हूँ अंधेरों में
उनकी तलाश में
जिनके पास है पता
रोशनी का
क्या तुम्हारे पास है तरकीब?
जिससे निकल सके
यथार्थ के छत्ते से
जीवन की शहद
तुम लिखना अवश्य लिखना
मैं ज़रूर पढूँगा उसे
जो होगी इस मुर्दा समाज में
एक ज़िंदा कलम
© - प्रशांत सेठ
आजकल डर लगता है पढ़ने से
कागज़ से उठती हुई भड़ास
अपूर्ण इच्छाओं की टीस
रिश्तों में अपेक्षाओं की कड़वाहट
कवि के अवसाद का वमन
सच कहूँ तो डर लगता है
जब यथार्थ से दूर तुम ले जाते हो
श्रृंगार की स्वप्निल दुनिया में
जहाँ से लौटना पड़ता है मुझे तन्हा
प्रिय कवि
तुम मत लिखना अपने मन की पीड़ा
तुम लिखना
पीड़ा सिर्फ और सिर्फ समाज की
या फिर तब लिखना
जब एक हो जाये
तुम्हारी और समाज का दर्द
खड़े करना प्रश्न विसंगतियों पे
मगर एक शर्त है
हल भी देना होगा ढूँढ के
तुम्ही को
मत छोड़ देना मुझे ले जाकर
उसी अंधी गली में फिर
जहाँ छोड़ गयी थी मुझ को
सियासत
मैं युगों से भटक रहा हूँ अंधेरों में
उनकी तलाश में
जिनके पास है पता
रोशनी का
क्या तुम्हारे पास है तरकीब?
जिससे निकल सके
यथार्थ के छत्ते से
जीवन की शहद
तुम लिखना अवश्य लिखना
मैं ज़रूर पढूँगा उसे
जो होगी इस मुर्दा समाज में
एक ज़िंदा कलम
© - प्रशांत सेठ

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