मन पगले तू क्यों सत्य से भाग रहा
जनमत से इतर अपने विचार लिये
अपनी ढपली तेरा अपना राग रहा
कहें सेठ कविराय बौद्धिकता रोग है
खुद को खुद जला बैठा, जो आग रहा
अपनी आस्तीनों में ढूँढो कहाँ गया
इसी ठिकाने पे रहता एक नाग रहा
त्याग की भाषा पढ़ने लगे सुविधाभोगी
वो कड़वाहट को शक्कर से पाग रहा
केवल पंखों से परिंदे की पहचान नहीं
जो घूरे पे जा बैठे, समझो काग रहा
पहन जनेऊ अब घूम रहा मंदिर मंदिर
जिसके दामन पे हरदम ही दाग रहा
© - प्रशांत सेठ

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