छोड़ा तीर कमान से, पाछे आँख दबाय
नया धनुर्धर देखिये, उलटी रीत चलाय
आँख दबा मत बोलिये, बात कभी गंभीर
बाहर ना आ जाये ये, भीतर की तासीर
शब्दों से बनती नहीं, बुद्धि की पहचान
कथनी करनी एक सी, कीजे तो श्रीमान
चलो न मुख पे ओढ़ के, विद्वानी का खोल
थाप पड़े सब जानिहें, फटा कहाँ से ढोल
नयन और मुख की न हो, बोली भाषा एक
मन भीतर के भाव को, कौन कहे फिर नेक
आलिंगन तब कीजिये, जब हो प्रेम अगाध
जल जल से मिल के रहे, क्यों अग्नि की साध
विजय चाहिये तो रहो, अहंकार से दूर
विनय राम का अस्त्र है, रावण मद में चूर

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