Monday, October 30, 2017

त्वम् ब्रह्मास्मि

तुमने देखा होगा
दर्पण को
कई बार तुम पर
मुस्कुराता है
और कई बार करता है
क्रोध भी
फिर तुमने जाना
अपना कोई रंग नहीं होता
दर्पण का
बिम्ब के बिना नहीं होता
प्रतिबिम्ब
मुस्कान भी तुम्हारी थी
क्रोध भी तुम्हारा था

तुम्हारा संसार भी तो
दर्पण ही है
तुम्हारे अपने मन का
परिस्थिति है
तुम्हारी मनःस्थिति का ही
प्रतिबिम्ब
कभी देखना
दृष्टि हटाकर इस दर्पण से
खुद की तरफ
तुम्हारे हर प्रश्न का उत्तर
छुपा है
तुम्हारे ही भीतर

तुम्हीं ने गढ़ा है ये संसार
इच्छाओं का
यहाँ तक की गढ़ लिया
परलोक भी
पारलौकिक इच्छाओं से
गढ़ लिया अपनी
अपूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करने का
एक साधन
और नाम दिया उसको
ईश्वर
जब तक शेष है तुम्हारा
जीवत्व
तब तक रहेगा अस्तित्व
ईश्वर का भी
और तब तक करनी होगी
प्रार्थना भी

मत करना
प्रार्थना विचार चिंतन अध्ययन
उस दिन
हट जाये जिस दिन
मन के समक्ष से
संसार का दर्पण
लीन हो जाये
तुम्हारे भीतर की मीरा
किसी कृष्ण में
तुम्हारा जीव हो जाये
एकात्म
उस ब्रह्म से
निराकार निर्गुण अनाम

© - प्रशांत सेठ

Saturday, September 30, 2017

संस्कार माला - II

बेटी सिद्धि सेठ के जन्मदिन पर अनेक शुभकामनाओं और आशीष सहित पिता का प्रेमपूर्ण उपहार।

जीवन में उत्पन्न विभिन्न परिस्थितियों और मनःस्थितियों में, पौराणिक चरित्रों से प्रेरणा लेने की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुये, संस्कारों की माला का द्वितीय भाग।

जब
घोर तप अर्जित विद्या से हो शक्ति सबल
और ह्रदय में हो तुम्हारे श्रद्धा भक्ति अटल
जीवन स्वयं ले आये तभी विष का प्याला
माँग ले अंगुष्ठ ही जब हाथ थामने वाला
तब समझ लेना
बनके याचक यदि स्वयं श्रद्धेय खड़ा है
हे एकलव्य,
नियति का हेतु निज सर्वस्व से बड़ा है
_______________

जब
तिरस्कृत सा पाओ स्वयं को संसार में
एकाकी जीवन हो बियाबान उजाड़ में
चख लिये हों स्वाद तुमने जीवन के सारे
खट्टे, मीठे, तीखे, कड़वे और खारे
तब समझ लेना
निज ह्रदय में राम का होगा निवास
हे शबरी,
मन कुटी में शेष रहे केवल मिठास
_______________

जब
आस पास अज्ञानमय अँधेरा घना हो
असत्य के शोर में सत्य कहना मना हो
पा जाओ ऐसे में कभी ज्ञान का वो धन
करा सको दृष्टिहीनों को सत्य का दर्शन
तब समझ लेना
अंधत्व की संतान को मिली दृष्टि है
हे श्रवण,
कोई आशा रखती तुमसे स्वयं सृष्टि है
_________________

जब
मिल जाये कभी राजपाट तुम्हें भाग्य से
मन विह्वल रहे किन्तु भीतर वैराग्य से
बहते हों नयन तुम्हारे पर-पीड़ा के कारण
वाणी करती हो औरों के दुःख का निवारण
तब समझ लेना
ह्रदय करुणा से जिसका भी शुद्ध हुआ है
हे सिद्धार्थ,
उसी के भीतर उदय कोई बुद्ध हुआ है
__________________

जब
स्वार्थ की मंथरा बुद्धि पर दुष्प्रभाव करे
ह्रदय से गमन तुम्हारे निर्मल भाव करे
विवेक और मर्यादा को देकर निष्कासन
परिस्थिति सजाये तुम्हारे लिये सिंहासन
तब समझ लेना
बुद्धि रहे अधीन, जीवन भाव प्रधान रखना
हे भरत,
ह्रदय अयोध्या का राजा सदैव राम रखना
____________

जब
अस्तित्व पर घोर संकट की घड़ी हो
दरिद्रता समक्ष तुम्हारे द्वार खड़ी हो
मन विहल, भविष्य की चिंता लगे सताने
झोली में शेष हों तुम्हारी मुट्ठी भर दाने
तब समझ लेना
जो कुछ है पास वो भी कर देना अर्पण
हे सुदामा,
पाया है उसीने जिसने किया समर्पण
____________

जब
रिसती पीड़ा हो ह्रदय के घाव से
उपजती कटुता हो मन के भाव से
धधकती हो ज्वाला भीतर क्रोध की
बलवती हो इच्छा जब प्रतिशोध की
तब समझ लेना
ज्ञान शक्ति विफल, लक्ष्य दुश्वार है
हे अश्वत्थामा,
"मैं" के अश्व पर तुम्हारा मन सवार है
_______________

जब
निज कौशल पर होने लगे तुम्हें अभिमान
अधर्म की सभा में पाने लगो तुम सम्मान
अहंकार होता हो बलवान पाकर कुसंग
चन्दन से आकर लिपटते हों भुजंग
तब समझ लेना
अधर्म पराजित है सदा धर्म के प्रहार से
हे कर्ण,
बँध मत जाना किसी अधर्मी के उपकार से
___________________

© - प्रशांत सेठ

(प्रथम भाग संस्कार माला http://prasantseth.blogspot.com/2017/01/blog-post_11.html)

Tuesday, September 12, 2017

भक्ति विज्ञान

एक वस्तु
वस्तु पर पड़ती
श्वेत प्रकाश की किरणें
उन किरणों में छुपे
इंद्रधनुष के सात रंग
कुछ रंग हो जाते हैं अवशोषित (absorb)
कुछ परावर्तित (reflect)
वस्तु देती है आभास
उसी परावर्तित रंग में रंगे होने का
जो लौट कर आता है
तुम्हारी आँखों तक
कुछ ऐसा ही पढ़ा था
भौतिकी में
प्रकाश का विज्ञान
जो रंग कभी था ही नहीं
दृश्य का
वही समाहित हुआ आकर
तुम्हारी दृष्टि में

मन
मन में भाव
भावों के अनेक रंग
मन का प्रकाश जब पड़ता है
समाज पर
लौटा देता है समाज भी
घृणा, वैमनस्यता अथवा प्रेम के
वही रंग
जो रहते हैं समाहित
तुम्हारी दृष्टि में
इन्हीं रंगों में ढूँढ़ते हो तुम
जब अपने इष्ट को
दिखायी पड़ता है वो भी
मन के रंग में रंगा हुआ
कदाचित इसीलिये
जो दिख रहा है वो
सत्य नहीं है
हरा भी, तुम्हारी दृष्टी
भगवा भी, तुम्हारा ही मन

तुमने ये भी पढ़ा होगा
जो वस्तु कर लेती है समाहित
सारे रंग
प्रतीत होती है उसमें
कालिमा
जैसे अथाह अंतरिक्ष
और जिसपर नहीं ठहरता
कोई रंग
वो दिखती है श्वेत
जैसे कोरा कागज
मन का हर भाव
जब ठहर जाता है इष्ट पर
वो समेट लेता है खुद में
तुम्हारी कालिमा
और शेष रह जाती है इधर
केवल उज्ज्वलता
प्रकाश से भिन्न नहीं होता
भक्ति का विज्ञान

इसी में छुपा है शायद
उस सनातन प्रश्न का उत्तर
राधा क्यों गोरी,
वो क्यों काला??

© - प्रशांत सेठ

Sunday, September 3, 2017

एक सिकंदर - मन के अंदर

मैं देखता हूँ
अहंकार के अश्व पर सवार
श्रेष्ठता की दौड़ में संलग्न
बहुत सी भेड़ों को
इन भेड़ों की मैं मैं से
जन्मता एक जादूगर
जो दिखाता है
एक गुमनाम चिट्ठी
चिट्ठी किसी अनाम ईश्वर की
जो आयी है
सिर्फ और सिर्फ उसके पते पर
चिट्ठी जिसमें है पैगाम
दुनिया भर की भेड़ों के लिये
के तुम्हें करना है शासन
दूसरी भेड़ों पर
और फिर एक दिन यही भेड़ें
खो देती हैं अपनी पहचान
और बन जाती हैं
भेड़िया

मैं फिर देखता हूँ
इन्द्रियों के अश्व से सुसज्जित
देह के रथ पर सवार
कुछ और भेड़ें
इच्छाओं के बियाबान जंगल में
भटककर
जब तलाशती हैं रास्ता
तब धीरे से कोई बाबा
पकड़ा देता है
चमत्कार का झुनझुना
भेड़ें चल देती हैं उसके पीछे
और फिर जन्मता है
एक ऐसा ईश्वर
जो साध्य नहीं होता
बल्कि होता है साधन
इच्छाओं की पूर्ति का
और भेड़ें,
फिर भटक जाती हैं

मैं जानता हूँ
जहाँ भीड़ है वहाँ
खो जाती है
मंजिल खुद ही
मैं लौट पड़ता हूँ
इन रास्तों से उलट
एक ऐसी राह पर
जहाँ मिलते हैं
कुछ एकाकी राही
वो नहीं पकड़ाते कोई झुनझुना
नहीं दिखाते कोई चिट्ठी
मगर
बता देते हैं इशारों से
आगे की राह
मैं चल पड़ता हूँ निश्चिन्त
इस अनजान मगर
सुनिश्चित राह पर

अब मैं किसी को
हराना नहीं चाहता
चाहता हूँ जीत लेना
बस खुदको
मैं जान गया हूँ
एक बूँद ज्यों नकार बैठे
समंदर का अस्तित्व
ऐसे ही भूल गयी थी
ये मन की भेड़
अपने ही उस
अनंत विस्तार को
जिसका नाम...?
कुछ भी हो
अब फर्क नहीं पड़ता

© - प्रशांत सेठ

Friday, August 4, 2017

कुटुम्ब

मैं देखता हूँ जब भी
ऊँचे खड़े, हरे भरे
आसमान छूते वृक्ष को
मैं नाप लेता हूँ
उसकी जड़ों की गहराई
मैं जानता हूँ
परिवार रुपी वृक्ष का एक अंश
जब सहर्ष स्वीकार लेता है
नीचे की ओर बढ़ना
तब चूम पाती हैं अन्य टहनियाँ
सफलता का आकाश

इस वृक्ष पर जब देखता हूँ
खिलते पुष्प और पल्लव
लहलहाते रसीले फल
मैं ढूँढता हूँ
मिट्टी में गहरे दबे
उस बीज को
जिसने स्वीकार किया था
प्रेम में स्वयं टूट कर
औरों को जीवन देना
मैं देखता हूँ
उस बीज का अस्तित्व
फलते फूलते वृक्ष के
रोम रोम में

मैं जानता हूँ
प्रतिभा और सफलता के बीच
होती है एक महीन सी रेखा
दायित्व की
इस रेखा के उस पार
होता है एक अवसर
सबको छोड़कर
स्वयं आगे बढ़ जाने का
नहीं लाँघ पाते, बड़े लोग
ये छोटी सी रेखा
और रह जाते हैं गाँव में
घर के प्राचीन अवशेष
और माँ बाबूजी की
विरासत को सम्हालने
गाँव के टूटे घर में दफ़न
इन्हीं छोटे छोटे बीजों से
उगते हैं
तुम्हारे शहर के बड़े बड़े मकान

फिर से देखो
इस बार मेरी दृष्टि से
तुम्हारी जमीन के नीचे मिलेंगी
कुछ गुमनाम जड़ें
जिन्होंने
धरती का सीना फाड़कर
तुम्हें पहुँचाया आकाश तक
एक बेनाम बीज
जिसकी छाती भेदकर
तुमने पाया है जन्म
तुम्हारे पैरों के नीचे मिलेंगे
वो मजबूत काँधे
जिन्होंने उठा रखा था
तुम्हारे हिस्से का दायित्व

संघर्ष के दिनों में
तुम्हारे काँधों पर नहीं था
कोई बोझ
सिवाय खुद के
अब
जब तुम चमकते हो
सफलता के आकाश में
प्रसिद्धि के सूर्य समान
और सुनाते हो अपनी
सफलता के किस्से
तब
मैं तुमसे करना चाहता हूँ
एक सौदा
तुम अपनी जड़ों को कभी
असफल मत कहना
मैं भी तुम्हें
खुदगर्ज़ नहीं कहूँगा

© - प्रशांत सेठ

Thursday, August 3, 2017

मातृ स्वरुप दादा भैया मामा को विनम्र श्रद्धांजलि

जब जब ह्रदय मथा है मैंने
तब तब अधर लगे कुछ कहने
जब जब अधर सिये हैं मैंने
तब तब नयन लगे हैं बहने
मत अधरों को रोको
मत नयनों को बहने दो
आँसू हैं श्रृंगार ह्रदय का
ह्रदय में रहने दो

- श्री प्रभात नीखरा

प्रिय मामाजी श्री प्रभात नीखरा जी "दादा भैया" की उपरोक्त पंक्तियाँ उनके विराट व्यक्तित्व का परिचय देती हैं। संघर्ष और टूटन से सृजन करना प्रकृति की विशेषता होती है। जब एक बीज कहीं गहरे मिटटी में दब कर टूटता है, तब उसमें सम्पूर्ण मानवता को पोषित करने की क्षमता निखर कर बाहर आती है। ऐसा भी कह सकते हैं कि अपनी टूटन को सृजन में परिवर्तित कर देने का गुण जिसमें होता है, प्रकृति ऐसे व्यक्तित्व को ही सृजन का दायित्व सौंपती है।

मैं समझ सकता हूँ प्रकृति ने दादा भैया को परिवार की नींव बनने के लिये क्यों चुना। संघर्ष उसी के हिस्से में आता है जिसके जीवन में कुछ सिद्धांत होते हैं और जो आगे बढ़ कर स्वयं दायित्व उठाता है। भाई का पद तो जन्म से प्राप्त हो जाता है परंतु घर का दादा भैया होने के लिये कर्तव्यनिष्ठा के साथ साथ त्याग, धैर्य और प्रेम से परिपूर्ण ह्रदय की आवश्यकता होती है। कदाचित इसलिये मामाजी अपने घर के बड़े भाई ही नहीं, "दादा भैया" थे। उनके दिये हुये संस्कार और चिंतन के बीज ने आज एक दो नहीं, सैंकड़ों वृक्ष को इतनी गहरायी दी है कि वो सभी अपने अपने स्थान पर खड़े होकर आकाश को चुनौती दे रहे हैं। कल उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हज़ारों लोगों की आँखों में अश्रुधारा इस बात का द्योतक थी के दादा भैया की स्मृतियाँ हम सभी के ह्रदय में सदा पुष्पित और पल्लवित होती रहेंगे।

यदि मामा शकुनि हो तो भांजे का दुर्योधन होना निश्चित है। यदि मामा कंस हो तो भांजा कृष्ण ही होगा। परंतु यदि मामा स्वयं कृष्ण हो तब?
तब अभिमन्यु का जन्म होता है। मेरे जीवन की प्रेरणा, व्यक्तित्व के निर्माता और कवि मन को जागृत करने वाले प्रिय मामाजी को मेरी श्रद्धापूर्ण भावांजलि।

- प्रशांत सेठ

Wednesday, July 19, 2017

कविता - चित्त के चेहरों सी

ह्रदय भाव लहरों सी
धूप सर्द दोपहरों सी
मन दर्पण में छवि अपनी
फिर भी लगती गैरों सी
कविता चित्त के चेहरों सी

ह्रदय ह्रदय बहती जाये
करुणा की फसल उगाये
मन के तटबंध तोड़ चल दे
जो बरसाती नहरों सी
कविता सरित लहरों सी

हाय पैसा हाय पैसा
जीवन ऊँची बिल्डिंग जैसा
इनके बीच ऊग आती ज्यों
झोपड़ पट्टी शहरों सी
कविता गाँव के चेहरों सी

मन पंछी सी आतुरता
विस्तृत नभ सी व्यापकता
सपनों को पंख लगे पर
यथार्थ बेड़ियाँ पैरों की
कविता गूंगे बहरों सी

काव्य रंग में कितना रंगें
मन की ये अल्हड़ उमंगें
वो जैसे बेपरवाह जवानी
कविता सयाने पहरों सी
कविता बुजुर्ग महरों सी

© - प्रशांत सेठ

महर = पूज्य और श्रेष्ठ व्यक्ति