Tuesday, November 1, 2016

विभीषण

इस बार की दीवाली में एक चिराग कम हो गया। जो दूसरों की राह प्रज्वलित किया करता था, वह स्वयं असमय ही बुझ गया।

ऐसा भाई जो 35 वर्ष पुराना साथ छोड़कर प्रभु श्री राम के चरणों में चला जाये, उसको विभीषण कहना कहाँ गलत है?

और विछोह की इस पीड़ा को रावण से बेहतर कौन समझ सकता है। मेरे जीवन के इस विभीषण को श्रद्धांजलि। नमन प्रिय अरविन्द ....!!!

विभीषण

उसमें भक्ति का समर्पण
मुझमें तप का अहंकार
वो निर्मल चित्त प्रेम का
शक्ति मेरा अलंकार

एक चाक पर थे गढ़े
मिट्टी के ये दो घड़े
वो घट बना मंदिर का
हम तृष्णा में रहे पड़े

मैं आकंठ डूबा चाह में
वो था मुक्ति की राह में
मैं लंका के वैभव में गुम
वो ईश्वर की पनाह में

वो वन का एक तपस्वी
मैं स्वर्ण नगरी का लंकेश
जोड़ घटा गुणा भाग मैं
वो खुश था पाकर के शेष

मैं दस सरों में लिये वजन
वो था ह्रदय का शुद्ध भजन
मैं युगों तक जलने वाला
वो पल में पिघलने वाला

मैं विद्या के दर्प में चूर
वो इन सबसे कोसों दूर
मैं धर्म समाज की व्याधि
उसका जीवन एक समाधि

मैं कुटुंब विनाश का कारण
वो समस्या का निवारण
मैं पराजय था युद्ध की
वो अवस्था प्राप्त बुद्ध की

वो उत्तर मैं दक्षिण था
साथ फिर भी अक्षुण्ण था
लेकिन तोड़ गया वो बंधन
अब करो क्रंदन या वंदन

इस कथा का अंत वही है
खोया पाया सब यहीं है
मिट्टी के हर घट की राह
मिट्टी ही तो ताक रही है

धन विद्या शक्ति व्यर्थ है
मृत्यु जीवन की शर्त है
शरण राम की जिसने पाई
वही सबल वही समर्थ है

© - प्रशांत सेठ

Sunday, October 30, 2016

शुभ दीपोत्सव

दीपों का त्यौहार, वो भी इस घोर अँधेरी काली रात में। शायद यही सन्देश है एक दीप का कि जब अँधेरे घने हों तो आशा का दीप जलाये रखें, और यदि जीवन में प्रकाश है तो परोपकार की परम्परा बनाये रखें।
इसी भावना के साथ आप सभी इष्ट मित्रों, स्नेहीजनों को शुभकामनायें.....

शुभ दीपोत्सव

लड़ते लड़ते एक दीप से
अंधकार जब यूँ बोला
लड़ोगे कब तक तुम मझसे?
जलोगे कब तक बन शोला?

श्वांसों का तेल है जब तक
संवेदना की जलती बाती
कर्त्तव्य पथ पर उजियारा मैं
करता रहूँगा सुन साथी

बुझते बुझते दे जाऊँगा
पीढ़ियों को भी ये पाती
घोर अमावस में दीप से
मिलने लक्ष्मी है आती

सुख शांति समृद्धि भी
गीत उसी के है गाती
जो लड़ता है तिमिर से
निर्द्वन्द दीपक की भांति

निस्वार्थ कर्म की सुगंध
जब चहुँ ओर छा जाती
बल बुद्धि यश कीर्ति
चलकर आती है ख्याति

स्वयं जलकर औरों की शुभ
करते हैं जो दीवाली
दीप बनकर जलने वाले
सदैव रहते अविनाशी

© - प्रशांत सेठ


Sunday, October 9, 2016

श्रद्धांजलि माँ

आधे पूरे का अनुपात नहीं जानता, बाँटने का गणित भी नहीं आता। आज अर्धांगिनी के मातृशोक को पूरा का पूरा अनुभव कर रहा हूँ। इस माँ ने जन्म भले ही ना दिया हो; लेकिन जो दिया है, वो जीवन से कम नहीं है...

श्रद्धांजलि जीवनदायिनी माँ को...

दुःख तो होता है यकीनन
यूँ तुम्हारे खो जाने पर
माँ, तुमसे नाराज़ हूँ बहुत
मुझसे पहले सो जाने पर

इससे पहले गहरे तम् में
छोड़ मुझे तू कब गई है
मैं जागा हूँ, तू सोती है
ये कैसी रीत नई है?
जल्दी क्या थी, चली जाती
ज़रा सुबह हो जाने पर
माँ, तुमसे...

धरती की बीज से अपने
क्या ऐसी होती है प्रीत
माँ नहीं है जिसकी, उसका
हवा ना पानी कोई मीत
बोलो कैसे ये ऊगेंगे
गोद धरा की खो जाने पर
माँ तुमसे...

कब तक ये ना मुरझायेंगे
कब तक यत्न करेगा माली
खिलना मुश्किल है फूलों का
जिनकी टूट गई हो डाली
बिखरे पल्लव देख रहा हूँ
जैसे पतझर हो जाने पर
माँ तुमसे...

साज़ भला वो क्या गायेंगे
जिनसे बिछड़ गया संगीत
बिना सरगम के इस दुनिया में
कहीं कोई नहीं है गीत
तेरे गीत हुये अधूरे
अपनी धुन के खो जाने पर
माँ तुमसे...

धैर्य साहस की एक मूरत
ईश्वर की थी वो सूरत
थक गई होगी चलते चलते
उसे विश्राम की थी जरूरत
तभी अड़ गई वो अचानक
छोड़ के सब कुछ यों जाने पर
माँ से नाराज़ नहीं होते यूँ
एक दिन जल्दी सो जाने पर

© - प्रशांत सेठ

Friday, September 2, 2016

ज़िद्दी

आज बस यूँ ही खुद पर प्यार आ गया !!!

हाँ, कठिन है पलते रहना
जीवन का उसूलों में
किन्तु असंभव भी नहीं है
फूल सा खिलना शूलों में

साहस निश्चित है जरूरी
राह सत्य की चलने में
दृढ संकल्प चाहिये मन में
गिरकर फिर सँभलने में
एक सबक छुपा होता है
अक्सर अपनी भूलों में
हाँ, असंभव भी नहीं ....

पर्वत की चोटी पर हैं तो
कभी खड़े ढलानों पर
प्रशंसा में रहे इतराते
दुःखी हुये उलाहनों पर
है आनंद कितना लेकिन
समय के इन झूलों में
हाँ, असंभव भी नहीं ....

होते हैं कुछ लोग यकीनन
बैसाखी पर टिके हुये
सरल मार्ग को चुनने वाले
रोम रोम तक बिके हुये
अवसरवादी ही मिलेंगे
झुकते चरण धूलों में
हाँ, असंभव भी नहीं ....

बस यही एक सूत्र मिला है
खुद से सच्चे रहो सदा
लाख बड़े हो जाओ फिर भी
भीतर बच्चे रहो सदा
मौलिकता मत खो देना
भगत बने बगूलों में
हाँ, असंभव भी नहीं ....

सोने नहीं देता ये जो
आँखों में स्वप्न पड़ा है
थकने नहीं देता हमको
लक्ष्य जीवन का बड़ा है
रोक सकें ये साहस कहाँ
पथ के इन बबूलों में
हां, असंभव भी नहीं ....

© - प्रशांत सेठ


Sunday, August 7, 2016

विषधर भाई

आज नागपंचमी पर शुभकामनाओं सहित पंजाब और उत्तर प्रदेश के भावी चुनावों को समर्पित एक "Nag punch me" स्पेशल पंच।

विषधर भाई

साँप को दूध नहीं पिलाओगे??
बाहर से आवाज़ आई
दरवाज़ा खोला तो खड़े थे विषधर भाई
हमने डरते डरते सोचा, कोई ना कोई बात है ज़रूर
हाथ जोड़कर कहा,
आपने क्यों तकलीफ की, बुलवा लेते हुज़ूर

वो अन्दर आकर बैठे,
फुफकार के साथ फन पटका
किसी अनहोनी की आशंका से, हमने थूक गटका
वो बोले विद्वान होकर भी तुम कमाल करते हो
अजीब अजीब से बेतुके सवाल करते हो
भई आज नागपंचमी है, हम आज ही निकलते हैं
वरना साल भर तो तुम्हारी आस्तीन में पलते हैं

तुम बड़े जल्दी भूल जाते हो
इसलिए बार बार डसे जाते हो
आज व्रत की मजबूरी में दूध पी रहे हैं
वैसे तो तुम्हारा खून पीकर ही जी रहे हैं
खैर छोडो ये सब फिजूल की बातें हैं
तुम दूध पिलाओ फिर हम जाते हैं

हमने जैसे तैसे थोड़ी हिम्मत बटोरी
काँपते हाथ से उठाई खाली कटोरी
हमने कहा हुज़ूर आप अन्नदाता हैं
और हम मामूली से मतदाता हैं
पांच साल में एक बार वोट देते हैं
और आप साल में पांच बार चोट देते हैं

आपने पाल रखी है एक डायन महंगाई
वो चट कर गई हमारे घर की दूध मलाई
हमारे बच्चे ही अब दूध नहीं पी पाते हैं
आजकल हम साँपों को दूध नहीं पिलाते हैं
हमने सोच लिया है, अब नहीं चलेगी लुच्चाई
हम पियें छाँछ और तुम खाओ मलाई?

हमने विश्वास को पाला, श्रद्धा को गले में लटकाया है
मगर तुम साँप हो, बहुत देर से समझ में आया है
तुम ही हो जिसने नफरत का ज़हर फैलाया है
तुम ही तो हो जिसने मुल्क को बँटवाया है
आज आँख में आँख डालकर बोलने का वक़्त आया है
जिसका फन कुचलना था, हमने सर पर बिठाया है

दोस्तो, ये थे हमारे नेता विषधर भाई
चुनाव का मौसम है सो हमारी याद आयी
अपने शाकाहार की दे रहे थे दुहाई
हमारे वोट को समझ रहे थे मलाई
ये खेल बरसों बाद हम आज समझ पाये हैं
विषधरों की बीन पर अब तक हम ही नाचते आये हैं

© - प्रशांत सेठ

Friday, August 5, 2016

आत्म-हत्या

साहब! एक कागज़ कलम मिलेगा?
उस वृद्ध ने मुझे आवाज़ दी

फटे पुराने कपड़ों में जर्जर शरीर
फुटपाथ के हिंदुस्तान की तस्वीर
एक पल को लगा, ये भी कोई लेखक या कवि है
इसमें मेरी गलती नही है, कवियों की यही छवि है

मैंने कहा,
हे 1947 की जर्जर ईमारत
तुम्हें इस दशा में भी सूझ रही है शरारत
कागज़ कलम लेकर बोलो क्या करोगे?
कविता लिखोगे या व्यवस्था से लड़ोगे?

वो बोला,
मैं एक जीता जागता संताप हूँ
एक सौ चालीस करोड़ बच्चों का अभिशप्त बाप हूँ
मुझे मेरे बच्चों ने दी है बहुत चोट
और मैं लिखना चाहता हूँ सुसाइड नोट

मुझे ऐसा जीवन नहीं भाता
मैं घिसट घिसट कर जीना नहीं चाहता
या तो मेरी खोयी हुई पहचान लौटा दो
या फिर तुम ही मुझे शमशान पहुँचा दो

मैंने कहा,
तुम्हारे एक सौ चालीस करोड़ हैं, यहाँ दो नहीं पलते
तुम्हें शर्म नहीं आती बच्चों पर दोष मलते
जिसका दायित्व रहेगा एक सौ चालीस करोड़ पर
उसको तो आना ही था एक दिन रोड पर

हमारे देश में मनुष्य की कई श्रेणियाँ हैं
हमारी सोच पर जाति और धर्म की बेड़ियाँ हैं
मैंने पूछा,
बता किस गोत्र का है, क्या तेरा कुल है?
जातिगत जनगणना के लिए देश व्याकुल है

वो बोला,
बस इतनी ही मेरी खता रही है
गोत्र जाति कुल कुछ पता नहीं है
मैं तो मृत स्वप्न हूँ किसी समाज सेवी का
मैं पुत्र हूँ इंसाफ की अंधी देवी का

आज मैं दम तोड़ रहा हूँ सत्ता के गलियारों में
मैं चीख रहा हूँ हत्या में, बलात्कारों में
शोर में राष्ट्रविरोधी नारों की
मैं गुम हो रहा हूँ भीड़ में, गद्दारों की

खानदानी न्यायधीशों के हाथ का खिलौना हूँ
मैं भ्रष्टाचार का चेहरा घिनौना हूँ
मेरी क्षमता को रिश्वत दबा देती है प्यार से
मैं टॉपर की डिग्री हूँ साहब, बिहार से

मुझसे बेहतर सुरक्षा तो अपराधी पाते हैं
आतंकवादी जेल में बिरयानी खाते हैं
मेरे सेवक जो सत्ता की सेवा करते हैं
मैं भूखा मरता हूँ, और वो मेवा चरते हैं

मैं अदालत में सत्य की टूटी हुई टाँग हूँ
मैं किसी गरीब के हक़ की अनसुनी माँग हूँ
द्वेष की निरंतर बढ़ती हुई आग हूँ
मैं ही राजनीति का कुत्सित दिमाग हूँ

मैं न्याय का हो चुका खात्मा हूँ
मैं ही काले हिरण की आत्मा हूँ
मैं ग़ज़नी का बयान हूँ, सहिष्णुता के सवाल पर
मैं दबंग का थप्पड़ हूँ, व्यवस्था के गाल पर

यूँ तो वाहक हूँ तुम्हारे संविधान का
तथाकथित रक्षक हूँ, मनुष्य के सम्मान का
मुझे पहुँचा दिया है हालत में दरवेश की
साहब, मैं क़ानून व्यवस्था हूँ तुम्हारे देश की

इस देश में मेरा कोई सहारा नहीं है
अब ख़ुदकुशी के सिवा कोई चारा नहीं है
ये कहकर उसने लगा ली खुद को आग
मैं अलापता रह गया, न्यायतंत्र का राग

यूँ कहने को तो, अपनी भी छप्पन इंच छाती है
लेकिन ये बात कभी कभी कचोट जाती है
आप और मैं,
रोज़ व्यवस्था को जलता हुआ देख रहे हैं
दुःख इस बात का है, हम भी हाथ सेक रहे हैं

© - प्रशांत सेठ



Friday, July 29, 2016

काव्य-कथा

कविता यदि आपका पेशा नहीं है तो कविता करने के लिए बहुत से समझौते करने पड़ते हैं। आज के व्यस्त समय में कविता के लिए वक़्त निकालने की एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। लेकिन इसी जूनून में मन का सुकून भी है।
कवि की कल्पनाओं की कोई सीमा नहीं होती मगर वास्तविक जीवन की अपनी मर्यादा होती है; क्योंकि दुनिया दिल से नहीं दिमाग से चलती है। कविता हर बंधन से मुक्त होती है और कवि अनेक बंधनों में जकड़ा हुआ व्यक्तित्व। इसलिये अधिकांश कवियों में उनकी कविता की झलक नहीं मिलती। वो विरले ही होते हैं जो कविता को जीते हैं या जो जीते हैं वही लिखते हैं।
कल्पना और व्यवहारिकता के बीच इस द्वंद के चित्रण की एक कोशिश...

काव्य-कथा

आवश्यकता लिख लिख नोक
कलम की टूट गई
जीवन की आपा धापी में
कविता छूट गई

कितने कितने बोझ लिये मन
चला जगत के दुर्गम पथ पर
कविता लेकिन विचरण करती
कल्पनाओं के स्वर्णिम रथ पर
दो लोकों के फेर में पड़कर
दुनिया रूठ गई

भावों का पंछी उड़कर नित
शब्द नए ले आता है
स्वर सुबास से गीत महक कर
जन मानस को भाता है
लेकिन सच्चाई गीतों की 
सरगम लूट गई

सामर्थ्यों की चादर से नित
इच्छाओं का होता रण 
बहुत कठिन है पा जाना तब
इक बहुमूल्य सृजन का क्षण 
सब मोती संवेदनाओं के
नियति कूट गई

मन बहलाने को कब तक
कविता कोई लिख सकता है
वर्तमान से आँख मूंद, कैसे
भविष्य दिख सकता है
भावों की मटकी यथार्थ के 
घट में फूट गई

जीवन की आपा धापी में
कविता छूट गई

© - प्रशांत सेठ