Sunday, October 9, 2016

श्रद्धांजलि माँ

आधे पूरे का अनुपात नहीं जानता, बाँटने का गणित भी नहीं आता। आज अर्धांगिनी के मातृशोक को पूरा का पूरा अनुभव कर रहा हूँ। इस माँ ने जन्म भले ही ना दिया हो; लेकिन जो दिया है, वो जीवन से कम नहीं है...

श्रद्धांजलि जीवनदायिनी माँ को...

दुःख तो होता है यकीनन
यूँ तुम्हारे खो जाने पर
माँ, तुमसे नाराज़ हूँ बहुत
मुझसे पहले सो जाने पर

इससे पहले गहरे तम् में
छोड़ मुझे तू कब गई है
मैं जागा हूँ, तू सोती है
ये कैसी रीत नई है?
जल्दी क्या थी, चली जाती
ज़रा सुबह हो जाने पर
माँ, तुमसे...

धरती की बीज से अपने
क्या ऐसी होती है प्रीत
माँ नहीं है जिसकी, उसका
हवा ना पानी कोई मीत
बोलो कैसे ये ऊगेंगे
गोद धरा की खो जाने पर
माँ तुमसे...

कब तक ये ना मुरझायेंगे
कब तक यत्न करेगा माली
खिलना मुश्किल है फूलों का
जिनकी टूट गई हो डाली
बिखरे पल्लव देख रहा हूँ
जैसे पतझर हो जाने पर
माँ तुमसे...

साज़ भला वो क्या गायेंगे
जिनसे बिछड़ गया संगीत
बिना सरगम के इस दुनिया में
कहीं कोई नहीं है गीत
तेरे गीत हुये अधूरे
अपनी धुन के खो जाने पर
माँ तुमसे...

धैर्य साहस की एक मूरत
ईश्वर की थी वो सूरत
थक गई होगी चलते चलते
उसे विश्राम की थी जरूरत
तभी अड़ गई वो अचानक
छोड़ के सब कुछ यों जाने पर
माँ से नाराज़ नहीं होते यूँ
एक दिन जल्दी सो जाने पर

© - प्रशांत सेठ

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