चलो पथिक का धर्म निभायें
जो मिला है आभार करें
उलाहनों में क्या रखा है
आओ जीवन से प्यार करें
उठती गिरती बहती नदी सा
गीत कोई हम भी गायें
चलो पथिक का धर्म निभायें
ये गलत है, वो सही है
लेखा जोखा क्यों रखें हम
ह्रदय कोई खाता-बही है?
हिसाबों से परे चलकर
खुदको बे-मतलब लुटायें
चलो धरा का धर्म निभायें
साँझ ढले घर आना है
अपने हिस्से का दाना हमको
वैसे भी मिल जाना है
कल की फ़िक्र में क्यों अपना
आज हम व्यर्थ गँवायें
चलो पंछी का धर्म निभायें
धूप, बारिश और धूल से
मुस्कुराना सीखें हम भी
किसी डाल पर खिले फूल से
सारी ऋतुयें जी लें खुलकर
समय से पहले क्यों मुरझायें
चलो पुष्प का धर्म निभायें
औरों को सदा उजियारा
गिरा नहीं है वो कभी जो
दूसरों का बना सहारा
अंधेरों की जहाँ सत्ता हो
वहां चलकर दीप जलायें
चलो सूरज का धर्म निभायें
भेद रहित मन का भाव हो
रीत जायें आओ वहां पे
जहाँ कहीं भी अभाव हो
जो मिला है बाँटें उसको
कृतज्ञता से भर भर जायें
चलो मेघ का धर्म निभायें
इस अदभुत जीवन का सार
बहुत दिया देने वाले ने
कोटि कोटि उसका आभार
बूँद बूँद सींचा है जिसने
उस माली को शीश नवायें
चलो मनुष्य का धर्म निभायें

