"वो दुआएं काश मैने दीवारों से मांगी होती
ऐ खुदा सुना है कि उनके तो कान होते हैं..."
किसी शायर की ये पंक्तियाँ आज एक मित्र ने मुझे सुनायीं तो मन में एक बेचैनी उत्पन्न हुई। बहरा होने का जिसपर आरोप लग रहा है, वो सचमुच बहरा है या फिर उसकी भाषा ही अलग है। या फिर हमारा ये कहना सुनना ही एकतरफा है।
मन हुआ कि चलो आज उसकी भी सुन लें। हमें तो उम्र भर बोलते ही रहना है। ज़रा सा मौन बहुत कुछ कह गया। नतीजा आपके सामने है।
‘बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।
कर बिनु करम करइ बिधि नाना।।’
तुमको बेहतर लगती हैं ये दीवारें, जिसमें तुम्हारे भय विद्यमान हैं
या फिर वो मूरत, जिसके बड़े बड़े कान हैं
क्योंकि दीवारों में एक आशा होती है, जिसकी कैद में तुम रहते हो
और मूरत देती है आभास सुनने का, हर वो बात जो तुम कहते हो
तुम्हें पसंद हैं दीवारें, क्योंकि तुम्हारे जीवन में सामान बहुत है
वरना जीने के लिये तो खुला आसमान बहुत है
तुम्हें पसंद हैं दीवारें, क्योंकि ये सुरक्षा देती हैं तुम्हारे व्यर्थ को
मगर ये विलग भी कर देती हैं, जीवन से अर्थ को
दीवारों के पीछे भी एक संसार होता है
लेकिन दृष्टि से परे कुछ भी, तुम्हें कहाँ स्वीकार होता है?
और दृष्टि केवल तुम्हारी अपनी समझ का विस्तार है
जिसकी सीमा उतनी ही है, जितना तुम्हारा अहंकार है
तुम ढूंढते हो मुझे कुछ सुनाने के लिये
और मैं खड़ा हूँ कबसे तुम्हें पाने के लिये
तुम्हारा हर क्रंदन, हर स्पंदन, मैं सुन रहा हूँ
क्या अर्थ है, क्या व्यर्थ है, सब गुन रहा हूँ
मैं तुम्हारा वो शब्द भी सुन रहा हूँ जो अनकहा है
देख रहा हूँ वो आंसू जो अभी तक नहीं बहा है
चख रहा हूँ वो स्वाद जो पाना बाकी है
सूंघ रहा हूँ वो खुशबू जो आना बाकी है
मैं पत्थर नहीं हूँ, तुम्हारे मन का गढ़ा हुआ
बस देख रह हूँ दौड़ तुम्हारी, खड़ा हुआ
प्रतीक्षारत हूँ, उस एक पल के विश्राम का
विराम जब होगा तुम्हारे मन के संग्राम का
मेरी शीतलता लुप्त है, तुम्हारी भौतिकता के ताप में
और खो गई है वाणी, कामनाओं के अंतहीन प्रलाप में
ढूंढो, मैं तुम्हारे भीतर ही कहीं खो गया हूँ
मूरत नहीं हूँ, हाँ तुम्हारी दृष्टि में हो गया हूँ
मैं वहीँ रहता हूँ जहाँ स्वर उत्पन्न होते हैं
और वहां भी जहाँ निर्मित सारे स्वप्न होते हैं
जो बीज है उसे फल नहीं दिखता
मैं तो आज हूँ, मुझे कल नहीं दिखता
मैं यहीं, तुम्हारे बहुत पास हूँ
तुम देह हो तो मैं श्वांस हूँ
तुम लोभ हो तो मैं ही डर हूँ
तुम रोग हो तो मैं ही ज्वर हूँ
तुम लक्ष्य हो तो प्रयास हूँ मैं
तुम प्रार्थना हो तो विश्वास हूँ मैं
तुम्हारे अंदर ही सत्य का सोया हुआ स्वर हूँ
ढूंढते हो जिसे, मैं वही खोया हुआ ईश्वर हूँ
© - प्रशांत सेठ
