Tuesday, August 26, 2014

आ अब लौट चलें...

अच्छे दिनों की तलाश में ना कितने ख्वाब, रोज़ गाँव से निकलते हैं शहर की तरफ। कच्ची उम्र का भोला और नादान युवक जब शहर पहुँचता है तो ये दुनिया सबसे पहले छुड़ा लेती है उसकी मासूमियत। फिर शुरू होता है झूठी कामयाबियों का वो सफ़र, जिसमे इंसानियत के एहसास धीरे धीरे दम तोड़ते जाते हैं।

लेकिन कहीं ना कहीं आत्मा कचोटती है। जिंदगी की असलियत से रूबरू होकर आँखों पर से रंगीन पर्दा हटता है। दुनिया भर का नाम, शोहरत, रुतबा और दौलत भी वो सुकून नहीं दे पाती जो अपनी मिटटी अपने लोगों में मिलता है। इस रफ़तार भरी जिंदगी में दौड़ते दौड़ते घायल जज्बातों के रिसते घावों को, कभी ना कभी ठहर कर धोना ही पड़ता है।

अपनी जड़ों से कोई कब तक भाग सकता है। आसमानों को छूने की चाह में जड़ों से दूर हो चुके दरख़्त को, मामूली हवायें भी गिरा जाती हैं। ज़रूरी है कि इंसान ऊंचाई पाने के साथ साथ गहराई से भी अछूता न रहे। और ना भूले अपनी ज़मीन को और ज़मीन से जुड़े लोगों को।

अपनी जड़ों की और लौटते इन एहसासों को शब्दों में बांधने की एक कोशिश...

आ अब लौट चलें...

सर की ज़द से बाहर चले दिल की ठांव हो लिये
बाद मुद्दत के शहर से निकले वापस गाँव हो लिये

अरमानों को पंख लगे थे कभी सुनहरे ख्वाबों के
सच से रूबरू यूँ हुये कि फिर से पाँव पाँव हो लिये

कामयाबी के मौसम में शोहरतों की बारिश थी
रिश्ते भी कागज़ की जैसे बरसाती नांव हो लिए

बचपन के वो गीत थे जितने कोयल जैसी तानो में
इस जद्दोज़हद में जिंदगी की कांव कांव हो लिये

हक़ीक़तों की कड़ी धूप में जज्बातों की खैर कहाँ
हम अपने एहसास थाम कर छाँव छाँव हो लिये

©- प्रशांत सेठ

ज़द=दायरा

कैसे समझूं प्रेम की भाषा

विगत जन्माष्टमी पर मैं कुछ ढूँढ रहा था। मैं ढूँढ रहा था वो कारण जो मनुष्य और परमात्मा के बीच दूरी उत्पन्न करता है। इस चिंतन ने एक रचना को जन्म दिया ...

जीवन में है शेष कदाचित
अभिलाषा निज सम्मान की
भटक रहा हूँ जगत में लेकर
आशा मिथ्या पहचान की
मैं क्या समझूं प्रेम की भाषा
मुरलीधर घनश्याम की

मन बसी स्वार्थ की नगरी
सत्ता जिसमें अभिमान की
हूँ आकंठ नदिया में डूबा
माया मोह और अज्ञान की
मैं क्या...

शोर बहुत हुआ इच्छाओं का
भीड़ लोभ मद और काम की
दौड़ा रही नित स्वप्नों के पीछे
भूख दिन रात सुबह शाम की
मैं क्या ....

लालसाओं में लिप्त ह्रदय ज्यों
रण भूमि जीवन संग्राम की
गुंजित कैसे फिर कानों में होगी
ध्वनि मधुर मुरली के तान की
मैं क्या ...

© - प्रशांत सेठ

Monday, August 25, 2014

मैं इन्कलाब हूँ !!!

जनकवि स्व. विपिन मणि  जी की 12वीं पुण्यतिथि पर कोटा (राजस्थान) में उनकी स्मृति में आयोजित कवि सम्मलेन में सम्मिलित हुए। काव्य रस की अदभुत धारा बहाने के लिये इस कार्यक्रम के आयोजक प्रिय मित्र डॉ. उदय मणि, कपिल मणि और लोकेन्द्र मणि को हार्दिक बधाई।
संसार में कुछ एक ही ऐसे किरदार होते हैं जो खुद के लिये नहीं जिया करते। इसलिये उनका जीवन देह की सीमाओं से परे जाकर मृत्यु के लिये भी चुनौती बन जाता है। मृत्यु का अधिकार केवल देह पर हो सकता है, विचारों पर नहीं।

श्रद्धेय बाबूजी स्व. विपिन मणि जी को श्रद्धांजलि...

अपनी औलाद पर कब अपना असर नहीं होता
सच की ज़मीन पर कभी झूठ का शज़र नहीं होता
लो देख लो मेरा अक्स अब मेरे बच्चों में
एक जागता ख्वाब हूँ मैं, जो कभी नहीं सोता
...
और ये पंक्तियाँ समर्पित हैं उस अदभुत प्रेम और अपनेपन को जो मणि परिवार के हृदय में बसता है

तिजारत का हुनर मेरा, शायद मुझसे रूठ गया
बरसों से मुनाफे का सिलसिला यूँ टूट गया
दिल के कारोबार में अबकि घाटे की आमद हुई
जिस्म फकत ले आया हूँ, मैं वहीँ छूट गया

© - प्रशांत सेठ

Thursday, August 14, 2014

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

हर माँ खूबसूरत लगती है यदि उसकी संतान काबिल हो। इस लिहाज़ से ये तस्वीर भी खूबसूरत है क्योंकि इससे एक बेहद खूबसूरत ख्याल ने जन्म लिया और बात कुछ यूँ निकली के...

मुल्क की इबादत फ़र्ज़ है इंसान का

मिटा नहीं सकता कोई फिर नक्श हिंदुस्तान का
ज़र्रे ज़र्रे में दिख रहा है यूँ जब अक्स हिंदुस्तान का
अपने ज़मीर-ओ-ईमान से ही मुल्क की शान है
गर इतनी बात समझ ले हर शख्स हिंदुस्तान का

© - प्रशांत सेठ


Monday, August 4, 2014

दोस्ती एक खूबसूरत एहसास होती है !!!

मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

सच्ची दोस्ती वक़्त की, लम्हों की मोहताज नहीं होती। दिन और रात नहीं देखती, सिर्फ दोस्त की ज़रूरत को देखती है।

मुस्कराहट भरे अनगिनत पलों के बीच में तकरार के कुछ लम्हे ना हों, तो उस दोस्ती को अधूरा समझना चाहिये। ऐसी दोस्ती जो किसी इम्तिहान से ना गुजरी हो, उसकी कसमें नहीं खायी जातीं। दुनिया के किसी भी रिश्ते को आजमाकर देख लीजिये, जिंदगी की ढलानों में अगर कोई साथ होता है तो सिर्फ दोस्ती....

किसी दुआ की तरह ही इखलास होती है
जब कुछ नहीं होता तब यही पास होती है
खून के, मतलब के, हर रिश्ते से ऊपर दोस्ती
उघड़े हालात में आखरी लिबास होती है

© - प्रशांत सेठ

इखलास=पवित्र

Friday, August 1, 2014

एक थे विषधर भाई

नागपंचमी स्पेशल पंच...

मियां सांप को दूध नहीं पिलाओगे?? बाहर से आवाज़ आई
दरवाज़ा खोलकर देखा तो खड़े थे विषधर भाई
डर की वजह से अपनी घिग्गी बंध आयी
हमने हौले से पूछा आज हमारी याद कैसे आयी??
कोई ना कोई बात इसमें होगी ज़रूर
वरना आप कहाँ आते हैं, आप तो बुलवाते हैं हुज़ूर

वो अन्दर आये बैठे, फुफकारते हुये फन पटका
हमने किसी अनहोनी की आशंका से थूक गटका
बोले विद्वान् होकर भी तुम कमाल करते हो
अजीब अजीब से बेतुके सवाल करते हो
भई आज नागपंचमी है, हम आज ही निकलते हैं
वरना साल भर तो तुम्हारी आस्तीन में पलते हैं

तुम बड़े जल्दी भूल जाते हो
इसलिए बार बार डसे जाते हो
वैसे तो हम तुम्हारा खून पीकर काम चलाते हैं
आज व्रत की मजबूरी है हम शाकाहार अपनाते हैं
खैर छोडो ये सब फिजूल की बातें हैं
तुम दूध पिलाओ फिर हम जाते हैं

हमारा गला भर आया आवाज़ थरथरा गयी
गुस्से के साथ साथ थोड़ी हिम्मत आ गयी
हमने कहा हुज़ूर आप तो अन्नदाता हैं
और हम मामूली से मतदाता हैं
पांच साल में एक बार वोट देते हैं
और आप हैं के साल में पांच बार चोट देते हैं

आपने पाल रखी है वो डायन महंगाई
जो चट कर गयी है हमारे घर की दूध मलाई
हमारे बच्चे भी अब पानी पीकर काम चलाते हैं
इसलिये आजकल हम साँपों को दूध नहीं पिलाते हैं
हमने सोच लिया है अब नहीं चलने देंगे किसीकी दबंगाई
अब की मनाएंगे आज़ादी जैसी पहले कभी नहीं मनायी

हमने विश्वास को पाला, श्रद्धा को गले में लटकाया है
मगर तुम सांप हो ये बहुत देर से समझ में आया है
तुम ही हो जिसने नफरत का ज़हर फैलाया है
तुम ही तो हो जिसने मुल्क को बंटवाया है
आज आँख में आँख डालकर बोलने का वक़्त आया है
जिसका फन कुचलना था उसको हमने सर पर बिठाया है

दोस्तो ये थे हमारे नेता विषधर भाई
चुनावों के मौसम में जिनको हमारी याद आयी
अपने शाकाहार की दे रहे थे दुहाई
और वोट को समझ रहे थे दूध मलाई
अब तक होता था सत्कार आज दुत्कार है पायी
क्योंकि हमको भी पैंसठ बरस के बाद अकल आयी

© - प्रशांत सेठ

Sunday, July 27, 2014

भूख

बहुत दिनों से इन्टरनेट पर वायरल हो चुकी, इस तस्वीर को देख रहा हूँ।

अब ये मासूम फिर कभी भोजन नहीं मांगेगा। इसने इतनी शिद्दत से भोजन की चाह की होगी के कुदरत ने इसे खुद ही भोजन बना दिया....गिद्ध का।

इंसानियत भले ही अपने फ़र्ज़ से चूक जाये मगर कुदरत अपना काम कर रही है। ये तस्वीर उस आधी दुनिया के स्वार्थ की कहानी कह रही है जो समृद्ध तो है मगर उस समृद्धि की कीमत चुका रही है, बाकी की आधी दुनिया। ऐसे में एक सवाल ज़ेहन में उठता है .... क्या जो समृद्ध हैं, वही गिद्ध हैं?

हम और आप उसी समृद्ध दुनिया का हिस्सा हैं इसलिए देखिये भूख से दम तोड़ती एक जिंदगी को गिद्ध की नज़र से, और महसूस कीजिये इन पंक्तियों में छुपे दर्द को...

रस्म-ए-क़ज़ा का ये खौफ़नाक सा मंज़र देख लो
एहसास से खाली दिल-ए-आदम बंजर देख लो
ये जो मरता है यहाँ फकत बच्चा नहीं है मासूम
इंसानियत के जिस्म में खुदगर्जी का खंजर देख लो

© - प्रशांत सेठ

कज़ा=मौत
दिल-ए-आदम=आदमी का दिल
खुदगर्जी=स्वार्थ