Wednesday, March 12, 2014

कुर्बान

वो ज़मीं में सो गया हर सांस लुटा के
गो जी सकें अमन से हम अपना सर उठा के

इंतज़ार में होगा कोई अपनी मांग सजा के
चल दिया यूँ बेवफा उसकी दुनिया मिटा के

जितना था खूँ जिस्म में सारा बहा के
चंद अश्क कमाये नसीब ने बेदर्द जहां के

बेवा के उसकी हाथ कुछ मुआवजा थमा के
सो जायेंगे हम भी फिर से ये दस्तूर निभा के

ये तो चला लम्बे सफ़र पर सब धूल झडा के
था फ़र्ज़ जिंदगी से बड़ा इतनी बात बता के

सोचो क्या पाया हमने ये दिलदार गंवा के
हम भी वही तुम भी वही बस शेर जुबां के

© Copyright Regd. - प्रशांत सेठ


Sunday, March 9, 2014

Do and Prove It

You can't change somebody's perception by arguments. Your own behaviour and deeds will count more than your words.
Have faith in your beliefs and you will make the difference

Don't just follow don't just tread
On the footprints others have had
Let your conscience lead you there
The Nature has a place for you somewhere

-Prashant Seth

Saturday, March 8, 2014

Happy Women's Day



नारी

बहुत की कोशिश हमने
इतनी छोटी बात नहीं है
सच कहूं तो तुमपर लिखने
लायक मेरी औकात नहीं है

विस्तृत नीले नभ के जैसी
सागर से भी गहरी तुम
तुम नारी हो तुमसे बढ़कर
सृष्टि की सौगात नहीं है

संस्कारों की जननी तुम
मानवता की तुम शिल्पी
तुम नारी हो बिना तुम्हारे
आदम की ही ज़ात नहीं है

भक्ति का आधार तुम्ही से
शक्ति का संचार तुम्ही से
तुम दुर्गा तुम लक्ष्मी
अबला कहूं उचित बात नहीं है

सीता तुम हो राधा तुम हो
राम कृष्ण की गाथा तुम हो
जीवन को आकार जो देती
प्रेरणा तुम सी ज्ञात नहीं है

सृष्टि का श्रृंगार हो तुम
हर रचना का सार हो तुम
क्या सात रंग सात सुरों का
अदभुत तू अनुपात नहीं है ?

माँ का कभी आँचल बनकर
कभी प्रेयसी का काजल बनकर
प्रभु प्रेम का प्रतिबिम्ब नारी
क्या इश्वर का मौन संवाद नहीं है ?

© Copyright Regd. - प्रशांत सेठ

Thursday, March 6, 2014

झाँसी

दिल भी है अपना, दर-ओ-दीवार है यहाँ
ये वो शहर है सब अपने यार हैं जहाँ
मेरे बचपन की खुश्बू, मेरे माज़ी के किस्से
मेरे आज भी कई तलबगार हैं यहाँ

-प्रशांत सेठ

अक्स बच्चों में नज़र आते हैं

ये जो मेरे पीछे नन्हे कदम चले आते हैं
मैं सही राह पर हूँ मुझे यही बताते हैं
दुनिया के आइनो की मुझे ज़रुरत ही क्या है
मेरा अक्स मुझे मेरे बच्चे दिखाते हैं

- प्रशांत सेठ

Sunday, March 2, 2014

कलमवीर

इस मुल्क की सियासत में मेरा किरदार क्या है?
सोचता हूँ वतन को मुझसे दरकार क्या है?
मेरी कलम है सलामत तो यकीन है मुझे
इसके आगे ज़ुल्मत की तलवार क्या है?

- प्रशांत सेठ

Monday, February 24, 2014

एक उम्मीद

ये इंक़लाब है जो दिलों में पनपता है
वो सियासत है जो मुट्ठियों में रहा करती है

किसने देखी है सूरत और रास्ता समंदर का
ये हौसलों की नदी है जो बे-खौफ बहा करती है

गर्द चेहरे पर, पाँव में छाले, हैं तोहफे इस सफ़र के
एक उम्मीद में ज़िंदगी हर सितम सहा करती है

इस धुंध के पार यकीनन कहीं रोशनी होगी
मेरे अंदर एक आवाज़ यूँ रोज़ कहा करती है

ना-उम्मीदी के अंधेरों में, शमा जलती रहे कोशिशों की
इंतज़ार यूँ तो शम्स का हर निगाह करती है

शब भर के हाकिम हैं, ये अँधेरे इस मुल्क में
देखना कुदरत क्या कमाल कल सुबह करती है

© Copyright Regd. - प्रशांत सेठ

शम्स=सूरज, शब=रात, हाकिम=राजा