वो सियासत है जो मुट्ठियों में रहा करती है
किसने देखी है सूरत और रास्ता समंदर का
ये हौसलों की नदी है जो बे-खौफ बहा करती है
गर्द चेहरे पर, पाँव में छाले, हैं तोहफे इस सफ़र के
एक उम्मीद में ज़िंदगी हर सितम सहा करती है
इस धुंध के पार यकीनन कहीं रोशनी होगी
मेरे अंदर एक आवाज़ यूँ रोज़ कहा करती है
ना-उम्मीदी के अंधेरों में, शमा जलती रहे कोशिशों की
इंतज़ार यूँ तो शम्स का हर निगाह करती है
शब भर के हाकिम हैं, ये अँधेरे इस मुल्क में
देखना कुदरत क्या कमाल कल सुबह करती है
© Copyright Regd. - प्रशांत सेठ
शम्स=सूरज, शब=रात, हाकिम=राजा
No comments:
Post a Comment