Monday, February 24, 2014

एक उम्मीद

ये इंक़लाब है जो दिलों में पनपता है
वो सियासत है जो मुट्ठियों में रहा करती है

किसने देखी है सूरत और रास्ता समंदर का
ये हौसलों की नदी है जो बे-खौफ बहा करती है

गर्द चेहरे पर, पाँव में छाले, हैं तोहफे इस सफ़र के
एक उम्मीद में ज़िंदगी हर सितम सहा करती है

इस धुंध के पार यकीनन कहीं रोशनी होगी
मेरे अंदर एक आवाज़ यूँ रोज़ कहा करती है

ना-उम्मीदी के अंधेरों में, शमा जलती रहे कोशिशों की
इंतज़ार यूँ तो शम्स का हर निगाह करती है

शब भर के हाकिम हैं, ये अँधेरे इस मुल्क में
देखना कुदरत क्या कमाल कल सुबह करती है

© Copyright Regd. - प्रशांत सेठ

शम्स=सूरज, शब=रात, हाकिम=राजा


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