Friday, August 2, 2019

गुमशुदा

मैंने पूछा सिकुड़ी हुई अँतड़ियों से
तुम्हारा धर्म क्या है?
तुम्हारा इष्ट कौन है?

भूख का इष्ट रोटी है साहब
और अमाशय के मंदिर में
इस देवता की स्थापना ही मेरा धर्म है
और मेरी पूजा है
श्रम के यज्ञ में, पसीने की आहुति

मैंने पूछा झुकी हुई कमर से
रोग ग्रस्त मरणासन्न देह से
अपना इष्ट और धर्म बताओ?

जीवन और सिर्फ जीवन
यही मेरा धर्म है
चंद साँसें जो दिला दे
वही इष्ट है
दुआ ही मेरी इबादत है

मैंने पूछा
जीवन में पहला कदम बढ़ाते
नन्हे पैरों से
तुम्हारा पंथ क्या है?
और मंज़िल किधर है?

ज्ञान मेरा पंथ है
मुझे खुद से मिला दे वही इष्ट है
अज्ञान से मुक्ति ही मंज़िल है

मैंने पूछ बैठा भरे पेटों से
स्वस्थ शरीरों से
और ज्ञानी के चोले में
तथाकथित शिक्षितों से

मैं गुम गया हूँ अब
रंगों और झंडों की भीड़ में
फसादों के शोर में, लफ़्ज़ों के युद्ध में
उन्मादी जाहिलों में, सियासती फ़ितूरों में

मैं तुम्हारा चिंतन
गुम गया हूँ नफरत के मेले में
और खो गया मुझसे इस कोलाहल में
मानवता का धर्म
सत्य का पंथ
और प्रेम की मंज़िल

© - प्रशांत सेठ


Saturday, July 27, 2019

भय बिनु होइ न प्रीति

हे डरे हुए लोगों के 49 प्रतिनिधियो
तुम्हारा डर लाज़िमी है
क्योंकि
तुम्हारा धर्म खतरे में है
तुम्ही से

धर्म मरता नहीं है
धार्मिकों के मरने से
ईसाईयत नहीं मरी यीशु के साथ
बुद्धत्व नहीं गया बुध्द के साथ
सनातन धर्म मिटा नहीं
राम-कृष्ण के साथ

धर्म मरता है
जब तुम नहीं डरते
मंदिर के प्रसाद में
ज़हर की साज़िश रचते कुछ लोगों से
स्त्रियों को बाँझपन बाँटते श्रीलंकाई डॉक्टर से
मदरसे में पकड़े जाते हथियारों से
महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी करते
कौम के नेताओं से
कश्मीर के पत्थरबाजों से, हैवानों से
ट्विन टॉवर को मिटाते लादेनों से
मुम्बई को दहलाती साज़िशों से
ध्रुव त्यागियों के हत्यारों से
बुरहान वानियों से, दाऊद इब्राहिमों से
...........
...........
जब तुम नहीं डरते
मध्य पूर्व से आयातित क्रूरता से
धार्मिक उच्छृंखलता से
धर्म के तालिबानी संस्करण से

धर्म मरता है
जब तुम भूल जाते हो
कलाम साहब को, अशफाकुल्लाह को
.........
.........
अब्दुल हमीद को भूलकर
जब तुम्हें दिखता है नायक
तबरेज़ आलमों में

मुझे डर लगता है
जब कोई मदान्ध हत्यारा लेता है
"राम" का नाम
जब कोई कुंठित भगवाधारी देता है
धर्म की परिभाषा
मुझे डर लगता है तब
धार्मिकों की खामोशी से
क्योंकि तब तब
मैं देखता हूँ अपने धर्म को मरते हुए

तुम डरो ज़रूर डरो
तुम्हारा डर ही
विश्व शांति की नई उदघोषणा है
क्योंकि
तुम तब नहीं डरते
जब तुम्हारा धर्म मरता है
अजमल कसाव के हाथों
या फिर हाफ़िज़ सईद की तक़रीरों से

© - प्रशांत सेठ


Sunday, July 7, 2019

केमिस्ट्री

मैंने पढ़ा है
कुछ पदार्थ करते हैं मिलकर
रासायनिक क्रिया
जब अम्ल और क्षार मिलते हैं
तो रह जाता है शेष
नमक और पानी

उन्होंने भी पढ़ा होगा
तभी तो मिलने नहीं देते
सनातन सत्य से
मुसलसल ईमान को
कहीं जाग ना जाए
तुम्हारे खून में नमक
तुम्हारी आँखों में पानी
और धुली हुई आँखों से तुम
पढ़ ना लो फिर से
धर्म को

मैंने सुना है
कुछ पदार्थ होते हैं ज्वलनशील
ज़रा सी हवा में
पकड़ लेते हैं आग

सियासत की हवा में
पाखण्ड और अज्ञान भी
पकड़ लेते हैं
कट्टरता की आग
ये डाल देती है समझ पर
रंगीन धुएं का आवरण
ये करती है सत्य के झूठे अनुवाद
और सोख लेती है
धर्म ग्रंथों से उनके वास्तविक अर्थ

मैंने पढ़ा है
कुछ शाही पदार्थ क्रिया नहीं करते
किसी भी तत्त्व के साथ
जैसे कि धर्म और ज्ञान
इनके सामने हार जाती है
सियासत की हर साज़िश

मगर
मैं जानता हूँ
कुछ पदार्थ होते हैं
प्राणों से भी अधिक बहुमूल्य
इनमें से एक है
अपनी संस्कृति भी

© - प्रशांत सेठ


Monday, July 1, 2019

एक प्यारा सा इतवार

मित्रों के साथ सपरिवार वृक्षारोपण ....

एक प्यारा सा इतवार

कुछ गड्ढे खोदे, कुछ विकार
कुछ पौधे रोपे, कुछ संस्कार
भावों के जल से सींच आज को
रच लिया कल का संसार

कुछ धूप सही, कुछ भूख सही
श्रम की भी थोड़ी बूँद बही
सूरज ने तब कहा हँसकर
वृक्ष नहीं तो तुम ही नहीं

खिलते पल्लव पुष्पों ने जाना
अपने जीवन का आधार

धूप में समझा महत्व छाँव का
शहर ने समझा अर्थ गाँव का
स्वस्थ जीवन की राह में सबने
समझा मतलब श्रम के पाँव का

बचपन ने सीखा यहाँ आकर
प्रकृति को देना आभार

इतना दोहन हम करते हैं
लौटाने से मगर डरते हैं
धरती के इस कर्ज की पहली
चलो आज हम किस्त भरते हैं

मेघों ने भी किया बरसकर
समग्र परिश्रम को स्वीकार

मन की अपनी भूख प्यास का
लक्ष्य ना हो सिर्फ निज विकास का
आज भविष्य को अर्ध्य देते हैं
वर्तमान के लघु प्रयास का

इसी सोच के साथ बीता
एक प्यारा सा इतवार

© - प्रशांत सेठ


Sunday, June 16, 2019

पिताजी

पिताजी अंधे हैं
लोग कहते हैं वो विद्वान हैं
मेरी कमियों से मगर अनजान हैं
मुझपर गर्व उन्हें हर क्षण है
उनका पुत्र दुनिया में विलक्षण है
नहीं देखते, मेरे मन पे जमी काई को
नहीं देखते, मुझमें किसी बुराई को
पिताजी निश्चित अंधे हैं

पिताजी बुरे हैं
वो छुड़ा लेते हैं मेरा हर सामान
मेरी पीड़ा सारी, मेरे दुःख तमाम
और छुपा ले जाते हैं मुझसे
अपने अकेलेपन की हर शाम
खुद का कोई सपना नहीं सजाते हैं
मेरे हर सपने को अपना बताते हैं
पिताजी वाकई बहुत बुरे हैं

पिताजी लापरवाह हैं
अनुराग में डूबे इतने हैं मगन
खो दिया यूँ ही सारा जीवन
तमाम उम्र खिलौने सहेजने में
खुद बिखरे हमें समेटने में
तिनका तिनका हमें जोड़ती गईं
उनकी इच्छायें दम तोड़ती गईं
पिताजी बेहद लापरवाह हैं

पिताजी बेपरवाह हैं
उनकी अपनी कोई सूरत नहीं है
उन्हें दर्पण की ज़रूरत नहीं है
अपने काव्य में ज्यूँ खुदको ढूँढ़ता कवि
खुुुश होते हैं देखकर, मुझमें अपनी छवि
कवि-कविता के बीच कोई नहीं होता
अपने काव्य के वो स्वयं ही हैं श्रोता
पिताजी दुनिया से बेपरवाह हैं

पिताजी नासमझ हैं
मेरा नजरिया ही उनकी दृष्टि है
मेरी दुनिया ही उनकी सृष्टि है
ईश्वर पिता है या पिता ही ईश्वर स्वरूप
वो सृजन करते रहे, मेरी इच्छा के अनुरूप
उनकी अपनी कोई मंज़िल, कोई रास्ता नहीं है
उन्हें दुनिया में किसी से वास्ता नहीं है
पिताजी समझते नहीं हैं

पिताजी नरम गरम हैं
वक़्त की धूप में खुद तपते हैं
मुझको तो शीतल मगर लगते हैं
मेरे सफर में वो हौसलों का पाँव हैं
मेरी थकन को बरगद की छाँव हैं
जिसकी ज्योति से चन्द्रमा देदीप्यमान है
मेरी चमक के पीछे, वो सूर्य के समान हैं
पिताजी मेरी ऊर्जा हैं

© - प्रशांत सेठ


Sunday, June 9, 2019

धर्म

वेद पुराण गीता कुरान
शायद फिर से पढ़ना होगा
धर्म वही नई दृष्टि से अब
कदाचित फिर से गढ़ना होगा

निंदा करना सरल है किंतु
निंदा का यह सूत्र तो मानें
वंदित को जानें ना जानें
निंदित को अवश्य पहचानें

प्रकाश को समझना है तो
गहरे तम को पढ़ना होगा

मैं बड़ा हूँ, वह छोटा है
मन ने कितने वहम हैं पाले
मेरा कथन ही अंतिम सत्य है
बुद्धि पर ये अहं के ताले

दुनिया से क्या जूझ रहे हो
पहले खुद से लड़ना होगा

अपनी समझ का नित विस्तार
ना करे वो छात्र नहीं है
ग्रहण करो या करो निस्तार
ज्ञान बड़ा है, पात्र नहीं है

जड़ता के जो पोषक, उनको
ठहरे जल सा सड़ना होगा

मन शैतान मन फरिश्ता
मानव तेरा मर्म यही है
जीव का जीवों से रिश्ता
जो बतला दे धर्म वही है

करुणा के धागे से सबको
एक सूत्र में जुड़ना होगा

वेदों में विज्ञान को देखा
कुरान में शिव का स्वरूप
बहुत गहन है अगर मानो तो
कण कण है उसका ही रूप

अर्ध सत्य स्वीकार किया तो
भ्रम में फिर फिर पड़ना होगा

मुक्त होने को तत्पर मन हो
जब अपनी ही ग्रंथियों से
सनातन सत्य की राह चलना
मोह ना रखना पंथियों से

अज्ञात को पाना चाहो तो
ज्ञात से आगे बढ़ना होगा

© - प्रशांत सेठ


Sunday, May 26, 2019

एक गमला बचपन

मैं देखा करता था उसे
पीठ पर मन भर बस्ता लाद कर
स्कूल से लौटते हुए
फिर मन में बस्ता भर ख्वाहिशें देकर
नंबरों के पीछे दौड़ाते हुए तुम
उसे चढ़ा आते थे
कोचिंग सेंटर की सीढ़ियाँ

शिक्षा के कारखाने में
जमा की थीं तुमने
उसकी शरारतें, मासूमियत, जीवन की खुशबू
शाम ढले जब घर लौटता था
तब उसकी समझ पर लगा होता था
तुम्हारी पसंद का रंगीन चश्मा

एक दिन
वो लाया था खोदकर कहीं से गीली मिट्टी
बालकनी की मुंडेर पर
करीने से सजे हुए गमलों में भरने
उसने कहा था
इसमें पापा की पसंद के फूल खिलेंगे
उसकी समझ की कच्ची मिट्टी में
तुमने बो दिए थे चुपके से
अपनी नाकाम हसरतों के बीज

लेकिन अक्सर
ज़रा सी आँधी में उखड़ जाती हैं
कमज़ोर जड़ें
ज़रा से धक्के में गिरकर बिखर जाते हैं
बालकनी की मुंडेर पर सजे हुए गमले
तुम्हारी ख्वाहिशों की तीसरी मंजिल पर
टंगा हुआ बचपन भी
झुलस गया उस दिन, यथार्थ की आग में
तुमने सिखाया था उसे
सिर्फ और सिर्फ ऊपर बढ़ना

शायद तुमने सुना हो
तीसरी मंज़िल से
मौत की गोद में छलांग लगाते हुए
वो गमला, कह रहा था
"पापा, इस बार तुम भूल गए लेकिन
फिर कभी जब वक़्त गिराए मुझे ऊँचाई से
तुम खड़े रहना नीचे
मुझे थाम लेना
मैं टूट कर बिखरने से बच जाऊँगा
तुम्हारी पसंद के फूल खिलाऊँगा
शायद अगली बार"

© - प्रशांत सेठ