Sunday, July 29, 2018

एक पाठक की कविता

सच कहूँ तो
आजकल डर लगता है पढ़ने से
कागज़ से उठती हुई भड़ास
अपूर्ण इच्छाओं की टीस
रिश्तों में अपेक्षाओं की कड़वाहट
कवि के अवसाद का वमन
सच कहूँ तो डर लगता है
जब यथार्थ से दूर तुम ले जाते हो
श्रृंगार की स्वप्निल दुनिया में
जहाँ से लौटना पड़ता है मुझे तन्हा

प्रिय कवि
तुम मत लिखना अपने मन की पीड़ा
तुम लिखना
पीड़ा सिर्फ और सिर्फ समाज की
या फिर तब लिखना
जब एक हो जाये
तुम्हारी और समाज का दर्द
खड़े करना प्रश्न विसंगतियों पे
मगर एक शर्त है
हल भी देना होगा ढूँढ के
तुम्ही को
मत छोड़ देना मुझे ले जाकर
उसी अंधी गली में फिर
जहाँ छोड़ गयी थी मुझ को
सियासत

मैं युगों से भटक रहा हूँ अंधेरों में
उनकी तलाश में
जिनके पास है पता
रोशनी का
क्या तुम्हारे पास है तरकीब?
जिससे निकल सके
यथार्थ के छत्ते से
जीवन की शहद
तुम लिखना अवश्य लिखना
मैं ज़रूर पढूँगा उसे
जो होगी इस मुर्दा समाज में
एक ज़िंदा कलम

© - प्रशांत सेठ


Monday, July 23, 2018

मुंशी जी

आज 31 जुलाई को मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती पर, उन्हें ही तलाश करने के प्रयास में, एक छोटी सी गुस्ताख़ कलम...!!!

"मुंशी जी"

मैंने पढ़ा है तुम्हें
उम्र के उस दौर में जब
देखे सुने पढ़े को ही सच
समझ लिया करता है निश्छल बचपन
जब कहानी के पात्र चुपके से
बैठ जाते हैं छुपकर अचेतन में कहीं
और मन की कच्ची मिट्टी से धीरे धीरे
कुशल शिल्पी की तरह गढ़ते हैं
दृढ़ चरित्रों को
यकीन मानो
जीवन का सारा गणित
बिगाड़ के रख देता है
तुम्हारा साहित्य

वक़्त जब खड़ा कर देता है
धर्म अधर्म के दोराहे पर
और माँगता है निर्णय सही गलत पर
तभी, लाभ हानि के चिंतन से परे
मेरे भीतर कोई "पंच परमेश्वर"
ले लेता है मोल
किसी "जुम्मन" की नाराज़गी
खो देता है तुम्हारा "अलगू चौधरी"
सत्य के मार्ग पर
एक और रिश्ता

ज़िन्दगी
जब भी देती है अवसर आगे बढ़ने का
और माँगती है एक छोटी सी कीमत
ज़रा देर को आँख मूँद लेने की
उस तरफ से
जहाँ से प्रवेश करते हैं समाज में
झूठ और अनीति
तभी खड़ा हो जाता है द्वार पर अड़कर
एक "नमक का दरोगा"
और खो देता है "मुंशी वंशीधर"
कर्तव्य की राह पर
फिर एक अवसर

आज भी मन की "ईदगाह" में
दुविधा के द्वार पर खड़ा "हामिद
सोचता है
दुनिया के मेले में, मुट्ठी भर साँसों से
क्या खरीदूँ?
दिल बहलातेे ये खिलौने, या
मुझे पोषित करते
तुम्हारे बूढ़े आदर्शों को खुश करने
फिर वही त्याग रूपी "चिमटा"

मैं जानता हूँ
खो बैैठेगा हामिद एक बार फिर
प्रेम की राह पर
जीवन भर की पूँजी
और तब यथार्थ के धरातल पर खड़ा
हाथ में चिमटा लिये
तुमसे पूछेगा
मैंने तुम्हें पढ़ा ही क्यों?
और तुमने मुझे गढ़ा भी क्यों?

अवसर, रिश्ते, पूँजी खोकर क्या पाते हैं?
वो लोग जो तुम्हारे पात्रों को जी जाते हैं?
क्योंकि, इस संसार मे जहाँ
जीवन भर मानवता के "गबन" में लिप्त लोग
अंत समय "गोदान" के उपाय से
"प्रायश्चित" की अवधारणा लिये बैठे हों
और इस पाखण्ड पर मौन साधे
कबरी नहीं, समाज की सफ़ेद बिल्लियाँ
चालाकी से निश्चेष्ट पड़ी हों
वहाँ, इतना आसान नही है
ऐसे किरदारों को जीना
"कर्मभूमि" पर "बोध" के फूल खिलाना
फटे जूतों में मुस्कुराना
और
और "धनपत" से "प्रेमचंद" हो जाना

© - प्रशांत "सेठ"


Saturday, July 21, 2018

ठेठ दोहे

छोड़ा तीर कमान से, पाछे आँख दबाय
नया धनुर्धर देखिये, उलटी रीत चलाय

आँख दबा मत बोलिये, बात कभी गंभीर
बाहर ना आ जाये ये, भीतर की तासीर

शब्दों से बनती नहीं, बुद्धि की पहचान
कथनी करनी एक सी, कीजे तो श्रीमान

चलो न मुख पे ओढ़ के, विद्वानी का खोल
थाप पड़े सब जानिहें, फटा कहाँ से ढोल

नयन और मुख की न हो, बोली भाषा एक
मन भीतर के भाव को, कौन कहे फिर नेक

आलिंगन तब कीजिये, जब हो प्रेम अगाध
जल जल से मिल के रहे, क्यों अग्नि की साध

विजय चाहिये तो रहो, अहंकार से दूर
विनय राम का अस्त्र है, रावण मद में चूर

© - प्रशांत सेठ


ओवर कॉन्फिडेंस मोशन

देश करवट बदल रहा है, जाग रहा
मन पगले तू क्यों सत्य से भाग रहा

जनमत से इतर अपने विचार लिये
अपनी ढपली तेरा अपना राग रहा

कहें सेठ कविराय बौद्धिकता रोग है
खुद को खुद जला बैठा, जो आग रहा

अपनी आस्तीनों में ढूँढो कहाँ गया
इसी ठिकाने पे रहता एक नाग रहा

त्याग की भाषा पढ़ने लगे सुविधाभोगी
वो कड़वाहट को शक्कर से पाग रहा

केवल पंखों से परिंदे की पहचान नहीं
जो घूरे पे जा बैठे, समझो काग रहा

पहन जनेऊ अब घूम रहा मंदिर मंदिर
जिसके दामन पे हरदम ही दाग रहा

© - प्रशांत सेठ


Thursday, June 21, 2018

एक गृहस्थ का योग दिवस

विवाह करना और निभा ले जाना किसी योग से कम नहीं होता। इसलिये सभी शादीशुदा महायोगियों को योग दिवस की बधाई।

इसे सिर्फ हास्य ना समझो
अनुभव सिद्ध प्रयोग मानो
हम गृहस्थ धर्म के पालक हैं
हमको भी महायोगी जानो

"एक गृहस्थ का योग दिवस"

कुंवारेपन की अकड़ धरी रहती सारी है
पुरुष के अहम् का निदान ही नारी है
देह ही नहीं, मन को भी कर देती लचीला है
पति नामक जीव पे भारी, पत्नी नामक महिला है

जब कभी पत्नी कोपभवन में जाती है
पेट पीठ मिलकर करते कपालभाति है
पत्नी समक्ष शरणागत आसन में रहते हैं
सुखी गृहस्थ सदैव शीर्षासन में रहते हैं

वाणी के ज्ञात हमें कई दुष्परिणाम हैं
घर में ऊँचे स्वर पर पूर्ण विराम है
वाणी के अधिक प्रयोग में ऊर्जा का ह्रास है
हमें मौन साधने का योगियों सा अभ्यास है

हाथ में थैला लिए जब सब्जी लेने जाते हैं
स्वयं को प्रकृति के निकट ही पाते हैं
झाड़ू बर्तन कपड़े, रोज़ का व्यायाम है
यही हमारे प्राणों का निश्चित आयाम है

नियमित आहार संग संयमित व्यवहार है
इच्छाओं का निर्गमन ही मोक्ष का द्वार है
हर श्वांस पर पत्नी का नियंत्रण पूर्ण है
गरिष्ठ विचारों के लिये, वो कायम चूर्ण है

स्वस्थ और सुन्दर काया के हम स्वामी हैं
क्योंकि पत्नी के हर कथन के अनुगामी हैं
उसी के हाथ है हमारी, इड़ा पिंगला नाड़ी
बैल समान खींच रहे हैं, गृहस्थी की गाड़ी

गले में सर्प सा लटकाये हम भी रहते हैं
गंगा सा प्रचंड वेग सर पर सहते हैं
शक्ति को साध रहे, अपनी सहनशक्ति से
महायोग को प्राप्त हुये, पत्नी की भक्ति से

© - प्रशांत सेठ

Thursday, May 3, 2018

श्रमिक कथायें

1
ज्यूँ अधूरा गीत कोई
होठों पर आकर ठहर गया
एक स्वप्न चला गाँव से
मर गया जब शहर गया

थकन दर्द चुभन रस्तों की
दूर थी सब पाँव से
तरुण स्वप्न लिये शंकर
निकला था जब गाँव से
भोर उमंगें दी सूरज ने
और लील दोपहर गया
एक स्वप्न चला  ....

तपता सूरज पी जाता है
एक समंदर हौले हौले
स्वप्न आँख से उड़ जाते जब
भूख अंतड़ियों में खौले
दौड़ती है देह अब भी
मन कहीं ठहर गया
एक स्वप्न चला ....

शाम चढ़कर झुकी पीठ पे
नन्ही ज़िद जब सैर चली
तोड़ सपनों के पंख ज़िन्दगी
ज़रूरतों के पैर चली
निज अंश के मोह में पड़कर
निश्चय वहीँ ठहर गया
एक पुड़िया छुपा रखी थी
जाने कहाँ वो ज़हर गया
------------

2
दुनिया के प्रथम श्रमिक ने
देख स्वप्न किया निर्माण
और रचकर सृष्टि उसने
फूँक दिये मिट्टी में प्राण
दृष्टा बनके देखा जब तो
मन पीड़ा से भर गया
एक अधूरा गीत ....

बन गये स्वार्थ के पुतले
मेरे ये मानस अवतार
निराकार मैं सुख में था
व्यर्थ ही हुआ साकार
ह्रदय में दुःख का सागर
उठता लहर लहर गया
एक अधूरा गीत ...

फिर तांडव नृत्य करूँ या
प्रलय से कर दूँ हाहाकार?
या जगत को देकर विष ही
सृष्टि का कर दूँ संहार?
निज रचना के प्रेम में बंधकर
निश्चय किन्तु ठहर गया
एक अधूरा गीत ....

तब चिंतन के मंदराचल से
मथा उसने सागर मन का
अमृत रुप फल श्रम का
दिया जग को पसीना तन का
और कंठ में खुद शंकर के
विष उतरा और ठहर गया
एक अधूरा गीत ....
----------

अपने श्रम का अमृत देकर
विष स्वयं पी जाता है
वही शिव का अंश जगत में
वही श्रमिक कहलाता है
पूंजीवाद की हवेली थामे
श्रम नींव में गहरा है
वो अधूरा गीत आज भी
होठों पर ही ठहरा है

© - प्रशांत सेठ

Saturday, March 3, 2018

एक रंग प्रेम का

प्रकृति यानि विविधता, विविधता यानि अनेक रंग, कुछ पसंद कुछ नापसंद। होली इन सारे रंगों को स्वीकार करने का दिन है। इस विराट सृष्टि में सिर्फ "मैं" और "तू" का रंग नहीं है, और भी बहुत से रंग हैं। ये "मैं" और "तू" मिल जायें तो "हम" बनता है, ना मिलें तो "तू तू मैं मैं"।

"मैं" और "तू" में लिप्त जीवन
उत्सव का नहीं ये ढंग है
"हम" होकर ही तुम जानोगे
सृष्टि रचती कितने रंग है

अपनी अपनी दृष्टि का सत्य
मुझको प्यारा तुमको प्यारा
अहम् की इस एक लकीर ने
रिश्तों में किया बँटवारा
क्यों ह्रदय द्वार पर बैठे
द्वेष घृणा के ये भुजंग हैं
"हम" होकर ही ....

घर परिवार या कुटुम्बी बस
इतना ही तुम समझे अपना
अपनेपन की सीमा विस्तृत
करने की तैयारी रखना
फागुन तुमसे फिर पूछेगा
बैर बड़ा या क्षमा दबंग है
"हम" होकर ही ....

माटी का घट बन के माटी
इक दिन कण कण जा बिखरेगा
देह चढ़ा रंग भी उस दिन
उतरना है सो उतरेगा
मन पर अमिट रंग चढ़ा कर
उड़ने दो के मन पतंग है
"हम" होकर ही ....

खुद में सारे रंग समेटे
श्याम रंग रंगा घनश्याम
जिसके सारे रंग समर्पित
वो गोरी राधा निष्काम
रंग प्रेम का इनसे पाया
जिसने भी वही मलंग है
"हम" होकर ही ....

© - प्रशांत सेठ