1
ज्यूँ अधूरा गीत कोई
होठों पर आकर ठहर गया
एक स्वप्न चला गाँव से
मर गया जब शहर गया
थकन दर्द चुभन रस्तों की
दूर थी सब पाँव से
तरुण स्वप्न लिये शंकर
निकला था जब गाँव से
भोर उमंगें दी सूरज ने
और लील दोपहर गया
एक स्वप्न चला ....
तपता सूरज पी जाता है
एक समंदर हौले हौले
स्वप्न आँख से उड़ जाते जब
भूख अंतड़ियों में खौले
दौड़ती है देह अब भी
मन कहीं ठहर गया
एक स्वप्न चला ....
शाम चढ़कर झुकी पीठ पे
नन्ही ज़िद जब सैर चली
तोड़ सपनों के पंख ज़िन्दगी
ज़रूरतों के पैर चली
निज अंश के मोह में पड़कर
निश्चय वहीँ ठहर गया
एक पुड़िया छुपा रखी थी
जाने कहाँ वो ज़हर गया
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2
दुनिया के प्रथम श्रमिक ने
देख स्वप्न किया निर्माण
और रचकर सृष्टि उसने
फूँक दिये मिट्टी में प्राण
दृष्टा बनके देखा जब तो
मन पीड़ा से भर गया
एक अधूरा गीत ....
बन गये स्वार्थ के पुतले
मेरे ये मानस अवतार
निराकार मैं सुख में था
व्यर्थ ही हुआ साकार
ह्रदय में दुःख का सागर
उठता लहर लहर गया
एक अधूरा गीत ...
फिर तांडव नृत्य करूँ या
प्रलय से कर दूँ हाहाकार?
या जगत को देकर विष ही
सृष्टि का कर दूँ संहार?
निज रचना के प्रेम में बंधकर
निश्चय किन्तु ठहर गया
एक अधूरा गीत ....
तब चिंतन के मंदराचल से
मथा उसने सागर मन का
अमृत रुप फल श्रम का
दिया जग को पसीना तन का
और कंठ में खुद शंकर के
विष उतरा और ठहर गया
एक अधूरा गीत ....
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अपने श्रम का अमृत देकर
विष स्वयं पी जाता है
वही शिव का अंश जगत में
वही श्रमिक कहलाता है
पूंजीवाद की हवेली थामे
श्रम नींव में गहरा है
वो अधूरा गीत आज भी
होठों पर ही ठहरा है
© - प्रशांत सेठ
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