हम बाज़ार में घूम रहे थे, खड़ी किये कॉलर
अचानक सामने से आ गए दादा डॉलर
हम हिन्दुस्तानी रुपया हैं, इसलिये संस्कारी हैं
हमने कहा दादा प्रणाम, आज किधर की सवारी है?
बोले, छोटे आजकल तुम बहुत इतराते हो
हरे नीले थे, गुलाबी हुये जाते हो
ऐसी कौन सी तुम्हारी लॉटरी निकल पड़ी है?
के आज हमारे सामने तुम्हारी कॉलर खड़ी है?
कल तक तो अंडरग्राउंड तिजोरी में पड़े थे
अभी हमने देखा तुम बैंक की लाइन में खड़े थे?
ये क्या माया है, कुछ हमें भी समझाओ ना
फुरसत मिले तो एकाध दिन घर आओ ना
हमने कहा दादा चारों तरफ खलबली है
हमारी अर्थव्यवस्था कैशलेस हो चली है
हमें कैद करने वाले ज़ार ज़ार रो रहे हैं
हमारी तरक्की हुई है, हम डिजिटल हो रहे हैं
हमारे प्रमोशन से कई बीमारियों का इलाज होगा
सुविधा भोगियों को लूज़ मोशन, मतलब स्वस्थ समाज होगा
हमारे केशलेस होने से बरसों की परंपरा टूट गई है
रिश्वत, दूल्हे के फूफा की तरह रूठ गई है
आतंक, काला बाज़ारी, सट्टा और हवाला
इन सबके पोषक, भ्रष्टाचार का मुँह काला
सुना है इनके बहुत बुरे दिन आने वाले हैं
टैक्स चोर छाती फुलाते थे, अब मुँह चुराने वाले हैं
देश का धन बढ़ेगा, टैक्स की दरें घटेंगी
अंधे की रेवड़ियाँ बराबर से बंटेंगी
अब काला धन चुनाव ना लड़ पायेगा
देखना भले लोगों का शासन आयेगा
हमारी भी इज़्ज़त बढ़ेगी मुद्रा बाज़ार में
तब आयेगा मज़ा आपसे व्यापार में
कुछ वक़्त लगेगा मगर दिन जरूर फिरेंगे
अब आपके मुकाबले हम और नहीं गिरेंगे
दादा डॉलर मुस्कुराये, बोले रुकावट के लिए खेद है
छोटे तुम्हारे सपनों की व्यवस्था में कुछ छेद हैं
उनका क्या बिगड़ेगा जो विदेशों में दलाली पाते हैं
जिन मानसिक गरीबों के स्विस बैंक में खाते हैं
चलन से बाहर की मुद्रा माना कु-जात होगी
बैंक में धन आएगा तो अच्छी बात होगी
मगर जायेगा कहाँ ये कौन बतायेगा?
गरीबों का धन माल्या ही तो खायेगा
पिछले दरवाज़े से ठेके हो रहे हैं
गरीब के आवास में अमीर सो रहे हैं
देश के संसाधन कौड़ियों में बिकते हैं
लोग उसूलों पर नहीं, कोहनियों पर टिकते हैं
व्यवस्था अगर उन्हीं के हाथ में रहेगी
जिनके घर से काले धन की गंगा बहेगी
तो राजनीति सेवा नहीं, व्यापार होगी
और व्यवस्था जस की तस, लाचार होगी
तुम्हारे देश में जुगाड़ों की परम्परा है
सेटिंग का हुनर, कूट कूट के भरा है
आम आदमी लचर व्यवस्था का शिकार है
सच तो ये है, वही खुद जिम्मेदार है
पता नहीं तुम किन संस्कारों की बात करते हो
कानून का सम्मान नहीं, क़ानून से डरते हो
साहस के बगैर ईमान, बहुत दूर नहीं चलता
जब तक खुद ना बदलो, समाज नहीं बदलता
राष्ट्रवाद कर्म में रखो, सिर्फ मुँह से मत चीखो
जाओ पहले अपने हिस्से के बलिदान को सीखो
नोट के साथ साथ मानसिकता भी बदल लो
वरना कॉलर नीचे करो, पतली गली से निकल लो
© - प्रशांत सेठ