Sunday, September 6, 2015

एक भाव ह्रदय का

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें

परिभाषा किसी भी रिश्ते को बाँध देती है, शर्तों में। प्रत्येक सम्बन्ध किसी ना किसी अपेक्षा के इर्द गिर्द ही घूम रहा है। परिभाषित रिश्तों में एक दूरी भी होती है। लेकिन एक रिश्ता है जहाँ कोई परदा नहीं होता। जो अनंत है और शाश्वत है।

अपेक्षा रहित सच्ची मित्रता ईश्वर का ही तो दर्शन है। मित्र में ईश्वर और ईश्वर में मित्र को महसूस करती हुई और इच्छाओं और अपेक्षाओं के कारावास से निकालकर, उसको ह्रदय के गोकुल में ले जाने का प्रयास करती हुई एक रचना ....

एक प्रश्न का लेकर के बोझ
मेरा मन भटकता है रोज
शायद आज पूर्ण हो जाये
उस शाश्वत रिश्ते की खोज

ना निर्मित का निर्माता से
ना पुत्र का जैसे माता से
इन रिश्तों में एक दूरी है
दूरियां कैसी विधाता से?

हर रिश्ते में है शर्त कड़ी
मर्यादा की दीवार बड़ी
और मुझे स्वीकार नहीं है
ये बंधनयुक्त जकड़ा जकड़ी

फिर.....

क्या भक्ति ही एक संबंध है?
या वो भी सिर्फ अनुबंध है?
तुम्हारे गुणों के गान में
मुक्ति का ये कैसा प्रबंध है?

भय है, ज्ञान है, जिज्ञासा है
या फिर कोई अभिलाषा है
इस युग में तुम्हारी भक्ति की
सबकी अपनी परिभाषा है

कुछ रस्मों का संधारण है
या फिर दुखों का निवारण है
मैंने अपनी भक्ति में देखा
स्वार्थ ही एकमात्र कारण है

तुम्हारी हर इच्छा अव्यक्त है
और मेरा सब कुछ व्यक्त है
इसी अपूर्ण रिश्ते का नाम
क्या भगवान है और भक्त है?

नहीं....

भक्ति का एक और रूप है
ना परिभाषित ना कुरूप है
सुन्दर सा एक रिश्ता है जो
निश्छल प्रेम का स्वरुप है

इस रिश्ते में शर्त नहीं है
स्वार्थ की कहीं पर्त नहीं है
यही इसकी सुंदरता है कि
छुपा हुआ कोई अर्थ नहीं है

जैसे....

ब्रजबाला का नन्दलाल से
या गऊओं का गोपाल से
मुरली का जैसे तुम्हारी
श्वांसों के सुर और ताल से

तो फिर....

सम्बन्ध हो मित्र सुदामा सा
या फिर ऊधव श्रीदामा सा
अव्यक्त होकर भी व्यक्त हो तुम
जिधर प्रेम हो सखी राधा सा

© - प्रशांत सेठ

Saturday, August 15, 2015

एक बेताल की व्यथा

कल रात सारा देश जब एक दूसरे को शुभकामनायें देने में व्यस्त था, मैं अपनी तलाश पर निकल चुका था। अंत में मेरी तलाश तो पूरी हो गई मगर मैं भाषण और जलसों से चूक गया। इस बार स्वतंत्रता दिवस पर शुभकामनाएं नहीं दूंगा; बल्कि एक कथा सुनाऊंगा, विक्रम बेताल की...

आखिर फुटपाथ पर सोता हुआ मिल गया
उसकी दुर्दशा देखी तो मैं हिल गया
पास जाकर देखा सांस चल रही थी
फिर भी आँखों में एक उम्मीद पल रही थी

मैंने कहा बाबा उठो, रात भर ढूँढ़ ढूँढ़ कर परेशान हो चुका हूँ
तुम निष्ठा की तरह गायब हो, मैं हिंदुस्तान हो चुका हूँ
क्या आज के दिन भी तुम्हें इस तरह से सोना चाहिये?
वहाँ लाल किले पर भाषण होना है, जल्दी आइये

वो बोला, शायद फिर से पंद्रह अगस्त आ रहा है
इसलिये इतनी व्यग्रता से मुझे ढूँढ़ा जा रहा है
चलो चलता हूँ, आज के भाषण में तो मुझे होना होगा
कल भले ही मेरी किस्मत में फुटपाथ का कोना होगा

लेकिन एक शर्त है, मैं तेरी पीठ पर चढूँगा
अपने पैरों से एक कदम भी नहीं चलूँगा
बेताल की तरह मुझे कांधों पर ढोना तेरी मजबूरी है
मैं राष्ट्रवाद हूँ, इसलिए तुझे विक्रमादित्य होना ज़रूरी है

रास्ते भर मैं अपनी कथा सुनाऊंगा
अड़सठ बरस की व्यथा बताऊंगा
और अपने कुछ प्रश्नों का जवाब मांगूंगा
आज़ादी के बाद का पूरा हिसाब मांगूंगा

सिर्फ भाषण और जुलूस में नहीं सम्मान चाहिए
मुझे हर हालत में समस्या का समाधान बताइये
सच तू बोल नहीं सकेगा, झूठ मैं सुन नहीं पाऊंगा
और उत्तर ना दिया तो किसी पेड़ से लटक जाऊंगा

अब सुन, आज़ादी के पहले मेरी बड़ी शान थी
आज फुटपाथ पर हूँ, तब ज़िन्दगी आलिशान थी
मुझसे अंग्रेजी हुकूमत भी थरथराती थी
बच्चे बच्चे में मेरी छवि नज़र आती थीं

मैं था तब सत्याग्रहियों की टोली में
स्वाभिमान की खद्दर वाली झोली में
मैं था विलायती कपड़ों की होली में
मैं था आज़ाद की अंतिम गोली में

गर्मी में, बरसात में या सर्दी में
मैं रहता था सुभाष की वर्दी में
मैं था उन जेलों में अंडमान की
भविष्य जहाँ लेता था आहुति वर्तमान की

वो बूढा जब आधी धोती में अड़ा रहता था
तब हिंदुस्तान सर उठाकर खड़ा रहता था
गूंजते थे धरती गगन स्वाधीनता के नारों से
मैं मरा नहीं कभी गोरों के अत्याचारों से

आज मैं मर रहा हूँ दस लाख के सूट में
कोयले की खदानों में, व्यापम की लूट में
मेरा जीवन संसद की तरह ठप्प है
मेरा अस्तित्व छप्पन इंच छाती जैसी गप्प है

मैं पूछता हूँ उनसे भी जो विपक्ष में बैठे हैं
किस बात का गुरूर है, किस बात पे ऐंठे हैं?
ये संसद जागीर नहीं है तुम्हारे बाप की
ये देश क्यों ढोता है गठरी किसी के पाप की?

अंत में, मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम वर्तमान हो
और उनसे भी जो भविष्य का हिंदुस्तान हो
तुम भी तो रिश्वत और घूसखोरी के आदि हो
तुम राष्ट्र की शक्ति नहीं, महज़ सवा सौ करोड़ की आबादी हो

बिस्मिल और अशफ़ाक़ुल्लाह के देश में
तुम उलझे हो मंदिर मस्जिद के क्लेश में
स्वार्थ कबसे मज़हब का मर्म हो गया?
बोलो, राष्ट्र से ऊँचा कबसे धर्म हो गया?

मैंने कहा हे राष्ट्रवाद, माना के आपके प्रश्न सटीक हैं
लेकिन आप फुटपाथ पर ही भले हैं, ठीक हैं
इसके आगे मेरा स्वर गले में अटक चुका था
और राष्ट्रवाद? वो तो कबका पेड़ पर लटक चुका था

© - प्रशांत सेठ

Monday, July 27, 2015

सुखन

हमारे एक मित्र (बड़े भाई) होते हैं ______ उर्फ़ उस्ताद। बहुत ही खतरनाक आदमी हैं। खतरनाक इसलिये क्योंकि दिल से पाक-साफ़ हैं। अब आप सोच रहे होंगे की पाक-साफ़ आदमी खतरनाक कैसे हो सकता है? अरे भाई जब नवाज़ शरीफ, शरीफ हो सकता है तो हमारे उस्ताद भी खतरनाक हो सकते हैं। आगे का वाकया पढ़के खुद ही समझ लीजिये।

तो हुआ यूँ की कल उनसे एक शेर हो गया। हो गया तक तो ठीक, मगर वो शेर फेसबुक की अदालत में पेश हो गया। दुर्भाग्य से वो गरीब शेर, लाइक और कमेंट्स के फेसबुकिया अनुदान से वंचित रह गया। हमारे उस्ताद ने मान लिया की शेर ठीक नहीं हुआ इसलिये उसे सज़ा-ए-मौत सुना दी। अब शेर है मियां, कोई याकूब मेमन तो है नहीं की फांसी दे दो। हमने अपील दायर की; हुज़ूर शेरों की औकात को फेसबुक के लाइक्स और कमेंट से नहीं तौला जाता। उन्होंने प्रश्न किया, फिर कैसे तौला जाता है?

इस प्रश्न के उत्तर में एक ख्याल, व्याकरण से बहुत दूर मगर अन्तःकरण के पास, आपकी अदालत में पेश है...

बहर रदीफ़ काफिये से ही, मत समझो शेर हुआ
भीग जाये मन तुम्हारा, तब समझो शेर हुआ

गोर-ए-दिल में दफ़्न कई, अफ़साने तो हैं लेकिन
ज़ख्म कोई जब बह निकले, तब समझो शेर हुआ
(गोर = कब्र)

कहने को बज़्म में उनकी, हर कोई ही शायर है
लफ़्ज़ों में जब दर्द उतरे, तब समझो शेर हुआ

बात पुरानी हो जाती है, इस पल की उस पल में
वक़्त दोहराये लफ़्ज़ों को, तब समझो शेर हुआ

अशआरों के तीर नहीं, पल भर को तड़पाते है
इसी दम गर जाँ निकले जब, तब समझो शेर हुआ
अशआर = शेर

आह वाह की बैसाखी पे, दूर कितना जायेगी
बात फलक तक जा पहुंचे जब, तब समझो शेर हुआ

जज़्ब हैं एहसास कई 'सेठ' की इस खामोशी में
ज़ुबाने-कलम जब आ निकलें, तब समझो शेर हुआ

© - प्रशांत सेठ

Saturday, July 11, 2015

गुरु भजन

जन्म जन्मों से भटकते हुये मानव मन को त्रिविध तापों से मुक्ति दिलाने वाले और शीतलता प्रदान करने वाले गुरु चरणों में समर्पित ...

गुरुवर मेरे व्याकुल मन को, शीतलता अब पाने दो
पावन चरणों से तुम्हारे, आज मिलन हो जाने दो

ज्ञान ज्योति पाकर भी मैं, समझ सका ना उसका सार
व्याप्त था जीवन में मेरे, गहन अज्ञान और अंधकार
भक्ति के विस्मृत मेघों को, मन पटल पर अब छाने दो
गुरुवर ...

कामनाओं का गगन असीम, मैं उड़ता था पंख पसार
खूब किया मैंने अपनी, इच्छाओं के नभ का विस्तार
स्वप्न के पीछे उड़ता पंछी, साँझ ढले घर आने दो
गुरुवर ...

अश्रु भरे इन नयनों से ,बरस रहा है प्रेम अपार
भाव ह्रदय को पिघला कर, मथ रहा है बारम्बार
आज अविरल इन आँखों से, भावों को बह जाने दो
गुरूवर मेरे व्याकुल मन को शीतलता अब पाने दो

चरण अनुरागी
प्रशांत सेठ

Friday, July 10, 2015

आजकल कम लिखता हूँ

आज कुछ यूँ ही... बेमक़सद सा

आँख से आंसू चुराकर "नम" लिखता हूँ
आग दिल में खुद लगाकर "बम" लिखता हूँ

जाहिल हूँ यकीनन मैं सुखन के फन में
मैं मैं मैं की दुनिया में "हम" लिखता हूँ

रफ्तारों के इस दौर में, अजब शख्स हूँ
ना जाने क्या सोचकर "थम" लिखता हूँ

ज़माना ढूंढता है दौलत में खुशियाँ
अपनी ये फितरत इसको "गम" लिखता हूँ

रिश्ते प्यार वफ़ा ईमां और इंसानियत
अब पुराने एहसासों को कम लिखता हूँ

और एक शेर व्यापम घोटाले से व्यथित होकर...

बात अच्छे दिनों की जब जब होती है
एक लफ्ज़ में तब फिर मैं "व्यापम" लिखता हूँ

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, July 1, 2015

माँ मुझे आसमान छूना है

बहुत दिन पहले देखा था इस प्यारी सी तस्वीर को। इसमें एक कविता छुपी सी दिखी तो तुरंत ज़हन में save कर लिया था। आज फिर आँखों के सामने ये तस्वीर आई तो मुस्कुराये बिना नहीं रह सका।

बचपन से लेकर अब तक की जीवन यात्रा आँखों में तैर गई। उम्र के विभिन्न पड़ावों पर उपजते मनोभावों को व्यक्त करने की कोशिश में एक हलकी फुलकी रचना, अलग अंदाज़ में और बहुत ही सरल शब्दों में...

माँ मुझे आसमान छूना है

मुझे बढ़ना रात चौगुना
और बढ़ना दिन दूना है
शैशव मेरा रोया था
माँ, मुझे आसमान छूना है

मन भाग रहा मोटर सा
तन मगर अभी लूना है
बचपन मेरा कहता था
माँ, मुझे आसमान छूना है

कंधे तक अब आ गया हूँ
मगर ये तो सिर्फ नमूना है
लड़कपन मेरा ज़िद पर था
मुझे तो आसमान छूना है

कद तुमसे ऊंचा हुआ पर
बिना तुम्हारे सब सूना है
जवानी तड़प कर बोली थी
माँ की गोद में फिर सोना है

बचपन गाँव सा भोला था
अब जीवन मुम्बई-पूना है
उम्र थक कर कहने लगी है
मुझको फिर बालक होना है

...अब नहीं आसमान छूना है

© - प्रशांत सेठ

Friday, June 26, 2015

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना

"वो दुआएं काश मैने दीवारों से मांगी होती
ऐ खुदा सुना है कि उनके तो कान होते हैं..."

किसी शायर की ये पंक्तियाँ आज एक मित्र ने मुझे सुनायीं तो मन में एक बेचैनी उत्पन्न हुई। बहरा होने का जिसपर आरोप लग रहा है, वो सचमुच बहरा है या फिर उसकी भाषा ही अलग है। या फिर हमारा ये कहना सुनना ही एकतरफा है।

मन हुआ कि चलो आज उसकी भी सुन लें। हमें तो उम्र भर बोलते ही रहना है। ज़रा सा मौन बहुत कुछ कह गया। नतीजा आपके सामने है।

‘बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।
कर बिनु करम करइ बिधि नाना।।’

तुमको बेहतर लगती हैं ये दीवारें, जिसमें तुम्हारे भय विद्यमान हैं
या फिर वो मूरत, जिसके बड़े बड़े कान हैं
क्योंकि दीवारों में एक आशा होती है, जिसकी कैद में तुम रहते हो
और मूरत देती है आभास सुनने का, हर वो बात जो तुम कहते हो

तुम्हें पसंद हैं दीवारें, क्योंकि तुम्हारे जीवन में सामान बहुत है
वरना जीने के लिये तो खुला आसमान बहुत है
तुम्हें पसंद हैं दीवारें, क्योंकि ये सुरक्षा देती हैं तुम्हारे व्यर्थ को
मगर ये विलग भी कर देती हैं, जीवन से अर्थ को

दीवारों के पीछे भी एक संसार होता है
लेकिन दृष्टि से परे कुछ भी, तुम्हें कहाँ स्वीकार होता है?
और दृष्टि केवल तुम्हारी अपनी समझ का विस्तार है
जिसकी सीमा उतनी ही है, जितना तुम्हारा अहंकार है

तुम ढूंढते हो मुझे कुछ सुनाने के लिये
और मैं खड़ा हूँ कबसे तुम्हें पाने के लिये
तुम्हारा हर क्रंदन, हर स्पंदन, मैं सुन रहा हूँ
क्या अर्थ है, क्या व्यर्थ है, सब गुन रहा हूँ

मैं तुम्हारा वो शब्द भी सुन रहा हूँ जो अनकहा है
देख रहा हूँ वो आंसू जो अभी तक नहीं बहा है
चख रहा हूँ वो स्वाद जो पाना बाकी है
सूंघ रहा हूँ वो खुशबू जो आना बाकी है

मैं पत्थर नहीं हूँ, तुम्हारे मन का गढ़ा हुआ
बस देख रह हूँ दौड़ तुम्हारी, खड़ा हुआ
प्रतीक्षारत हूँ, उस एक पल के विश्राम का
विराम जब होगा तुम्हारे मन के संग्राम का

मेरी शीतलता लुप्त है, तुम्हारी भौतिकता के ताप में
और खो गई है वाणी, कामनाओं के अंतहीन प्रलाप में
ढूंढो, मैं तुम्हारे भीतर ही कहीं खो गया हूँ
मूरत नहीं हूँ, हाँ तुम्हारी दृष्टि में हो गया हूँ

मैं वहीँ रहता हूँ जहाँ स्वर उत्पन्न होते हैं
और वहां भी जहाँ निर्मित सारे स्वप्न होते हैं
जो बीज है उसे फल नहीं दिखता
मैं तो आज हूँ, मुझे कल नहीं दिखता

मैं यहीं, तुम्हारे बहुत पास हूँ
तुम देह हो तो मैं श्वांस हूँ
तुम लोभ हो तो मैं ही डर हूँ
तुम रोग हो तो मैं ही ज्वर हूँ

तुम लक्ष्य हो तो प्रयास हूँ मैं
तुम प्रार्थना हो तो विश्वास हूँ मैं
तुम्हारे अंदर ही सत्य का सोया हुआ स्वर हूँ
ढूंढते हो जिसे, मैं वही खोया हुआ ईश्वर हूँ

© - प्रशांत सेठ