Monday, August 4, 2014

दोस्ती एक खूबसूरत एहसास होती है !!!

मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

सच्ची दोस्ती वक़्त की, लम्हों की मोहताज नहीं होती। दिन और रात नहीं देखती, सिर्फ दोस्त की ज़रूरत को देखती है।

मुस्कराहट भरे अनगिनत पलों के बीच में तकरार के कुछ लम्हे ना हों, तो उस दोस्ती को अधूरा समझना चाहिये। ऐसी दोस्ती जो किसी इम्तिहान से ना गुजरी हो, उसकी कसमें नहीं खायी जातीं। दुनिया के किसी भी रिश्ते को आजमाकर देख लीजिये, जिंदगी की ढलानों में अगर कोई साथ होता है तो सिर्फ दोस्ती....

किसी दुआ की तरह ही इखलास होती है
जब कुछ नहीं होता तब यही पास होती है
खून के, मतलब के, हर रिश्ते से ऊपर दोस्ती
उघड़े हालात में आखरी लिबास होती है

© - प्रशांत सेठ

इखलास=पवित्र

Friday, August 1, 2014

एक थे विषधर भाई

नागपंचमी स्पेशल पंच...

मियां सांप को दूध नहीं पिलाओगे?? बाहर से आवाज़ आई
दरवाज़ा खोलकर देखा तो खड़े थे विषधर भाई
डर की वजह से अपनी घिग्गी बंध आयी
हमने हौले से पूछा आज हमारी याद कैसे आयी??
कोई ना कोई बात इसमें होगी ज़रूर
वरना आप कहाँ आते हैं, आप तो बुलवाते हैं हुज़ूर

वो अन्दर आये बैठे, फुफकारते हुये फन पटका
हमने किसी अनहोनी की आशंका से थूक गटका
बोले विद्वान् होकर भी तुम कमाल करते हो
अजीब अजीब से बेतुके सवाल करते हो
भई आज नागपंचमी है, हम आज ही निकलते हैं
वरना साल भर तो तुम्हारी आस्तीन में पलते हैं

तुम बड़े जल्दी भूल जाते हो
इसलिए बार बार डसे जाते हो
वैसे तो हम तुम्हारा खून पीकर काम चलाते हैं
आज व्रत की मजबूरी है हम शाकाहार अपनाते हैं
खैर छोडो ये सब फिजूल की बातें हैं
तुम दूध पिलाओ फिर हम जाते हैं

हमारा गला भर आया आवाज़ थरथरा गयी
गुस्से के साथ साथ थोड़ी हिम्मत आ गयी
हमने कहा हुज़ूर आप तो अन्नदाता हैं
और हम मामूली से मतदाता हैं
पांच साल में एक बार वोट देते हैं
और आप हैं के साल में पांच बार चोट देते हैं

आपने पाल रखी है वो डायन महंगाई
जो चट कर गयी है हमारे घर की दूध मलाई
हमारे बच्चे भी अब पानी पीकर काम चलाते हैं
इसलिये आजकल हम साँपों को दूध नहीं पिलाते हैं
हमने सोच लिया है अब नहीं चलने देंगे किसीकी दबंगाई
अब की मनाएंगे आज़ादी जैसी पहले कभी नहीं मनायी

हमने विश्वास को पाला, श्रद्धा को गले में लटकाया है
मगर तुम सांप हो ये बहुत देर से समझ में आया है
तुम ही हो जिसने नफरत का ज़हर फैलाया है
तुम ही तो हो जिसने मुल्क को बंटवाया है
आज आँख में आँख डालकर बोलने का वक़्त आया है
जिसका फन कुचलना था उसको हमने सर पर बिठाया है

दोस्तो ये थे हमारे नेता विषधर भाई
चुनावों के मौसम में जिनको हमारी याद आयी
अपने शाकाहार की दे रहे थे दुहाई
और वोट को समझ रहे थे दूध मलाई
अब तक होता था सत्कार आज दुत्कार है पायी
क्योंकि हमको भी पैंसठ बरस के बाद अकल आयी

© - प्रशांत सेठ

Sunday, July 27, 2014

भूख

बहुत दिनों से इन्टरनेट पर वायरल हो चुकी, इस तस्वीर को देख रहा हूँ।

अब ये मासूम फिर कभी भोजन नहीं मांगेगा। इसने इतनी शिद्दत से भोजन की चाह की होगी के कुदरत ने इसे खुद ही भोजन बना दिया....गिद्ध का।

इंसानियत भले ही अपने फ़र्ज़ से चूक जाये मगर कुदरत अपना काम कर रही है। ये तस्वीर उस आधी दुनिया के स्वार्थ की कहानी कह रही है जो समृद्ध तो है मगर उस समृद्धि की कीमत चुका रही है, बाकी की आधी दुनिया। ऐसे में एक सवाल ज़ेहन में उठता है .... क्या जो समृद्ध हैं, वही गिद्ध हैं?

हम और आप उसी समृद्ध दुनिया का हिस्सा हैं इसलिए देखिये भूख से दम तोड़ती एक जिंदगी को गिद्ध की नज़र से, और महसूस कीजिये इन पंक्तियों में छुपे दर्द को...

रस्म-ए-क़ज़ा का ये खौफ़नाक सा मंज़र देख लो
एहसास से खाली दिल-ए-आदम बंजर देख लो
ये जो मरता है यहाँ फकत बच्चा नहीं है मासूम
इंसानियत के जिस्म में खुदगर्जी का खंजर देख लो

© - प्रशांत सेठ

कज़ा=मौत
दिल-ए-आदम=आदमी का दिल
खुदगर्जी=स्वार्थ

Thursday, July 24, 2014

कच्चे मकान पक्के लोग

किसी शायर ने क्या खूब लिखा है...

"बादलों के दरमियाँ कुछ ऐसी साज़िश हुई
मेरा घर मिट्टी का था, मेरे ही घर बारिश हुई"

दुनिया का दस्तूर है, गमगीनों को और सताने का। मगर फलक भी इसी राह पर चलता है, ये ताज्जुब की बात है। दरअसल कच्चे मकानों में लोगों के रिश्ते और हौसले दोनों पक्के होते हैं। खुद्दारी से जीने की जुर्रत करते हैं। शायद इसलिये....

पक्के मकानों पर यूँ गिरना फ़िज़ूल है
बिजलियों का अलग अपना ही उसूल है
हौसले बड़े होते हैं मिट्टी के घरों में, और
ये ज़ुर्रतों पर कुदरती इक महसूल है

© - प्रशांत सेठ

महसूल=कर (टैक्स)

और पक्के मकानों में कच्चे रिश्तों के लिये कुछ यूँ ...

गुरूर की कुरसी का सिर्फ पाया बड़ा है
रिश्ते और एहसास नहीं, सरमाया बड़ा है
अना अपनी औकात से ऊंची हुई है यूँ
यहाँ कद से ज्यादा सबका साया बड़ा है

© - प्रशांत सेठ

सरमाया=पूँजी, दौलत
अना=अहं

Tuesday, July 22, 2014

एक सफ़र जिंदगी

है जब तलक यहाँ बसर जिंदगी
तू मेरी मैं तेरा हमसफ़र जिंदगी

चिराग हो ज्यूँ आँधियों से मुखातिब
जलेगी कब तक क्या खबर जिंदगी

एक सांस ली एक छोड़ दी जैसे
कभी बाहर कभी अन्दर जिंदगी

पत्थरों पर बहते दरिया सी आज
है कल का ये कोई समंदर जिंदगी

वीराने में खिले किसी गुल के मानिंद
तन्हाईयों का जैसे एक घर जिंदगी

समाती नहीं इसमें ख्वाहिशें सारी
हक़ीक़तों की छोटी चादर जिंदगी

धूप, छाँव, कभी बारिश का मौसम
है बहुत खूबसूरत मगर जिंदगी

© - प्रशांत सेठ

Thursday, July 3, 2014

बरसो रे मेघा

उम्मीद का सहरा बाँध कर जब कोई किसान हल जोतता है, बीज बोता है, तब वह एक पल के लिये भी यह नहीं सोचता की बादल बेवफा हो जायेंगे। एक अटूट विश्वास लिये जब उसका पसीना खेत में गिरता है और धोंकनी की तरह चल रही उसकी साँसों में शहनाई का स्वर उभरता है, तब माँ के रूप में धरती खुश होकर लहलहाती फसल सी दुल्हन पाने का आशीर्वाद देती है। मगर क्या कीजिये, मंडप के नीचे तो पिता के रूप में बादल का आशीर्वाद भी ज़रूरी है ना। ऐसे में पिता ही नदारद हो जाये तो क्या कीजिये?

इस बरस ये बादल फिर आवारगी पर उतारू हैं। ना जाने कितने धरतीपुत्रों के प्राणों पर बन आयेगी। महंगाई गरीबी के सर पर नाचेगी और क़र्ज़ में डूबी हुई जिंदगियां, इंसानियत के गिरे हुये स्तर को नापेंगी
इश्वर से यही प्रार्थना कीजिये के बारिश बरसे और झूम के बरसे ...

आँखों से बरसे पानी, बरसे ना अब्र से
दर्द जीत ना जाये कहीं उसके सब्र से
सूखी रहे फसल, न बेवफा हों बारिशें
सींचे न कोई दहकाँ, मर कर फिर कब्र से

© - प्रशांत सेठ

अब्र=बादल, दहकाँ=किसान

Sunday, June 29, 2014

आ माँ घर चलें

आज माँ (बहुत प्रिय मित्र की माँ, अपनी माँ) बीमार है। बहुत बीमार, जीवन मृत्यु के बीच। ऐसे में एक प्रार्थना ने जन्म लिया और ये सभी बुजुर्गों के लिये इश्वर से विनती बन गयी।

मुझे पूरा विश्वास है ये पुकार पहुंचेगी उस परम सत्ता तक और माँ घर वापस आएगी... आप लोग भी दुआ कीजिये।

धूप का सफ़र मेरा, बुजुर्गों की छाँव रखना
आँगन के दरख्तों को, मेरे साहिब बचाये रखना

लहरों से मुकाबिल हूँ, तजुर्बों की नाव रखना
दस्त-ए-दुआ उनकी, मालिक तू बनाये रखना

पत्थरों के शहर में कोई, मिट्टी का गाँव रखना
एहसास के घरोंदों को, मेरे दिल में बसाये रखना

ख्वाबों के पंख हों बेशक, हवाओं पर पांव रखना
रिश्ता शज़र से मौला, परिंदों का बनाये रखना

इतनी मेहरबानी, मुझपर हवाओ रखना
शमा-ए-जीस्त उनकी, हरदम जलाये रखना

जिंदगी लगे, लग जाये, कैसा भी दांव रखना
माँ बाप का साया, सर पर बनाये रखना

© - प्रशांत सेठ

दस्त-ए-दुआ=दुआ का हाथ, शज़र=पेड़, शमा-ए-जीस्त=जीवन ज्योति