Tuesday, October 27, 2020

दृष्टा

मैंने पढ़ा था कभी,
प्रकाश की किरण 
करती है गमन सीधी रेखा में  
और बदल लेती है कोण
एक माध्यम से दूसरे माध्यम तक जाते जाते,
घनत्व में भेद के प्रभाव से

बहुत तो नहीं, 
किंतु समझ ली थी बचपन में ही
यह छोटी सी बात
कि
किसी वस्तु को जानने के लिए
देखना पड़ता है, 
उसे भिन्न कोणों से
समग्र दृष्टि से

आज भी
विषय वस्तु पर पड़ने वाले
अलग अलग दृष्टिकोण को
देख लेता हूँ मैं,
चैनल बदल बदल कर

मुझे पता है
मसले क्यों बदल लेते हैं कोण 
सोशल मीडिया पर
एक प्रोफाइल से दूसरी प्रोफाइल तक

मैं जानता हूँ
तुम्हारे ज्ञान का आधार है
तुम्हारी बुद्धि में "ग्रे मैटर" का घनत्व
जितना अधिक घनत्व
उतना ट्विस्टेड सत्य

तभी तो बहुत से बुद्धि-जीभी
ज़िंदगी जी नहीं पाते
चल देते हैं उम्र गुज़ारकर
अनुभव के नाम पर, 
दृष्टिकोण में उलझकर
और अक्सर, 
पीढ़ियों को उलझाकर
किसी नए "वाद" में

© - प्रशांत सेठ







Tuesday, October 6, 2020

सॉरी बापू

जमूरे!!
बुरा मत देखो
बुरा मत सुनो
बुरा मत बोलो

और मैंने मूंद ली आंखें
बंद कर लिए कान
सी लिया अपने होठों को
मेरे आस पास चुपचाप
वो पैर पसारती रही ...

जमूरे!!
जब तक मैं ना कहूँ
आँख मत खोलना
बाहर बहुत बुराई है
अपने भीतर उतर जा,
समाधि लगा ले, संत बन जायेगा

मगर एक दिन
आँख खुलनी थी, सो खुल गई
मैंने पूछा उससे
तू यहाँ कैसे, मेरे बापू के हिंदुस्तान में?
हंसकर बोली, अपने बापू ने कब कहा?
"बुरा मत करो"

अब मैं, बुरा देख लेता हूँ
बुरा सुन भी लेता हूँ
सच पूछो तो, बुरा सूंघ भी लेता हूँ
और बुरा बोलने लगा हूँ उसे
मेरे आसपास फटकने से पहले
दस बार सोचती होगी वो, क्योंकि
मैं बुरा लगने लगा हूँ अब
खुद बुराई को ही

क्षमा करना बापू
मैंने सीख लिया है,
चरखे के साथ साथ, लाठी चलाना
और हाँ!
चलाने लगा हूँ थोड़ा थोड़ा
स्कूल की किताबों से परे
अपना दिमाग भी

सॉरी बापू
तुम्हारा जमूरा शायद
सचमुच भीतर उतरने लगा है

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, August 18, 2020

बृजबाला

सब कुछ नहीं होता शब्दों से
परिभाषित
शुद्ध प्रेम में नहीं होता संसार
अभिलाषित

संसार की व्यवहारिकता से परे
गोपियों के निश्छल प्रेम की तरह
भाव समक्ष मूक हो जाती हैं
समस्त भाषाएं

© - प्रशांत सेठ


Monday, August 17, 2020

शबरी

सब कुछ देखा नहीं जा सकता
इन आँखों से
सब कुछ सुना नहीं जा सकता
इन कानों से

बुद्धि की असहजता से बहुत दूर
शबरी के जूठे बेरों की तरह
भक्त और भगवान का सहज प्रेम
विषय है केवल अनुभूति का

© - प्रशांत सेठ




Sunday, August 9, 2020

मैं बैरी सुग्रीव पियारा?

 कई शताब्दियों के वनवास के पश्चात और तमाम आसुरी प्रवृत्तियों को परास्त कर अंततः प्रभु श्रीराम अयोध्या लौट आए हैं। बाली का आहत हुआ अहंकार आज भी मन ही मन फिर वही प्रश्न कर रहा होगा। परंतु श्रीराम का उत्तर तो हर युग में वही होगा, क्योंकि सत्य तो कहा ही उसको जाता है, जो किसी भी देश काल परिस्थिति में अपरिवर्तनीय है।


मैं बैरी सुग्रीव प्यारा?

भेद ये मन का, खेल है सारा ।
जिसने सत्य को ना स्वीकारा ।
वरना निश्छल हृदय से मेरे,
बाली कभी नहीं था न्यारा ।

अपने भीतर मेरे अंश का,
तुमने तिरस्कार किया है ।
सब में भी अस्तित्व मेरा,
पर तुमने कब स्वीकार किया है ।

लघुता को अपने अंतस में,
जब भी अंगीकार किया है ।
अहंकार ने शत्रु रूप ही,
प्रभुता का स्वीकार किया है ।

मन की भ्रामक दृष्टि केवल,
निज स्वभाव का है विस्तार ।
त्याग सत्य को गढ़ा है तुमने,
कल्पनाओं का यह संसार ।

खुद से तुमने कब पूछा है,
क्यों दृष्टा का भाव नहीं है?
युग युग से क्यों निज दृष्टि में,
समग्रता का प्रभाव नहीं है?

चिंतन पर मकड़ी के जाले,
वहम रूप क्यों तुमने पाले ।
बोध वहां तक पहुंचे कैसे,
पड़े दृष्टि पर अहम के ताले ।

अनुभव रूप चित्त की वृत्ति,
ज्ञान रहित अनुभूति मन में ।
जन्म जन्म से संचित प्रारब्ध,
स्मृति शेष उस अवचेतन में ।

आत्म तत्व के रूप में मैं ही,
सदा सत्य का रहा हूँ प्रहरी ।
मन विकार का तभी तो बाली, 
युगों युगों से मैं हूँ बैरी ।

भाव समक्ष जब मन का बाली,
शस्त्र अहम के तज पाएगा ।
बोध स्वरूप तभी जीवन में,
सदा मित्र बन राम आएगा ।

तुम भी प्रिय ज्यों अनुज तुम्हारा,
तुमको मैं नहीं, "मैं" ने मारा ।
फिर ना कहना कभी भूल से,
मैं बैरी सुग्रीव पियारा ।

© - प्रशांत सेठ


Friday, July 31, 2020

काव्यमदूत - आह-कवि जालीदासों को समर्पित

"यमपुरी में नए यमदूतों की आवश्यकता
केवल कवियों को ही प्राथमिकता"

अखबार में ये विज्ञापन पढ़कर मैं चौंका
ये सत्य है या केवल आँखों का धोखा?
मैंने आंखों को मला, फिर से पढ़ा, यही सच था
आगे जो लिखा था वो और भी "टू मच" था

मृत्युलोक से यमलोक की 86000 योजन की दूरी है
और लंबी यात्रा में मनोरंजन भी जरूरी है
छोड़ो सारे किंतु, परंतु, अगर, मगर, पर
बेरोजगारी के दौर में नहीं मिलेगा ये अवसर
इसलिए आज ही ऑनलाइन अप्लाई कीजिये
योग्यता कोई नहीं, बस कवि होने का प्रमाण दीजिये

मैंने श्रीमती जी को आवाज़ लगाई
भाग्यवान, क्या मैं भी आएं बाएं अल्लम गल्लम बकता हूँ?
बताओ क्या मैं भी आधुनिक काल का कवि लगता हूँ?
उनकी सहमति पाकर मेरा कॉन्फिडेंस जागा
और मैं मनीष तिवारी जी के घर की ओर भागा
अपनी भड़ास का ये जो नित्य वमन करते हो
सुना है तुम भी ऑनलाइन कविता पढ़ते हो
एक से भले दो होते हैं, ये बात बुजुर्ग बताते हैं
चलो हम दोनों मिलकर ये दायित्व उठाते हैं

अगले ही दिन हम इंटरव्यू की लाइन में खड़े थे
देखा तो वहां बड़े बड़े दिग्गज पहले से पड़े थे

चित्रगुप्त बता रहे थे कि
कोरोना के कारण यमपुरी में फुल हैं समस्त सीटें
समझ में नहीं आ रहा अब पापियों का कहाँ पीटें
हम लोगों ने नरक की एजुकेशन पॉलिसी में चेंज किया है
और ये आईडिया हमने भारत के शिक्षा मंत्री से एक्सचेंज किया है
अब नरकगामियों की यात्रा को यंत्रणा बनाना है
इसलिए तुम कवियों को यमदूत की ड्यूटी निभाना है

हमने कहा हुजूर आप चिंता मत कीजिये
एक बार सेवा का यह अवसर तो दीजिये
यम-योग्य कवि लेखक तो हिंदुस्तान में सर्वत्र हैं
लेकिन हमारे पास कई संस्थाओं के सम्मान पत्र हैं
मंचों पर निकाली हमेशा भड़ास और खीज है
जिंदों को सताया है, ये मृतक क्या चीज है

हमारी कविताएं सुन सुनके आत्माएं घायल हैं
यहाँ सभी चित्रगुप्त के मैनेजमेंट के कायल हैं
एक्सपर्ट्स का कहना है, नए यमदूत बहुत होनहार हैं 
गुप्ताजी की हो रही जय जयकार है 
सारी यमपुरी में हमारी भूरी भूरी प्रशंसा है
हमारी नियुक्ति में यमराज की अनुशंसा है 

लोग कह रहे हैं
आपने साहित्यकारों को नहीं, सही-हत्याकारों को चुना है
बाकी सब तो थोथा चना बाजे घना हैं
इनके हत्थे जो भी चढ़ेगा, स्वर्ग का पात्र हो जाएगा
अपने पापों के लिए वो हज़ार बार पछतायेगा
इस जनम की छोड़िए, अगले जन्म की एडवांस सजा पायेगा
क्योंकि यहां तक आते आते वो कई बार मर जायेगा

© - प्रशांत सेठ


Sunday, June 21, 2020

मैं अज्ञानी अधजल गागर - गुरु प्रार्थना

मैं अज्ञानी अधजल गागर
गुरुवर तुम हो ज्ञान का सागर
धन्य जीवन है तुमको पाकर
श्री चरणों की शरण में आकर

ज्ञान दीप हृदय में जलाकर
दृष्टि दो अंधकार मिटाकर
तुम से आलोकित है ये जीवन
सूर्य से जैसे रहता सुधाकर

घट श्वासों का रीत रहा है
राह दुर्गम है थाम लो आकर
तृष्णा में संसार की डूबे
मेरे मन को उबारो प्रभाकर

ध्येय तुम हो और मार्ग भी तुम
तुम ही नैया हो तुम ही सागर
जो डूबा वो पार हुआ है
स्नेह सिंधु में डुबकी लगाकर

© - प्रशांत सेठ