Thursday, January 26, 2017

गणतंत्र कैसा?

गणतंत्र कैसा?

आज ह्रदय में उपज रहा ये
प्रश्न कैसा?
सिर्फ किताबों में है गणतंत्र
जश्न कैसा?

स्वतंत्रता का लक्ष्य नहीं
पूर्ण हुआ है
खंड खंड भारत कहाँ
सम्पूर्ण हुआ है
स्वाभिमान गिरवी रख, संघर्ष
खत्म कैसा?
सिर्फ किताबों में ...

देखो शत्रु की चुनौती
कितनी बड़ी है
और तरुणाई इस देश की
अकर्मण्य खड़ी है
है यौवन उत्सव में फिर भी       
मग्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...

तुम कहते हो राष्ट्र बढ़ रहा
प्रगति पथ पर
चंद लोग ही क्यों दिखते हैं
स्वर्ण रथ पर?
है किसान मज़दूर यहाँ तब
नग्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...

सत्ता लोलुप चढ़ाये हुये हैं
चेहरे पर चेहरे
पहचाने नहीं जायें रंग हैं
इतने गहरे
यथार्थ से मुँह चुराता इनका
यत्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ....

एकलव्य के हिस्से यहाँ
तिरस्कार लिखा है
पद्म विभूषण पे देखो तो
पवार लिखा है
सर शर्म से झुका दे वो
रत्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...

खून के बदले आज़ादी का
वो नारा था
हमें किसी गांधी सुभाष ने
क्यों तारा था
है अधूरा अभी संकल्प वो
भग्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...

काश हमारी ललकार से फिर
पहाड़ गूंजे
सिंहनियों की कोख से फिर
दहाड़ गूंजे
सिंह जनें ना माएँ तो शुभ
लग्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...

बदलनी है परिपाटी तो
उठना होगा
यदि बनना है तो पहले
मिटना होगा
जागो के अब नींद कैसी
स्वप्न कैसा?
सिर्फ किताबों में ...

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, January 11, 2017

संस्कार माला

बेटी ने अपने आने वाले जन्मदिन (16 जनवरी) पर उपहार स्वरूप एक कविता की माँग रख दी। तब अपने जीवन के अनुभव, संघर्ष और गुरुजनों की प्रेरणा से उत्पन्न चिंतन को, संस्कारों की माला में पिरोकर उसे ये रचना दे रहा हूँ। अभी उसकी समझ में आये ना आये; भविष्य में अनिर्णय की स्थिति उत्पन्न होने पर अवश्य काम आएगी। क्योंकि,
म्हारी छोरी की छोरों से होड़ नहीं होवे है
म्हारी छोरी तो खुदई बेजोड़ होवे है...!!!
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विभिन्न परिस्थितियों में, अलग अलग लोगों की मनस्थितियों भी अलग अलग होती हैं। लेकिन, महान वही कहलाये जिन्होंने संशय की स्तिथि में, स्व-अर्थ को त्याग कर परम-अर्थ को स्वीकार करने का निर्णय लिया।

संस्कार माला

जब
जीवन की ठोकर से उपजने लगे संगीत
ह्रदय की चोट बन जाए अहोभाव का गीत
मन धर्म रक्षार्थ मोह को तजने लगे
एक पाञ्चजन्य भीतर ही बजने लगे
तब समझ लेना
तुम अग्रसर निर्माण के पथ पर हो
हे अर्जुन, तुम केशव के रथ पर हो

जब
टूटने लगे "मैं" का भाव तुम्हारा
मिटने लगे भय का प्रभाव सारा
बाहर सजता भीषण कोई रण हो
और भीतर जागता एक समर्पण हो
तब समझ लेना
तुम्हारी सुप्त शक्ति जागरण को तत्पर है
हे हनुमंत, फिर लंका दहन का अवसर है

जब
संसार भर की दृष्टि हो जाये वक्र
और शत्रु रचते हों नित नये कुचक्र
महाबलियों से हो संग्राम तुम्हारा
मातृभूमि करे बलिदान का इशारा
तब समझ लेना
निज प्राणों का मोह छोड़ना होगा
हे अभिमन्यु, तुम्हें चक्रव्यूह तोड़ना होगा

जब
अशक्त रहो किन्तु हताश नहीं
निर्बल होकर भी परास्त नहीं
कर्तव्य से बढ़कर ना लगते हों प्राण
धर्म हेतु कर सको स्व का बलिदान
तब समझ लेना
ये मृत्यु नहीं, मुक्ति का वरण है
हे जटायु, तू राम की शरण है

जब
असत्य तुम्हें अपराधी कहता हो
ह्रदय घोर संताप सहता हो
धैर्य की परीक्षा लेता हो अभिशाप
और दंड बन जाये औरों का पाप
तब समझ लेना
फिर निष्प्राण शिला का उद्धार करेगा
हे अहिल्या, स्वयं ईश्वर तुझे अंगीकार करेगा

जब
भारहीन होने लगे मन
आसक्तियों के विनाश से
और विचरण करे मुक्त
मोह माया के पाश से
तब समझ लेना
अब भवसागर भी डुबा ना पायेगा
हे केवट, कोई राम उस पार ले जायेगा

जब
बीते जीवन पर करो तुम शोध कभी
स्व कर्म के पीछे हो अज्ञान का बोध तभी
ह्रदय में हो राम और मुँह से निकले मरा
निज अंतस में भाव किन्तु हो खरा
तब समझ लेना
निश्चित है फिर किसी रत्नाकर का अंत होना
हे वाल्मीक, असंभव नहीं डाकू का संत होना

जब
पथ निहारते हों नयन, आराध्य का
विरह बन जाये सुर, ह्रदय के वाद्य का
विष भी दे आनंद, ज्यों अमृत का पान
ना होश ही रहे ना देह का संज्ञान
तब समझ लेना
कोई कृष्ण कहीं आस पास है
हे मीरा, बस कुछ क्षण की और प्यास है

© - प्रशांत सेठ

Saturday, January 7, 2017

एक मूरत टूटी सी

पेड़ के नीचे रखी भगवान की टूटी मूर्ति को देख कर समझ आया कि..
परिस्थिति चाहे कैसी भी हो,
पर कभी ख़ुद को टूटने नही देना
वर्ना ये दुनिया जब टूटने पर भगवान को घर से निकाल सकती है तो फिर हमारी तो औकात ही क्या है।
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उपरोक्त पंक्तिया वॉट्सएप्प पर पढ़ने को मिलीं तो मन में कुछ भाव जागे। सोचा चलो किसी टूटी हुई मूरत से साक्षात्कार किया जाये...

एक मूरत टूटी सी...

हाँ, मैं खंडित सी मूरत में हूँ
हाँ, मैं तिरस्कार की सूरत में हूँ
हाँ, मैं तुम्हारे हर अपमान में हूँ
क्योंकि, मैं तुम्हारे निर्माण में हूँ

किन्तु,
तुमको भय लगता है
टूटने से
रिश्ते नाते और संसार
छूटने से
क्योंकि, ये संसार देता है आभास
तुम्हारे होने का
और तुम में नहीं है साहस
जो पास है, उसे खोने का

तुम्हारा जीवन
एक सुखद कल की तलाश भर है
और ये कल्पना भी
वर्तमान की लाश पर है
तुम्हारे असुरक्षित मन को छद्म
खोल चाहिए
तुमको संसार की दृष्टि में अपना
मोल चाहिए

इसलिये,
तुम पकड़ते हो झूठ के
सहारों को
इस संसार के मायावी
इशारों को
अनिर्मित को तुमने सदैव ही
नकारा है
तुम्हारी श्रद्धा ने केवल निर्मित को
स्वीकारा है

लेकिन,
मुझपर तो दायित्व है
तुम्हारे निर्माण का
तुम्हारा पथ करना है प्रशस्त
जन्म जीवन निर्वाण का
भ्रम का आवरण हटते ही
सत्य का ज्ञान है
तुम्हारी टूटन ही निर्माण का
प्रथम सोपान है

तुम्हारे लिए सरल है
टूटी मूरत को नकार देना
लेकिन जब कभी भी तुम टूटो
मुझे पुकार लेना
निर्माण योग्य हर मनुष्य
मेरी श्रद्धा का पात्र है
और तुम्हारा टूटना ही एक
विकल्प मात्र है

देखो,
किसी नवजात से पंछी में
सम्भावना के पर को
किसी अनगढ़े पत्थर में
छिपे अवसर को
हर टूटन के पीछे सुनो
निर्माण के स्वर को
इतना भी कठिन नहीं है
समझ पाना ईश्वर को

© - प्रशांत सेठ

Friday, December 16, 2016

निःशब्द

भाव असीम हैं, शब्द सीमित। ह्रदय के भावों को शब्द देने की कोशिश में अपने बौनेपन के अलावा कुछ हाथ नहीं आता। तुमने पूछा प्रेम क्या है? ये तो नहीं मालूम, किन्तु खुद को ज़रा सा भी बचा लेना समर्पण नहीं है, प्रेम नहीं है; इतना मालूम है। जिस प्रकार ज्ञानी होने का एहसास सबसे बड़ा अज्ञान है; उसी प्रकार प्रेमी होने का एहसास सबसे बड़ा अप्रेम है। प्रेम, समर्पण, भक्ति इनका अर्थ खोजने निकलो तो इस तलाश की कीमत अपने अस्तित्व से चुकानी पड़ती है।

निःशब्द

मुखरित भाव बिखर जाते हैं
मुझे निःशब्द ही रहने दो
सुन सको तो मौन सुन लो
नयनों को ही कहने दो

तुम कहती श्रृंगार लिखूँ
तुम रूठो मनुहार लिखूँ
तुम परे हो हर भाष्य से
कैसे शब्द आभार लिखूँ
ईश्वरीय कृति अनुपम
इसको मौलिक रहने दो
मुखरित...

माप सका ना प्रेम की
कोई कवि गहराई है
कोई गीत कोई ग़ज़ल
कहाँ तुम्हें कह पाई है
प्रेम परिभाषा गढ़ने की
चाह अभी तुम रहने दो
मुखरित...

ढूँढ रहे कृष्ण आज भी
राधा के ह्रदय का छोर
ताक रहा चाँद अब तक
सम्मोहित सा वो चकोर
इक अनजानी सी मंज़िल का
ये सफ़र है, रहने दो
मुखरित...

मुरली की धुन में सुनना
धुन प्रेम की राधा है
प्रेम समर्पित भक्ति के बिन
ईश्वर खुद भी आधा है
पूर्णता की चाह लेकर
प्रवाह तुम तक बहने दो
मुखरित...

समर्पण से जीत मुझको
तुम कहती हो हार लिखूँ
इसे अपनी जीत लिखूँ या
खुद पर मैं उपकार लिखूँ
अबूझ इस पहेली को तुम
अनुत्तरित ही रहने दो
मुखरित...

तुम कहोगी इसे कविता
मैं शब्द व्यापार लिखूँ
भाव समक्ष गौण शब्द है
मैं कैसे श्रृंगार लिखूँ
खुद को तुम में ढूँढता हूँ
मुझको गुम ही रहने दो
मुखरित...

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, December 7, 2016

डॉलर डॉन II

हम बाज़ार में घूम रहे थे, खड़ी किये कॉलर
अचानक सामने से आ गए दादा डॉलर
हम हिन्दुस्तानी रुपया हैं, इसलिये संस्कारी हैं
हमने कहा दादा प्रणाम, आज किधर की सवारी है?

बोले, छोटे आजकल तुम बहुत इतराते हो
हरे नीले थे, गुलाबी हुये जाते हो
ऐसी कौन सी तुम्हारी लॉटरी निकल पड़ी है?
के आज हमारे सामने तुम्हारी कॉलर खड़ी है?

कल तक तो अंडरग्राउंड तिजोरी में पड़े थे
अभी हमने देखा तुम बैंक की लाइन में खड़े थे?
ये क्या माया है, कुछ हमें भी समझाओ ना
फुरसत मिले तो एकाध दिन घर आओ ना

हमने कहा दादा चारों तरफ खलबली है
हमारी अर्थव्यवस्था कैशलेस हो चली है
हमें कैद करने वाले ज़ार ज़ार रो रहे हैं
हमारी तरक्की हुई है, हम डिजिटल हो रहे हैं

हमारे प्रमोशन से कई बीमारियों का इलाज होगा
सुविधा भोगियों को लूज़ मोशन, मतलब स्वस्थ समाज होगा
हमारे केशलेस होने से बरसों की परंपरा टूट गई है
रिश्वत, दूल्हे के फूफा की तरह रूठ गई है

आतंक, काला बाज़ारी, सट्टा और हवाला
इन सबके पोषक, भ्रष्टाचार का मुँह काला
सुना है इनके बहुत बुरे दिन आने वाले हैं
टैक्स चोर छाती फुलाते थे, अब मुँह चुराने वाले हैं

देश का धन बढ़ेगा, टैक्स की दरें घटेंगी
अंधे की रेवड़ियाँ बराबर से बंटेंगी
अब काला धन चुनाव ना लड़ पायेगा
देखना भले लोगों का शासन आयेगा

हमारी भी इज़्ज़त बढ़ेगी मुद्रा बाज़ार में
तब आयेगा मज़ा आपसे व्यापार में
कुछ वक़्त लगेगा मगर दिन जरूर फिरेंगे
अब आपके मुकाबले हम और नहीं गिरेंगे

दादा डॉलर मुस्कुराये, बोले रुकावट के लिए खेद है
छोटे तुम्हारे सपनों की व्यवस्था में कुछ छेद हैं
उनका क्या बिगड़ेगा जो विदेशों में दलाली पाते हैं
जिन मानसिक गरीबों के स्विस बैंक में खाते हैं

चलन से बाहर की मुद्रा माना कु-जात होगी
बैंक में धन आएगा तो अच्छी बात होगी
मगर जायेगा कहाँ ये कौन बतायेगा?
गरीबों का धन माल्या ही तो खायेगा

पिछले दरवाज़े से ठेके हो रहे हैं
गरीब के आवास में अमीर सो रहे हैं
देश के संसाधन कौड़ियों में बिकते हैं
लोग उसूलों पर नहीं, कोहनियों पर टिकते हैं

व्यवस्था अगर उन्हीं के हाथ में रहेगी
जिनके घर से काले धन की गंगा बहेगी
तो राजनीति सेवा नहीं, व्यापार होगी
और व्यवस्था जस की तस, लाचार होगी

तुम्हारे देश में जुगाड़ों की परम्परा है
सेटिंग का हुनर, कूट कूट के भरा है
आम आदमी लचर व्यवस्था का शिकार है
सच तो ये है, वही खुद जिम्मेदार है

पता नहीं तुम किन संस्कारों की बात करते हो
कानून का सम्मान नहीं, क़ानून से डरते हो
साहस के बगैर ईमान, बहुत दूर नहीं चलता
जब तक खुद ना बदलो, समाज नहीं बदलता

राष्ट्रवाद कर्म में रखो, सिर्फ मुँह से मत चीखो
जाओ पहले अपने हिस्से के बलिदान को सीखो
नोट के साथ साथ मानसिकता भी बदल लो
वरना कॉलर नीचे करो, पतली गली से निकल लो

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, November 1, 2016

विभीषण

इस बार की दीवाली में एक चिराग कम हो गया। जो दूसरों की राह प्रज्वलित किया करता था, वह स्वयं असमय ही बुझ गया।

ऐसा भाई जो 35 वर्ष पुराना साथ छोड़कर प्रभु श्री राम के चरणों में चला जाये, उसको विभीषण कहना कहाँ गलत है?

और विछोह की इस पीड़ा को रावण से बेहतर कौन समझ सकता है। मेरे जीवन के इस विभीषण को श्रद्धांजलि। नमन प्रिय अरविन्द ....!!!

विभीषण

उसमें भक्ति का समर्पण
मुझमें तप का अहंकार
वो निर्मल चित्त प्रेम का
शक्ति मेरा अलंकार

एक चाक पर थे गढ़े
मिट्टी के ये दो घड़े
वो घट बना मंदिर का
हम तृष्णा में रहे पड़े

मैं आकंठ डूबा चाह में
वो था मुक्ति की राह में
मैं लंका के वैभव में गुम
वो ईश्वर की पनाह में

वो वन का एक तपस्वी
मैं स्वर्ण नगरी का लंकेश
जोड़ घटा गुणा भाग मैं
वो खुश था पाकर के शेष

मैं दस सरों में लिये वजन
वो था ह्रदय का शुद्ध भजन
मैं युगों तक जलने वाला
वो पल में पिघलने वाला

मैं विद्या के दर्प में चूर
वो इन सबसे कोसों दूर
मैं धर्म समाज की व्याधि
उसका जीवन एक समाधि

मैं कुटुंब विनाश का कारण
वो समस्या का निवारण
मैं पराजय था युद्ध की
वो अवस्था प्राप्त बुद्ध की

वो उत्तर मैं दक्षिण था
साथ फिर भी अक्षुण्ण था
लेकिन तोड़ गया वो बंधन
अब करो क्रंदन या वंदन

इस कथा का अंत वही है
खोया पाया सब यहीं है
मिट्टी के हर घट की राह
मिट्टी ही तो ताक रही है

धन विद्या शक्ति व्यर्थ है
मृत्यु जीवन की शर्त है
शरण राम की जिसने पाई
वही सबल वही समर्थ है

© - प्रशांत सेठ

Sunday, October 30, 2016

शुभ दीपोत्सव

दीपों का त्यौहार, वो भी इस घोर अँधेरी काली रात में। शायद यही सन्देश है एक दीप का कि जब अँधेरे घने हों तो आशा का दीप जलाये रखें, और यदि जीवन में प्रकाश है तो परोपकार की परम्परा बनाये रखें।
इसी भावना के साथ आप सभी इष्ट मित्रों, स्नेहीजनों को शुभकामनायें.....

शुभ दीपोत्सव

लड़ते लड़ते एक दीप से
अंधकार जब यूँ बोला
लड़ोगे कब तक तुम मझसे?
जलोगे कब तक बन शोला?

श्वांसों का तेल है जब तक
संवेदना की जलती बाती
कर्त्तव्य पथ पर उजियारा मैं
करता रहूँगा सुन साथी

बुझते बुझते दे जाऊँगा
पीढ़ियों को भी ये पाती
घोर अमावस में दीप से
मिलने लक्ष्मी है आती

सुख शांति समृद्धि भी
गीत उसी के है गाती
जो लड़ता है तिमिर से
निर्द्वन्द दीपक की भांति

निस्वार्थ कर्म की सुगंध
जब चहुँ ओर छा जाती
बल बुद्धि यश कीर्ति
चलकर आती है ख्याति

स्वयं जलकर औरों की शुभ
करते हैं जो दीवाली
दीप बनकर जलने वाले
सदैव रहते अविनाशी

© - प्रशांत सेठ