Monday, February 22, 2016

आरक्षण

चार्ल्स डार्विन ने विकासवाद का सिद्धांत दिया था। प्रकृति के निरंतर बदलते रूप के चलते, वे प्रजातियां मिट गयीं जो संतुलन स्थापित ना कर सकीं और श्रेष्ठ गुणों का अर्जन ना कर सकीं।

प्रकृति और प्राकृतिक सिद्धांतों को चुनौती देना बुद्धिजीवी होने का लक्षण है। और ये तो सभी जानते हैं की भारत बुद्धिजीवियों का देश है। इसलिये हमने सोचा की हमारी अयोग्यता का संरक्षण होना नितांत आवश्यक है।

तब देश के बुद्धिजीवियों ने आरक्षण का नियम बनाया। शिक्षा में नहीं बल्कि रोजगार में और आर्थिक आधार पर नहीं वरन जातिगत आधार पर। क्योंकि यदि पिछड़े वर्ग को शिक्षित और कुशल बना दिया तो उनकी अयोग्यता ही समाप्त हो जायेगी। फिर हम संरक्षण किसका करेंगे। अत: काफी मंथन के बाद यह निष्कर्ष निकला की यदि अयोग्यता को संरक्षित करना है तो उसे श्रम से दूर रखा जाये और किसी भी परिस्थिति में योग्य बनने से रोका जाये।

हम भारतियों ने हमेशा संरक्षण पर विश्वास किया है, निर्माण पर नहीं। हम आज भी अतीत के गौरवशाली इतिहास को संरक्षित पहले करते हैं और भविष्य का निर्माण बाद में करते हैं। इसी गौरवशाली परंपरा के समर्थन में संपूर्ण विश्व से हम भारतियों के लिये आरक्षण की मांग करती एक (व्यंग) रचना....

(इस व्यंग के माध्यम से मैं पिछड़ों को पिछड़ा बनाये रखने की स्वार्थपूर्ण राजनीतिक साज़िश का विरोध करता हूँ)

आरक्षण

बौद्धिक वमन के अतिरिक्त
योग्यता हमारे पास नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है

रेल रोकें पटरी उखाड़ें
यही विध्वंसक शक्ति है
ऐसा हमारा गौरव है और
यही राष्ट्र की भक्ति है
सेवा का हम अवसर मांगते
दायित्वों का आभास नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है

मुंह में चम्मच देकर खिलाओ
बच्चों की भांति हैं हम
शिक्षित हमको होना नहीं है
पढ़ा ले जिसमें होवे दम
सरकारी अनुदानों पर जीना
इससे ज़्यादा आस नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है

शर्म क्या है नहीं जानते
मुफ्तखोरी की लत लगी है
राशन छप्पर दारु जो भी
दे दे वो सरकार सगी है
एक बोतल में वोट ले लो
कीमत कोई ख़ास नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है

हम हिंसक हैं क्योंकि हमारी
भूख अधिक है क्षमता कम है
पशुओं की भांति जीते हैं
स्वार्थ बड़ा है ममता कम है
केवल इतना ही अंतर है कि
जंगल में अब वास नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है

कौन सहेगा जीवन की ये
सर्दी गर्मी बारिश धूप
मिट ना जायें सुविधा भोगी
डार्विन के सिद्धांत अनुरूप
प्रतिभाओं से स्पर्धा कर लें
इतना हम में साहस नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है

© - प्रशांत सेठ

Sunday, February 21, 2016

सर्पदंश

आतंक और अत्याचार का कोई धर्म नहीं होता और ना ही होता है गद्दारों का। वो जयचंद भी हो सकता है और मीर जाफर भी। इसी तरह देशभक्ति का भी कोई धर्म नहीं होता। वो भगत सिंह भी हो सकता है और अशफ़ाक़ुल्ला भी। मज़हब की आस्तीन में पनप रहे सियासी सर्पों पर एक व्यंग...

सर्पदंश

पता ही नहीं चला वो कब इतना बड़ा हो गया
आज आस्तीन से निकला और सामने खड़ा हो गया
उसकी आँखों में विषैली चमक और आशा थी
इधर हमारे मन में हमेशा की तरह जिज्ञासा थी

मैंने पूछा, हे सर्प देव, बरसों से मेरी आस्तीन में पलते हो
आज नाराज़ होकर अचानक तुम किधर चलते हो?
यहाँ बहुतों की राजनीती आपकी कृपा से जमी हुई है
आपके भरण पोषण में बताओ कहाँ कमी हुई है?

वह बोला
हे सहिष्णुता के देवता आप बहुत भोले हैं
हम कल के सांप हैं आज भले ही संपोले हैं
हमारे विष के दांत अभी तो और बढ़ेंगे
स्कूल से जा रहे हैं अब यूनिवर्सिटी में पढ़ेंगे

सारे देश को डसने का मेरा मन कर रहा है
मगर तुम्हारी आस्तीन में मेरा टेलेंट मर रहा है
हम सपना देख रहे हैं कश्मीर की आज़ादी का
बस ज़रा सा संरक्षण मिल जाये खादी का

हमने पूछा हुज़ूर ये कैसा भेद करते हैं
जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं
हमारी आस्तीन में आपको पूरा संरक्षण भी मिलेगा
आप यहीं रहेंगे तो कल आरक्षण भी मिलेगा

वो बोला हम दुनिया के आम साँपों से भिन्न हैं
आस्तीन के साँपों का यही तो विशेष चिह्न हैं
हमारा मन भी हमारे तन की तरह काला है
हमने उसी को डसा है जिसने हमें पाला है

हमारे पुरखे जयचंद भी हैं, मीर जाफर भी
और हमारे लिए है ये लाइफ टाइम ऑफर भी
हमारा मज़हब है डसना, हमारे खून में शर्म नहीं है
हमारा स्वार्थ के अतिरिक्त और कोई धर्म नहीं है

मैंने सोचा ये कितना मासूम और भला है
क्यों ना होगा आखिर मेरी आस्तीन में पला है
संपेरों की बीन में जहाँ सर्प बाँधने की कला है
ये नादान उस देश के टुकड़े करने चला है

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, जो मर्ज़ी कह ले
जब तक बाँहें नहीं चढ़ीं, आस्तीन में रह ले
सहिष्णुता की हद तक कोई कुछ नहीं कहेगा
मगर देश के खिलाफ बोलेगा तो कौन सहेगा

मैंने कहा हम भोले हैं क्योंकि ये भोले शंकर का देश है
यहाँ सर्वशक्तिमान भी रखता फ़कीर का वेश है
वो नीलकंठ है, उसके कंठ में विष अटका है
वो नागेश्वर है क्योंकि गले में सर्प लटका है

उसके दो नेत्रों में जरूर प्रेम और सदभाव है
मगर तीसरे नेत्र में शुद्ध विध्वंस का भाव है
ये जब तक बंद है तब तक सहिष्णु है वो भी, ये देश भी
पाल रहा तब तक विष्णु है, वरना प्रलयंकारी महेश भी

© - प्रशांत सेठ

Friday, January 1, 2016

सशर्त शुभकामनायें

शुभकामनाओं का आदान प्रदान तो हर वर्ष होता है, मगर दुआयें सबको फलीभूत क्यों नहीं होतीं?

केवल शुभकामनाओं से आपका समय बदलता हो, तो हम भी दिए देते हैं। परंतु सच तो ये है कि केवल शुभकामनाओं से, ना मेरा कुछ बदलेगा, ना आपका।

हमारी शुभकामनाओं को फलीभूत होने के लिए आवश्यकता है, आपके निश्छल प्रयास की। क्योंकि केवल तिथि बदलने से परिस्थिति नहीं बदलेगी। इसलिये आज नव वर्ष पर हम भी आपको शुभकामनायें अवश्य देंगे, मगर सशर्त ...

अगर तुम्हारी झोली में
कुछ सपने हैं
और उन सपनो में शामिल
तुम्हारे अपने हैं
नित नई चुनौतियों से
मिलने का साहस है
और लक्ष्य को समर्पित
निश्छल प्रयास है
तो मैं नहीं कहता
नया साल मुबारक हो
तुम्हारा हर साल
मुबारक है मुबारक है मुबारक है

द्वेष रहित ह्रदय में
क्षमा है, आभार भी
जीवन के हर रंग से
तुम्हें है प्यार भी
विष पीकर भी तुम
बाँट सके हो अमृत
और मधुरता ही शेष है
आज मन में स्मृत
तो मैं नहीं कहता
नया साल मुबारक हो
तुम्हारा गया साल भी
मुबारक है मुबारक है मुबारक है

अगर तुम्हारी झोली में
खट्टी मीठी यादें हैं
और इन यादों में
अनुभव की सौगातें हैं
अगर तुमने बोये हैं
बीज खुशियों के
तो हमारी भी
दुआओं की बरसातें हैं
मैं नहीं कहता
नया साल मुबारक हो
तुम्हारा हर दिन
मुबारक है मुबारक है मुबारक है

© - प्रशांत सेठ

सशर्त शुभकामनायें http://prasantseth.blogspot.com/2016/01/blog-post.html

Wednesday, November 25, 2015

मधुर स्मृतियाँ

सुर बिना कब पूरे थे गीत
नेह बिना अधूरे मनमीत
साज़ ने जाना जब सरगम को
तब जन्मी दुनिया में प्रीत

जब सफ़र और हमसफ़र दोनों मन के अनुकूल हों तो वक़्त का पता ही नहीं चलता। 19 वर्ष चलते चलते कब इतनी दूर आ गये पता ही नहीं चला। आभार तुम्हारा दिव्या सेठ।

आज तुम्हारे मन के अनकहे एहसासों को शब्दों में पिरोकर तुमको ही देता हूँ, उपहार स्वरूप....

स्मृतियाँ

सिमटी सी थी सकुचाई सी
लजाई कुछ घबराई सी
याद करो वो पल साजन
मैंने मेहँदी रचाई थी
दुल्हन बन कर आई थी

हाथों में जयमाल लिये थी
आँखों में सवाल लिये थी
मुस्कुराकर तुमने भी तो
मूक सहमति जताई थी
मधुर मिलन बेला आयी थी

प्राण प्रण तन मन समर्पित
मन ही मन तुम भी गर्वित
सात फेरे सात वचन वो
कसम जो संग संग खाई थी
हर रस्म हमने निभाई थी

कल तक खेला बचपन था
आज कितना परिवर्तन था
घर की देहरी छूट रही थी
बालपन की विदाई थी
स्वागत में तरुणाई थी

सोचो कितना मुश्किल था
देह कहीं थी, कहीं दिल था
बाबुल के बाग़ की तितली
आज हो रही पराई थी
विछोह की घडी आई थी

ह्रदय में विश्वास अटल था
माँ के संस्कारों का बल था
साथ तुम्हारे मिलकर तब मैं
नया संसार रच पाई थी
प्रकृति हम पर मुस्काई थी

साथ तुम्हारे चलते चलते
दिन बीते सब हँसते खिलते
बाँट रही हूँ तुम संग आज
स्मृतियाँ जो बचाई थीं
प्रियतम मैं शरमाई सी

तृप्त अभी कहाँ मन हुआ है
परिपक्व अब मिलन हुआ है
कदम कदम है तुम संग चलना
देह संग उसकी परछाई सी
तुम सुर ,मैं शहनाई सी

© - प्रशांत सेठ

Monday, October 26, 2015

एक आहत व्यंग

हो सके तो कलम में फिर धार करो
उठो हे समाज के सृजक, प्रहार करो
रुदन ना करो अन्य के दोषों पर आज
तुम स्वयं शिल्पकार हो, स्वीकार करो

ना किसी नाम विशेष पर टिपण्णी है, ना ही ये किसी की निंदा है। क्योंकि दूर बैठकर किसी के मन के भाव को जान लेने का सामर्थ्य मुझमें नहीं। यह केवल एक प्रयास है कर्तव्यबोध का।

विरोध क्यों और किसका? जब हम स्वयं इस समाज के निर्माता हैं। सत्ता में कोई भी रहे वह तो जनता की छाया मात्र है। लोकतंत्र है इसलिये यथा प्रजा तथा राजा। दोषारोपण करना साहित्य का काम नहीं है। साहित्य का काम है सत्य का दर्शन करना और कराना और साथ ही भविष्य का निर्माण करना।

एक आहत व्यंग

आज टीवी न्यूज़ थी ब्रेकिंग अर्थात तोड़ने वाली
एक और साहित्यकार के पुरुस्कार छोड़ने वाली
सबकी तरह हमने भी मानसिक मंजन किया
सोने से पहले कुछ औपचारिक चिंतन किया

नींद में अचानक हमारे अंदर के लेखक ने पुकारा
हे ज्ञानपुंज, हे सिद्धांतवादी, हे वर्तमान युग के नाकारा
सारे देश में चारों तरफ हाहाकार हो रहा है
और एक स्वयंभू साहित्यकार सो रहा है?

उठो किसी का समर्थन करो या विरोध करो
बना नहीं सकते तो उत्पन्न अवरोध करो
परिचय दो संसार को अपनी विद्वता का
कर्म के वृक्ष पर अमरबेल की लता का

मैंने कहा देव, मैं ना किसी के समर्थन में हूँ ना ही विरोध में
मैं साहित्यकार भी नहीं हूँ, बस जिज्ञासु हूँ सत्य के शोध में
एक बात ये भी है, कुछ मिला ही नहीं तो छोड़ूँगा क्या?
मैं नंगा अगर नहा लूँगा तो फिर निचोड़ूँगा क्या?

वो बोले तुझे ले चलता हूँ एक विचित्र संसार में
गीत ग़ज़ल शायिरी और साहित्य के बाज़ार में
देख कितनी दुकानें हैं यहाँ, बड़े बड़े नाम हैं
जो साहित्य के रावण हैं मगर लिखते राम हैं

और इनसे मिलो ये इस बाज़ार के बड़े माफिया हैं
साहित्य ग़ज़ल है अगर तो ये रदीफ़ हैं, काफ़िया हैं
इनके पलटने से बड़े बड़ों के तख़्त पलट जाते हैं
ये कभी पुरुस्कार लेते हैं तो कभी लौटा आते हैं

हमने कहा हुज़ूर साहित्य सृजन है, विषय नहीं क्रोध का
इसे क्यों बनाते हैं हथियार राजनीतिक प्रतिशोध का
मिले हुए सम्मान का कुछ तो सम्मान कीजिये
कलम को सियासत का मत गुलाम कीजिये

वो बोले तुम अभी नए हो इसलिये आदर्शवादी हो
सूट बूट के ज़माने में, नैतिकता की खादी हो
अब वक़्त बदल गया है, रस्मो रिवाज़ बदल गए हैं
साहित्य के परिंदे के सियासी पर निकल गए हैं

हाथ जोड़ो, पैर पकड़ो, पुरुस्कार की भीख लो
पुरानी धुन छोडो और नई सरगम सीख लो
'स' से सलाम 'र' से राजा 'ग' से गुणगान 'म' से मंच
साहित्यकार कहलाना है तो जान लो ये सारे प्रपंच

त्याग की बात करते रहो और बने रहो भोगी
तो इस बाज़ार में एक दुकान तुम्हारी भी होगी
टीवी में, अख़बार में तुम ही तुम दिखोगे
मेरी बात मान लो प्यारे, खूब बिकोगे

स्वप्न था या दृश्य यथार्थ कथन का?
हमने चित्र देखा मनुष्यता के पतन का
हम अपनी दुनिया में तो लौट आये हैं
कुछ प्रश्न मगर साथ में ज़रूर लाये हैं

व्यवस्था पर दोष डालना सही ढंग नहीं है
क्या हम भी इसी व्यवस्था का अंग नहीं हैं?
अगर साहित्यकार हैं तो दायित्व स्वीकार करें
उठायें कलम, रुग्ण मानसिकता पर प्रहार करें

दर्पण में बिम्ब दिखायें अवश्य वर्तमान का
मगर रास्ता भी बनायें भविष्य के निर्माण का
क्योंकि कल की नींव है ये, प्रेरणा है आज की
कलम तो स्वयं शिल्पकार है इस समाज की

© - प्रशांत सेठ

Monday, October 19, 2015

अहंकार

"मुझे आज तक समझ में नहीं आया के संसार ऐसा क्यों है, वैसा क्यों नहीं है। लोग इतनी सी बात को समझते क्यों नहीं हैं"

ये शब्द आपने अक्सर कुछ लोगों के मुंह से सुने होंगे। ये एक विशेष प्रकार की प्रजाति होती है जो स्वयं को इस संसार से अलग मानती है और प्रदर्शित भी करती है। ईश्वर ने उन्हें गलती से इस संसार में भेज दिया होता है क्योंकि उनके अनुसार वे पात्र तो किसी अन्य उत्कृष्ट लोक के होते हैं। बहुत घुटन होती है उन्हें इस संसार में। अपने चारों तरफ उन्हें कोई भी अपने समकक्ष नहीं मिलता। अंत में अवसाद लेकर इस संसार से जाते हैं। निश्चित है ऊपर जाकर भी शिकायत ही करते होंगे।

हम कोई अपवाद तो हैं नहीं। आपको ऐसे लोग मिल सकते हैं तो हमको क्यों नहीं? ऐसे ही एक सज्जन सुबह सुबह टकरा गए। मन ही मन कुछ हमदर्दी और उजागर शुभकामनाओं के साथ विदा किया। अब आप पूछेंगे की हमदर्दी भी कोई मन ही मन देने की चीज़ है? तो हम कहेंगे की मेरे भाई, जिसे स्वयं के रुग्ण होने का पता नहीं है, वो हमारी हमदर्दी क्यों लेगा?

चिंतन करना मेरा स्वाभाव है। उद्देश्य है स्वयं के अंदर निरंतर सुधार का प्रयास। इसलिये इस दर्पण में सबसे पहले अपना चेहरा देखा तो पाया कि कभी हम भी तो ऐसे ही थे। जब तक सिर्फ दूसरों को पढ़ते रहे तब तक शिकायतों से भरे रहे। अब जब दूसरों के पहले खुद को भी पढ़ते हैं तो अपनी कमियों के प्रति सजगता बढ़ती है। परिणाम आनंद शांति और प्रेम के रूप में मिलता है। और इससे बड़ी सफलता क्या होती होगी?

इस बार विजयादशमी पर भीतर ही कुछ जल जाये तो क्या बुरा है। देखिये, ये रचना शायद आपके भी किसी काम की हो...

अहंकार

विद्वता का चोला ओढ़े
कब चुपके से तुम आ गये
मेरे मन मंदिर के भीतर
चोरी चोरी समा गए

कभी पर्वत सा वृहद लेकर
कभी राई सा लघु आकार
क्रोध घृणा है द्वेष मोह भी
अनंत तुम्हारे हैं प्रकार

दस चेहरे तुम ही रावण के
तुम ही राम का हो वनवास
सूर्पनखा का दर्प तुम ही हो
तुम ही सीता का संत्रास

लेकिन मैं पहचान रहा हूँ
बदलो तुम कितने भी रूप
तुम ही कभी छाँव हो और
कभी तुम ही बन जाते धूप

भ्रम के अदृश्य आवरण से
अवरुद्ध करते ज्ञान की राह
भटकाते हो मन को तुम ही
देकर झूठे मान की चाह

सहज सुंदर जीवन में
विशिष्टता का भ्रामक स्वाद
फिर कुंठाओं का रूप लेकर
तुम ही बन जाते अवसाद

भरा घट लेकर मेघों से
करते हो वर्षा की आस
चलो जरा रीत भी जाओ
खाली होकर आओ पास

मन भीतर से खुद पूछेगा
प्रकाश रखूँ या अंधकार?
सागर मिलन की प्यास रखूँ
या पृथक बूँद का अहंकार?

© - प्रशांत सेठ

Thursday, October 15, 2015

एक पाती (वित्त) चोर के नाम


मेरे एक प्यारे से मित्र हैं। हास्य कवि हैं, उसपर से सरदार भी। उनकी कोई फैक्टरियां भी नहीं हैं और बाप दादों ने भी दिल खोल के दिया तो है, लेकिन केवल आशीर्वाद।

उनके घर कल रात चोरी हो गई। पहले तो दुखी हुए; बताया की जीवन भर की जो थोड़ी बहुत जमा पूँजी थी वो चली गई। फिर हंसने लगे। मुझे भी हंसी आ गई; अब एक कवि के घर सरस्वती ही रह सकती है, लक्ष्मी कहाँ ठहरती है। वित्त चला गया तो जाने दो, चित्त ना जाने पाये।

भीगा होगा अंतर्मन जिसका
वही तो मुस्कुराता है
मुझे मालूम है वो रोया होगा
जो सबको हंसाता है

द्रवित ह्रदय ने फिर एक रचना को जन्म दे दिया ....

एक पाती (वित्त) चोर के नाम

उम्मीदें थीं कल की इसमें
कुछ बूँदें थीं पसीने की
कुँवारे जेवर थे बहन के
बेटी की फीस महीने की

लटक रही पीले पत्ते सी
एक आशा की डाली थी
बीमार माँ की थीं श्वांसें
दवा की शीशी खाली थी

बच्चों से किये वादे इसमें
जो अभी तक अधूरे थे
बहुत नहीं था अलमारी में
लेकिन सपने पूरे थे

फिर भी सब कहाँ था उसमें
भावों का गंगाजल नहीं था
रब की उसमें दुआ नहीं थी
और धीरज का बल नहीं था

कुछ ज़रूरत थीं जीवन की
मुश्किलों का हल नहीं था
असली धन तो छोड़ गए तुम
साहस और संबल नहीं था

यही सोच मैं दुआ देता हूँ
तुम्हारी भी तो बेटी होगी
बूढ़ी माँ होगी बिस्तर पर
जो बीमार सी लेटी होगी

ऐसी कोई मजबूरी जो
शायद मुझसे बड़ी होगी
सर उठाये ज़रूरत कोई
द्वार तुम्हारे खड़ी होगी

मगर जीवन यज्ञ में सुन लो
निज श्रम का ही फल मिलता है
खुशियों का कोई फूल कहाँ
रेगिस्तानों में खिलता है

इसलिये मेरी इस पाती को
पवित्र ह्रदय से पढ़ना तुम
चरित्र आँगन के फूलों का
संस्कारों से गढ़ना तुम

ईमान का कुछ धन लेकर
बेटी की फीस में मिला देना
बूढ़ी माँ को मेहनत की भी
दो बूँद ज़रूर पिला देना

© - प्रशांत सेठ