चार्ल्स डार्विन ने विकासवाद का सिद्धांत दिया था। प्रकृति के निरंतर बदलते रूप के चलते, वे प्रजातियां मिट गयीं जो संतुलन स्थापित ना कर सकीं और श्रेष्ठ गुणों का अर्जन ना कर सकीं।
प्रकृति और प्राकृतिक सिद्धांतों को चुनौती देना बुद्धिजीवी होने का लक्षण है। और ये तो सभी जानते हैं की भारत बुद्धिजीवियों का देश है। इसलिये हमने सोचा की हमारी अयोग्यता का संरक्षण होना नितांत आवश्यक है।
तब देश के बुद्धिजीवियों ने आरक्षण का नियम बनाया। शिक्षा में नहीं बल्कि रोजगार में और आर्थिक आधार पर नहीं वरन जातिगत आधार पर। क्योंकि यदि पिछड़े वर्ग को शिक्षित और कुशल बना दिया तो उनकी अयोग्यता ही समाप्त हो जायेगी। फिर हम संरक्षण किसका करेंगे। अत: काफी मंथन के बाद यह निष्कर्ष निकला की यदि अयोग्यता को संरक्षित करना है तो उसे श्रम से दूर रखा जाये और किसी भी परिस्थिति में योग्य बनने से रोका जाये।
हम भारतियों ने हमेशा संरक्षण पर विश्वास किया है, निर्माण पर नहीं। हम आज भी अतीत के गौरवशाली इतिहास को संरक्षित पहले करते हैं और भविष्य का निर्माण बाद में करते हैं। इसी गौरवशाली परंपरा के समर्थन में संपूर्ण विश्व से हम भारतियों के लिये आरक्षण की मांग करती एक (व्यंग) रचना....
(इस व्यंग के माध्यम से मैं पिछड़ों को पिछड़ा बनाये रखने की स्वार्थपूर्ण राजनीतिक साज़िश का विरोध करता हूँ)
आरक्षण
बौद्धिक वमन के अतिरिक्त
योग्यता हमारे पास नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है
रेल रोकें पटरी उखाड़ें
यही विध्वंसक शक्ति है
ऐसा हमारा गौरव है और
यही राष्ट्र की भक्ति है
सेवा का हम अवसर मांगते
दायित्वों का आभास नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है
मुंह में चम्मच देकर खिलाओ
बच्चों की भांति हैं हम
शिक्षित हमको होना नहीं है
पढ़ा ले जिसमें होवे दम
सरकारी अनुदानों पर जीना
इससे ज़्यादा आस नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है
शर्म क्या है नहीं जानते
मुफ्तखोरी की लत लगी है
राशन छप्पर दारु जो भी
दे दे वो सरकार सगी है
एक बोतल में वोट ले लो
कीमत कोई ख़ास नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है
हम हिंसक हैं क्योंकि हमारी
भूख अधिक है क्षमता कम है
पशुओं की भांति जीते हैं
स्वार्थ बड़ा है ममता कम है
केवल इतना ही अंतर है कि
जंगल में अब वास नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है
कौन सहेगा जीवन की ये
सर्दी गर्मी बारिश धूप
मिट ना जायें सुविधा भोगी
डार्विन के सिद्धांत अनुरूप
प्रतिभाओं से स्पर्धा कर लें
इतना हम में साहस नहीं है
हम परजीवी हैं संरक्षण दे दो
श्रम में हमारा विश्वास नहीं है
© - प्रशांत सेठ