राजनीति कहीं बाहर नहीं होती। इंसान के अंदर ही होती है। कहीं जाग्रत तो कहीं सुप्त अवस्था में। ढूँढ़िये मिल जायेगी, मेरे अंदर भी और आपके अंदर भी, दूसरों पर शासन करने की प्रबल लालसा के रूप में।
यह व्यंग कथा कुछ बड़ी है, क्योंकि ये कविता नहीं है। ये कथा है एक सम्भावना के उदय से लेकर अंत की।
प्रजातंत्र - यथा प्रजा तथा तंत्र
मैं तिरस्कृत सा आदमी बहुत ही आम था
छोटी छोटी इच्छाओं से मन का ट्रैफिक जाम था
मोहल्ले के बचे खुचे शरीफों में अपना नाम था
हमने अब तब रखा सिर्फ अपने काम से काम था
यदा कदा कलम की तलवार पकड़ लेता था
फिर मन ही मन व्यवस्था से भी लड़ लेता था
दफ्तर में अफसर, घर में पत्नी की सरकार थी
और अपनी ज़िन्दगी विपक्ष की तरह बेकार थी
अंदर कहीं कुछ निष्क्रिय, मगर ज़िंदा था
शायद ईमान नाम का सोया हुआ परिंदा था
एक दिन ये सोया हुआ परिंदा जाग गया
हुआ यूँ की मोहल्ले का चौकीदार भाग गया
शंकर जी की चढ़ाकर बूटी
वो सो रहा था ऑन ड्यूटी
हमने टोका तो बोला यहाँ कुछ नहीं बदलेगा
ये मोहल्ला भी हिंदुस्तान की तरह ही चलेगा
इस देश में सरकार सो रही है, लोग सो रहे हैं
और तुम जैसे लोग चौकीदार पे नाराज़ हो रहे हैं?
पहले तुम जागो, तुम्हारी नींद मुझसे ज़्यादा गहरी है
हे आम आदमी, तू भी तो लोकतंत्र का प्रहरी है
उधार का ही सही हम भी ज्ञान रखते हैं
कवि हैं तो क्या हुआ स्वाभिमान रखते हैं
खून हमारा उबलना था, सो उबल गया
सरकार का गुस्सा, गरीब पर निकल गया
बात बढ़ते बढ़ते कुछ ज़्यादा बढ़ गई
छोटी सी कलम एक लाठी से अड़ गई
लेकिन सबकी अपनी अपनी कद और काठी होती है
भैंस उसी की होती है, जिसके पास लाठी होती है
न्यूटन जैसी वैज्ञानिक दृष्टि, सर पर कुछ पड़ने से मिलती है
हमने भी वह सिद्धांत खोज लिया जिस पर राजनीति चलती है
यदि कलम भविष्य में मिलने वाला फल होती है
तो लाठी समस्या का तात्कालिक हल होती है
उस दिन राजनीति की पहली सीढ़ी मैं चढ़ गया
और व्यवस्था भंग करने का दोष मेरे सर मढ़ गया
मेरे अभी अभी जागे स्वाभिमान की अर्थी निकाली गई
और नये इंतज़ाम की ज़िम्मेदारी मुझ पर ही डाली गई
जीवन में कभी कभी अजीब सम्बन्ध गठित होते हैं
परस्पर विरोधी एक हो जाते हैं जब व्यथित होते हैं
सिद्धांत हमें कुछ पल के लिये एक दूसरे से दूर कर देता है
लेकिन स्वार्थ नितीश और लालू की तरह मजबूर कर देता है
कानों के ज़रिये दिमाग के हंतक हो गये
ऐसे ही कुछ हमारे भी शुभचिंतक हो गये
मुश्किल घड़ी में अच्छे बुरे का कहाँ ज्ञान होता है
बहुमत ना हो तो हर रिश्ता भगवान होता है
मैंने जीवन भर की जमा पूँजी इन रिश्तों को जोड़ा
अपनी समस्या का नारियल इनके सामने फोड़ा
मजबूरी का भोग लगाया, आस्था की अगरबत्ती जलाई
और अटकी में जैसी गाते हैं, वैसी आरती भी गाई
सबने एक सुर में मिलकर मुझे धिक्कारा
दूसरों के भरोसे जीने वाले, हे नाकारा
मन के मकान से निज इच्छाओं को खाली करो
समाज के लिये जियो, जाओ खुद रखवाली करो
मुर्दे में अचानक प्रविष्ट कहीं से प्राण हो गया
हमें अपने सामजिक दायित्व का भान हो गया
अब तक के जीवन पर हमको अफ़सोस होने लगा
हमारा लहू अचानक सुभाष चंद्र बोस होने लगा
सपने सुन्दर सलोने मैं गढ़ लेता हूँ
रास्ता हो ना हो, मैं बढ़ लेता हूँ
कोई चढ़ाये झाड़ पर तो चढ़ लेता हूँ
आम आदमी हूँ, सोचा चुनाव लड़ लेता हूँ
हमें खबर नहीं थी मगर होश जा चुका था
बुद्धि को पछाड़कर जोश आ चुका था
पानी की टंकी पर चढ़े और दे डाला भाषण
हम लायेंगे इस मोहल्ले में जागने वाला शासन
अब मैं मोहल्ले का निर्वाचित चौकीदार था
मैं ही प्रशासन था यहाँ, मैं ही सरकार था
सत्ता की मदिरा में सफ़र ज़रा भी नहीं खला
आमपुर से ख़ासनगर आ गया, पता ही नहीं चला
रास्तों पर अटकने वाला, मंज़िल से भटकने लगता है
राजनीति में पुराना रिश्ता इसलिये खटकने लगता है
सफलता मिलने पर ये मजबूरी हो जाती है
कुर्सी की करीबी में मुद्दों से दूरी हो जाती है
कौन सा परिंदा? काहे का जगना जगाना था
व्यवस्था से लड़ना? वो सब तो एक बहाना था
अब हम भी उसी सोई हुई व्यवस्था के अंग हैं
"आप" बुरा मत मानना, राजनीति के यही ढंग हैं
झाड़ू फूल पंजा, मेरे अंदर हर निशान देख लो
दोस्तो इस मोहल्ले में तुम हिंदुस्तान देख लो
इस व्यंग के अंदर देख लो अगर समझदारी है
ये व्यवस्था अच्छे अच्छों के ईमान पर भारी है
और यही इस देश की सबसे बड़ी लाचारी है
© - प्रशांत सेठ