शब्दों से मैं खींच रहा हूँ
आज अनूठा सा एक चित्र
काश कलम से गा पाऊँ वो
अदभुत सा जीवन चरित्र
हम संग खेले कूदे पढ़े थे
साथ हमने सपने गढ़े थे
समय की इस चाक पे हम
मिट्टी के दो कच्चे घड़े थे
एक दिन सपने घायल लेकर
पास जो थे चावल लेकर
मन याचक बन द्वार खड़ा था
मित्र का वैभव बहुत बड़ा था
उसने सुना तो दौड़ा आया
आकर मुझको गले लगाया
कुछ समय तो सुख से बीता
निर्धन चावल से भी रीता
था निराश मन खाली हाथ
क्यों व्यर्थ में पाली आस
अपनी कुटिया कहाँ बुरी थी
क्या मिला धनिकों के पास
क्षण भर के वैभव का सुख
देता जीवन भर का दुःख
कटु सत्य का ज्ञान हुआ
तब यथार्थ का भान हुआ
बदला बदला सब कुछ पाया
मैं ये किस पते पर आया
अब समझा हूँ उसकी लीला
आज अंतर्मन हुआ है गीला
यह लोक है द्वारका नगरी
मन है छिद्रों वाली गगरी
उस घट में कब जल ठहरे
जिसमें छिद्र हों इतने गहरे
जीवन में रहे ना शेष
इच्छाओं का कोई क्लेश
मन सुदामा रहे वैरागी
किंतु कृष्ण का हो अनुरागी
© - प्रशांत सेठ






