Thursday, August 3, 2017

मातृ स्वरुप दादा भैया मामा को विनम्र श्रद्धांजलि

जब जब ह्रदय मथा है मैंने
तब तब अधर लगे कुछ कहने
जब जब अधर सिये हैं मैंने
तब तब नयन लगे हैं बहने
मत अधरों को रोको
मत नयनों को बहने दो
आँसू हैं श्रृंगार ह्रदय का
ह्रदय में रहने दो

- श्री प्रभात नीखरा

प्रिय मामाजी श्री प्रभात नीखरा जी "दादा भैया" की उपरोक्त पंक्तियाँ उनके विराट व्यक्तित्व का परिचय देती हैं। संघर्ष और टूटन से सृजन करना प्रकृति की विशेषता होती है। जब एक बीज कहीं गहरे मिटटी में दब कर टूटता है, तब उसमें सम्पूर्ण मानवता को पोषित करने की क्षमता निखर कर बाहर आती है। ऐसा भी कह सकते हैं कि अपनी टूटन को सृजन में परिवर्तित कर देने का गुण जिसमें होता है, प्रकृति ऐसे व्यक्तित्व को ही सृजन का दायित्व सौंपती है।

मैं समझ सकता हूँ प्रकृति ने दादा भैया को परिवार की नींव बनने के लिये क्यों चुना। संघर्ष उसी के हिस्से में आता है जिसके जीवन में कुछ सिद्धांत होते हैं और जो आगे बढ़ कर स्वयं दायित्व उठाता है। भाई का पद तो जन्म से प्राप्त हो जाता है परंतु घर का दादा भैया होने के लिये कर्तव्यनिष्ठा के साथ साथ त्याग, धैर्य और प्रेम से परिपूर्ण ह्रदय की आवश्यकता होती है। कदाचित इसलिये मामाजी अपने घर के बड़े भाई ही नहीं, "दादा भैया" थे। उनके दिये हुये संस्कार और चिंतन के बीज ने आज एक दो नहीं, सैंकड़ों वृक्ष को इतनी गहरायी दी है कि वो सभी अपने अपने स्थान पर खड़े होकर आकाश को चुनौती दे रहे हैं। कल उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हज़ारों लोगों की आँखों में अश्रुधारा इस बात का द्योतक थी के दादा भैया की स्मृतियाँ हम सभी के ह्रदय में सदा पुष्पित और पल्लवित होती रहेंगे।

यदि मामा शकुनि हो तो भांजे का दुर्योधन होना निश्चित है। यदि मामा कंस हो तो भांजा कृष्ण ही होगा। परंतु यदि मामा स्वयं कृष्ण हो तब?
तब अभिमन्यु का जन्म होता है। मेरे जीवन की प्रेरणा, व्यक्तित्व के निर्माता और कवि मन को जागृत करने वाले प्रिय मामाजी को मेरी श्रद्धापूर्ण भावांजलि।

- प्रशांत सेठ

Wednesday, July 19, 2017

कविता - चित्त के चेहरों सी

ह्रदय भाव लहरों सी
धूप सर्द दोपहरों सी
मन दर्पण में छवि अपनी
फिर भी लगती गैरों सी
कविता चित्त के चेहरों सी

ह्रदय ह्रदय बहती जाये
करुणा की फसल उगाये
मन के तटबंध तोड़ चल दे
जो बरसाती नहरों सी
कविता सरित लहरों सी

हाय पैसा हाय पैसा
जीवन ऊँची बिल्डिंग जैसा
इनके बीच ऊग आती ज्यों
झोपड़ पट्टी शहरों सी
कविता गाँव के चेहरों सी

मन पंछी सी आतुरता
विस्तृत नभ सी व्यापकता
सपनों को पंख लगे पर
यथार्थ बेड़ियाँ पैरों की
कविता गूंगे बहरों सी

काव्य रंग में कितना रंगें
मन की ये अल्हड़ उमंगें
वो जैसे बेपरवाह जवानी
कविता सयाने पहरों सी
कविता बुजुर्ग महरों सी

© - प्रशांत सेठ

महर = पूज्य और श्रेष्ठ व्यक्ति

Saturday, June 24, 2017

दलित पुराण

भाईसाहब! ये दलित क्या होता है?
जिज्ञासु मन ने हमेशा की तरह
अपना प्रश्न दागा
मैं उठकर वहाँ से भागा
लेकिन क़ानून की तरह हाथ बढ़ाकर
उसने मुझे पकड़ लिया
आज फिर इस व्यंगकार को
सनातन प्रश्न ने जकड़ लिया

मैं समझ गया, अब ये पूछेगा
ये कौन सा जातिगत गणित है?
एक संपन्न राज्यप्रमुख क्यों
आज भी दलित है?
फिर पूछेगा सवर्ण की पत्नी क्यों
दलित की तरह प्रचलित है?
इस दलित मंत्र से सत्ता
कैसे होती फलित है?
मैंने कहा सुनो,
तर्क सिद्धांत में नहीं मिलेगा
तुम्हारे प्रश्न का निराकरण
दलित अवस्था नहीं, जाति है
राजनीति का अलग है व्याकरण

दलित यानि
युगों तक शोषण का पर्याय
त्रेता से कलयुग तक जिसका
नहीं मिल सका उपाय
शबरी के जूठे बेर
कोई राम कितने भी खा ले
केवट के पवित्र भाव में
चरण नहीं, समस्त देह डुबा ले
लोकतंत्र के मस्तक पर ये निशान
पुरानी चोट का है
और बना रहेगा युगों तक क्योंकि
मामला वोट का है

दलित अर्थात
एकलव्य का अंगुष्ठ अर्पण
वर्ण के समक्ष
प्रतिभा का आत्मसमर्पण
द्वापर में एक युवराज ने
शोषण का प्रतिकार किया था
सूतपुत्र कर्ण को जब
अंगराज स्वीकार किया था
तभी से आरक्षण का
यह सिद्धांत चलन में है
राष्ट्रप्रमुख की प्रतिभा नहीं
योग्यता उसके दलन में है

दलित यानि
अपने आप में एक उपलब्धि
वैसे भी यहाँ
प्रतिभा की कीमत कब थी
इस शब्द में छुपा है
उनके पुरखों का संघर्ष
और पीढ़ियों की बढ़ती सम्पन्नता
वर्ष दर वर्ष
पुरखों के शोषण का लाभ
अब तक ले रहे बच्चे हैं

लगे रहने दो स्वाभिमान पर

ये दाग तो अच्छे हैं

© - प्रशांत सेठ

Friday, June 16, 2017

दीवारें

दीवारें जब होती हैं
अपने शैशव में
तब टिकी होती हैं
ग़लतफ़हमियों की नींव पर
खड़ी होती हैं
अहंकार की सीमेंट से
स्वार्थ की ईंटों को जोड़कर
और इस तरह बँट जाता है
"हम" का आँगन
"मैं" और "तू" में
इन दीवारों में होता है
एक दरवाजा सम्भावना का
जिसके दोनों तरफ
सदभावना की कुण्डी में
लटकते हैं घृणा के ताले
दीवारें गुमा देती हैं
चाबी प्रेम की
दीवारें नासमझ होती हैं
रिश्तों के दरमियाँ

दीवारें जब
बड़ी हो जाती हैं
सियासत की गोद में
तब इस पार से उस पार
नहीं बहतीं
सौहाद्र की हवायें
नहीं सुनायी देतीं
"ह" और "म" को
एक दूजे के ह्रदय की धड़कन
बंद हो जाती हैं सदा के लिये
एहसास की खिड़कियाँ
और सम्भावना के दरवाजे
नफरत के मदरसे में
दीवारें जवाँ हो जाती हैं
मजहबों के दरमियाँ

दीवारें जब
और बड़ी हो जाती हैं
तो समझदार हो जाती हैं
तब खुल जाती हैं इनमें
कुछ विशेष खिड़कियाँ
और खुल जाते हैं कुछ दरवाजे
पिछली गली में
इन्ही दरवाजों से फिर
बेचीं जाती हैं कड़वाहटें
इन खिड़कियों में से
हाथ मिलाते हैं कुछ बड़े लोग
और घर ले आते हैं
मुनाफा
समझदार दीवारें व्यापार करती हैं
नफ़रतों के दरमियाँ

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, June 13, 2017

व्यंगबाण

हमारे व्यंगकार मित्र हैं शिरीष गोंटिया उर्फ़ उजड्ड जी। सत्य सिर्फ कड़वा ही नहीं उजड्ड भी होता है। ये अनुभव मैंने इनको देखकर ही प्राप्त किया है। इनकी महान सूक्तियों की व्याख्या करने का पुनीत कार्य मेरे जिम्मे है। अब देखिये ये तो सुबह सुबह का मॉर्निंग प्रवचन देकर निकल लेते हैं, परंतु भक्तों की जिज्ञासा को शांत करने के लिये व्याख्या मुझे करनी पड़ती है।

"व्यंग्यकार को शारीरिक रूप से पर्याप्त स्वस्थ होना चाहिए, आलोचक को कवि से अधिक कसरती होना चाहिये।"

- स्वामी उजड्डा नन्द

व्याख्या

बुद्धिजीवियों और संतों में एक बड़ा फर्क होता है। संतो के वचन व्यर्थ नहीं होते क्योंकि वो अनुभव की कोख से जन्म लेते हैं। जबकि बुद्धिजीवियों का ज्ञान टेस्ट ट्यूब बेबी की तरह नियंत्रित वातावरण में जन्म लेता है। बुद्धिजीवियों का ज्ञान यथार्थ के संघर्षों से मुक्त होकर जन्म लेता है और डार्विन के सिद्धांत को मुँह चिढ़ाकर; युगों तक जीवित रहने के उद्देश्य से, जीवन में नहीं सिर्फ किताबों में उतरना चाहता है।

स्वामीजी कहते हैं की व्यंग और आलोचना के शब्दबाण दूर से ही चलाये जाने चाहिये। धनुष की प्रत्यंचा को तान कर बाण छोड़ने के लिये, लक्ष्य से एक न्यूनतम दूरी रखना आवश्यक होती है। लक्ष्य जब करीब होता है तो धनुर्धारी को स्वयं उससे दूर जाकर वार करना चाहिये, वरना धनुष को त्याग कर मल्लयुद्ध की योग्यता भी रखनी चाहिये। इतिहास साक्षी है कि महारानी द्रौपदी द्वारा छोड़े गये व्यंग्यबाण की अंतिम परिणीति भीमसेन और दुर्योधन का मल्लयुद्ध ही था।

सर्वविदित है कि धनुर्धारी की वीरता का आँकलन उसके लक्ष्य की शक्ति से किया जाता है। अत: ये निश्चित है की सफल व्यंगकार अथवा आलोचक का लक्ष्य सदैव तगड़ा और समर्थ होना चाहिये। आपकी हैसियत हो ना हो, थलसेनाध्यक्ष को गरिया देने मात्र से आप एक सफल आलोचक की पदवी प्राप्त कर सकते हैं। व्यंगविधा में पारंगत स्वामी उजड्डा नन्द जी अपने अनुभव से बताते हैं कि जब बाण निशाने पर लगता है तो ताली बजाने वाले असंख्य प्रशंसक होते हैं। परंतु जब व्यंगकार रुपी द्रौपदी की मर्यादा अथवा आलोचक रुपी शिशुपाल का जीवन खतरे में पड़ता है, तब आज के युग में कोई भीमसेन अथवा दुर्योधन मदद के लिये आगे नहीं आता। तब माफ़ी माँगते हुये बयान भी वापस लेना पड़ जाता है। अतः व्यंगकार और आलोचक का शारीरिक रूप से स्वस्थ और कसरती होना भी उतना ही अनिवार्य है।

भक्त वत्सल स्वामी उजड्डा नन्द जी की प्रेरणा से ही मार्क ज़करबर्ग, आदि ने मुख पुस्तक, वॉट्सएप्प, ट्विटर आदि का सोशल प्लेटफार्म तैयार किया। इस मंच पर चढ़कर छोटे से छोटा धनुर्धारी भी बड़े से बड़े लक्ष्य पर, दूर से ही निशाना साध सकता है। प्रशंसकों के लाइक्स की गिनती करके स्वयं को स्थापित व्यंगकार भी घोषित कर सकता है। परंतु आभासी दुनिया के अपने दुष्परिणाम भी होते हैं। सोशल मीडिया पर निरंतर अभ्यास के चलते व्यंगकार और आलोचकों के अंगुष्ठ के अतिरिक्त शेष शरीर दुर्बल ही रह जाता है। तब मल्लयुद्ध की योग्यता उनमे नहीं रह जाती। अतः ऐसे अंगुष्ठबली वीरों के लिये स्वामीजी सलाह देते हैं कि वे सोशल मीडिया से बाहर आने का प्रयास ना करें। प्रशंसकों के प्रलोभन अथवा विरोधियों की ट्रॉलिंग के प्रति समदर्शी भाव रखें और इस मायाजाल में ना फँसें।

संतों में एक विशेष गुण ये भी होता है कि उनकी कथनी और करनी एक होती है। उनका आचरण भी उनके व्याकरण के अनुरूप ही होता है। स्वामी उजड्डा नन्द जी के प्रिय मित्र हैं सत्येंद्र रावत जी। स्वामीजी उनपर और उनकी काल्पनिक राजनीतिक पार्टी पर निशाना साध के निरंतर अभ्यास (नेट प्रैक्टिस) करते रहते हैं। रावत जी के कसरती शरीर को ध्यान में रखते हुये, स्वामीजी ने वॉट्सएप्प से बाहर दर्शन ना देने की कसम खा रखी है। स्वामीजी के व्यंगबाणों के कायल बहुत से प्रशंसकों और घायल बहुत से विरोधियों को आज तक उनके दर्शन नसीब नहीं हुये। यहाँ तक की अपने प्रिय शिष्य प्रशांत सेठ जी को भी उन्होंने बहुत दिनों से, अपने दर्शनों से वंचित रखा है। ऐसे संतों को नमन करने से हमारा और आपका जीवन धन्य हो जाता है।

तो बोलो व्यंग शिरोमणि, आलोचना वीर, दर्शन दुर्लभ श्री श्री 1008 स्वामी उजड्डा नन्द जी की जै

© - प्रशांत सेठ

Friday, June 9, 2017

मेरे देश की धरती

हवा में उड़ता हुआ
एक पत्थर आया
मेरी कॉर्पोरेट सरकार के
शीशे से टकराया
फिर धूल झाड़कर उठा
हौले से मुस्कुराया
पूछा तो परिचय उसने
कुछ यूँ बताया
खेत से उठता एक
सियासी तूफान हूँ
भाईसाहब, मैं कर्ज में दबा हुआ
देश का किसान हूँ

बोला, आप जानते हैं
किसान क्या होता है?
वही जो धरती के सीने पर
श्रम का हल होता है
आज की भूख दबाकर
कल की रोटी बोता है
फिर पसीने से उसे सींचकर
अच्छे दिन की बाट जोहता है
उम्मीद की टूटी खाट पर
जागता ना सोता है
और फसल आने पर पहले से
ज़्यादा गरीब होता है

हम कलमकारों की नीयत
हमेशा साफ़ होती है
हमारी मासूमियत भरी जिज्ञासा
हरदम माफ़ होती है
बुद्धिजीवियों के सवाल
बड़े पवित्र रहते हैं
इस बात को कोई और नहीं
स्वयं बुद्धिजीवी कहते हैं
मैंने डरते डरते पूछा
क्या आप और वो आपस में
रिश्तेदार सगे हैं?
जो पत्थर कश्मीर से आकर
दिल्ली को लगे हैं?

बोला, वो भी एक प्रकार के
परिश्रमी किसान हैं
फर्क इतना है कि उनके
भरे हुये खलिहान हैं
जिन्होंने देश की छाती पर
बँटवारे का हल चलाया है
जनमानस के ह्रदय में
नफरत का बीज लगाया है
सींचने के नाम पर
मासूमों का खून बहाया है
आज उनके परिश्रम से देखो
आतंकवाद लहलहाया है

सियासत ही हम दोनों को
जन्म देती आयी है
आपने ठीक पहचाना
वो मेरा सगा भाई है
आज उसी की प्रेरणा से
हम देश को जला रहे हैं
भोपाल से दिल्ली तक
किसी का रास्ता बना रहे हैं
अभी तो बहुत से मगरमच्छ
अश्कों की गंगा में बहायेंगे
हमारे काँधों पर चढ़कर
राजधानी तक जायेंगे
और हम जहाँ खड़े हैं वहीँ
खड़े खड़े मर जायेंगे

शास्त्रीजी ने हम को
जय किसान कहा था
तब किसान का ये अर्थ
किसी को पता कहाँ था?
हिंसक औलाद जनने से
एक माँ भी डरती है
शायद इसलिये आज बाँझ
हो चली ये धरती है
अपनी भूमि छोड़कर
पलायन को मजबूर है
गाँव का किसान आज
शहर में मज़दूर है

मैं सोच रहा हूँ,
हर उफान के पीछे
एक पीड़ा होती है
और हर पीड़ा पर इस देश में
राजनीतिक क्रीड़ा होती है
क्योंकि सियासत की दुनिया में
ये सिद्धांत खूब चलता है
फिर नहीं ऊगता वो सूरज
जो एक बार ढलता है
वो दिल्ली के मेले में गुम
होने से डरती है
सियासत तभी तो उन्माद का
हाथ थामकर चलती है

© - प्रशांत सेठ

Friday, June 2, 2017

त्रिशंकु

राख में दबी दबी सी
इक चिंगारी क्यों है?
तू अगर वैरागी है तो
मन संसारी क्यों है?

जैसे शाख का एक पंछी
आस करे नील गगन की
फिर नीड़ से प्रश्न करे वो
संग सोहबत में पवन की
एक परिंदे की तुझसे ये
नातेदारी क्यों है?
तू अगर...

उड़ने वाले जल्दी क्या है
मन कहता है और रुक ले
इन पाँखों का सौदा करके
पिंजरे का ही दाना चुग ले
तू अम्बर का राही है तो
मन व्यापारी क्यों है?
तू अगर...

इस असीम नभ की सीमा
है संशय कि हो ना हो
चल नीड़ के भीतर देखें
कदाचित कोई कोना हो
जहाँ मन से पूछ सके तू
व्यग्रता भारी क्यों है?
तू अगर...

प्रश्न खुद ही ले आयेगा
अपना उत्तर तेरे पास
कुआँ भी आता है चलकर
कभी कभी प्यासे के पास
इसी ठौर पे ठहर मन तू
पथ-पुजारी क्यों है?
तू अगर...

झाँक लिया निज अंतस में
जब अपने ही दृगकोर से
देह नीड़ से बँधा परिंदा
देख लिया मन की डोर से
क्या पूछना अब किसी से
मन मदारी क्यों है?
तू अगर...

© - प्रशांत सेठ