Tuesday, December 9, 2014

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते
रमन्ते तत्र देवता:

फिर व्यवस्था की अस्मत लुट गई। फिर बलात्कार हुआ समाज का, मेरा भी और आपका भी।

शील नारी का भंग नहीं होता। नारी तो स्वयं मान है समाज का। अपमान होता है समाज का। हम भी उस ही समाज का हिस्सा हैं इसलिए मर्यादा जो भंग हुई वो हमारी थी। ये हमारी और आपकी इज़्ज़त है जिस पर बुरी नज़र डाली जाती है। ऐसी घटनायें क्या इस बात का प्रमाण नहीं है कि अब हम अपने सम्मान की रक्षा करने में असमर्थ हो गये हैं?

सिर्फ क़ानून और व्यवस्था को दुरुस्त करने से क्या होगा? नज़रिया भी दुरुस्त करना होगा। इस बात को महसूस करना होगा कि समाज में प्रत्येक स्त्री हमारी अपनी इज़्ज़त की तरह है। ऐसी घटनाओं में जब तक हम अपना अपमान नहीं देखेंगे तब तक स्थितियाँ नहीं बदलने वाली।

अपने आस पास नज़र डालिये और देखिये कहीं ना कहीं कोई आपकी इज़्ज़त पर बुरी नज़र डाल रहा है। नज़रअंदाज़ करना इस कृत्य में शामिल होने के समान है। इसलिए नज़रअंदाज़ मत कीजिये, तमाशा मत देखिये। आज ही प्रतिकार कीजिये,  इससे पहले की देर हो जाये...

किसी का घर जला, हाथ सेक लिये
या हमदर्दी के चंद लफ्ज़ फेक लिये
लो निभा दिया हमने फ़र्ज़ यूँ अपना
आ गये सड़क पे मोमबत्ती एक लिये

चीखे कुछ चिल्लाये तस्वीर भी उतरी
घर को लौट गये सीरत नेक लिये

कल दफन होंगे फिर ये भी राख में
हैं अखबार आज जलते लेख लिये

बोली तंज़ कर हवायें यूँ हमसे
इस आग ने तेरे भी घर देख लिये

© - प्रशांत सेठ

सीरत = चरित्र, तंज़ = व्यंग

1 comment:

  1. ये वहा संभव है ........ जहा नैतिकता हर मकसद से ऊपर हो

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