ज़िंदा रखने को उम्मीद, इतनी आस काफी है
तुम वफ़ा करो ना करो सच में, ज़रूरी तो नहीं
हमारे ऐतबार को झूठा, एक एहसास काफी है
कद ऊंचा कर लो, किरदार ना होगा तुमसे
बाज़ीगरो, झूठे इश्तिहारों का बांस काफी है
करवट ली है ज़म्हूरियत ने, मतलब ज़िंदा है
नोंचो, इसके जिस्म में अभी मांस काफी है
रिस्ते हुए ज़ख्मो को कुछ और हरा कर दो
कुरेदो, इस के लिए मुल्क का इतिहास काफी है
मज़हब की बात करो, नफरत की बात करो
रोटी हो ना हो बारूद, हमारे पास काफी है
चरते चरते चर गये माना की पुरखे तुम्हारे
गधों के लिये मुल्क में फिलहाल, घास काफी है
© Copyright Regd. - प्रशांत सेठ
शुगूफा=दिखावा, इश्तिहार=विज्ञापन, ज़म्हूरियत=लोकतंत्र
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