मेरे ह्रदय में उपजा है ये प्रश्न कैसा
रह गया गणतंत्र किताबों में, ये जश्न कैसा
बदलेगी ये परिपाटी है विश्वास मुझे
जागो ऐ हिन्द वालो, अब नींद कैसी स्वप्न कैसा?
क़र्ज़ सर पर लिए तरुणाई अकर्मण्य खड़ी है
उत्सव में हो रहा ह्रदय किन्तु मग्न कैसा
पुरुस्कारों से प्रसन्न होती प्रतिभा से पूछो
भारत सर झुकाये खड़ा है भारत रत्न कैसा
प्रगति पथ पर तुम कहते राष्ट्र उदीयमान हुआ है
भूमिहीन मज़दूर किसान फिर नग्न कैसा
सत्ता लोलुप सदा सुनहरे स्वप्न दिखाते
यथार्थ से मुंह चुराता तुम्हारा प्रयत्न कैसा
किलकारी नहीं दहाड़ गूंजे सिंहनियों की कोख से
सिंह जने ना माँयें तब तक शुभ लग्न कैसा
स्वतंत्रता का लक्ष्य अभी कहाँ पूर्ण हुआ है
स्वाभिमान गिरवी रख कर संघर्ष ख़त्म कैसा
© Copyright Regd. - प्रशांत सेठ
रह गया गणतंत्र किताबों में, ये जश्न कैसा
बदलेगी ये परिपाटी है विश्वास मुझे
जागो ऐ हिन्द वालो, अब नींद कैसी स्वप्न कैसा?
क़र्ज़ सर पर लिए तरुणाई अकर्मण्य खड़ी है
उत्सव में हो रहा ह्रदय किन्तु मग्न कैसा
पुरुस्कारों से प्रसन्न होती प्रतिभा से पूछो
भारत सर झुकाये खड़ा है भारत रत्न कैसा
प्रगति पथ पर तुम कहते राष्ट्र उदीयमान हुआ है
भूमिहीन मज़दूर किसान फिर नग्न कैसा
सत्ता लोलुप सदा सुनहरे स्वप्न दिखाते
यथार्थ से मुंह चुराता तुम्हारा प्रयत्न कैसा
किलकारी नहीं दहाड़ गूंजे सिंहनियों की कोख से
सिंह जने ना माँयें तब तक शुभ लग्न कैसा
स्वतंत्रता का लक्ष्य अभी कहाँ पूर्ण हुआ है
स्वाभिमान गिरवी रख कर संघर्ष ख़त्म कैसा
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