Thursday, January 23, 2014

कानून मंत्री बनाम क़ानून

पिछले कुछ दिनों में दिल्ली के नए क़ानून मंत्री की कार्य प्रणाली देख कर लगता है कि वो शायद स्वयं को क़ानून से ऊपर समझ रहे हैं। ये निश्चित है की आम आदमी पार्टी का जन्म ही वर्त्तमान व्यवस्था के विरोध में हुआ है।  मौजूदा कानूनो पर अविश्वास को जनहित के आवरण में ढांक कर पेश करना लम्बे समय में लोकतंत्र के लिए घातक ही होगा। ठीक वैसे ही जैसा आज उत्तर प्रदेश और बिहार में देखा जा रहा है जहाँ राजनीतिक कार्यकर्ता स्वयं को कानून के ऊपर समझने लगे हैं।
देश के युवाओं और विशेषकर उस पीढ़ी के लिए जो जीवन का पहला वोट देने जा रही है, इस तरह के राजनीतिक संस्कार देना कहाँ तक उचित है। "आप" ने स्वयं ही आंदोलन से हटकर राजनीति का रास्ता चुना है। ऐसे में व्यवस्था बदलने के लिए लोकतांत्रिक पद्धति से उस स्थान को प्राप्त करना आवश्यक है जहाँ बैठकर "आप" वर्त्तमान व्यवस्था को बदल सकते हैं। जब तक "आप" वह स्थान प्राप्त ना कर लें तब तक इस प्रकार व्यवस्था को चुनौती देना अब आपका अधिकार नहीं है। क़ानून को हाथ में लेने का अधिकार तो तब भी नहीं दिया जा सकता जब आप सर्वोच्च पद पर होंगे।
इसके अलावा यह भी महसूस हो रहा है की व्यवस्था परिवर्तन तो बाद में होगा परन्तु भाषा परिवर्तन जरूर हो चुका है।  अव्यवस्था के प्रति आक्रोश और बात है और एक छोटी सी सफलता का अहंकार दूसरी बात है। लेकिन कार्यशैली में परिवर्तन होना अब शायद मुश्किल है, क्योंकि "आप" का अधिकाँश कार्यकर्ता उस युवा वर्ग से आता है जो अरविन्द केजरीवाल में "नायक" फ़िल्म के अनिल कपूर को देखना चाहता है। परदे पर तीन घंटे में हमें केवल वही परिस्थितियां बना कर दिखायी जाती हैं जो दर्शकों से तालियां बटोर सकती हैं।  परन्तु क्या वास्तविक जीवन में इस प्रकार यथार्थ को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है?

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