Monday, October 25, 2021

गांधीवाद बनाम भगवद गीता

गांधीवाद वास्तव में ऐसा दर्शनशास्त्र है जिसे स्वयं गांधी भी पूर्ण रूप से आत्मसात नहीं कर पाए, तो अनुयायियों से क्या अपेक्षा की जा सकती है। व्यवहारिक धरातल पर विफल यह दर्शन वास्तव में सफल था नहीं बल्कि सफल दर्शाया गया। और सरकारी संरक्षण प्राप्त होने के कारण इसे सफल दिखाने में कोई कठिनाई भी नहीं हुई।

गांधीवाद वास्तव में राजनीतिक दृष्टिकोण से सफलता का सूत्र है क्योंकि यह जनमानस के आक्रोश को ठंडा करके बहलाने फुसलाने के लिये सर्वोत्तम अस्त्र है। परंतु यह गांधीवाद राष्ट्रनीति के दृष्टिकोण से घातक है क्योंकि यह अन्याय अधर्म के प्रति विरोध की मानसिकता को समाप्त करके नपुंसकता उत्पन्न करता है। पिछले 70 वर्ष के इतिहास में इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति होती है।

गांधीवाद वही अर्जुन विषाद रोग है जिसका उल्लेख भगवद गीता के प्रथम अध्याय में मिलता है। शेष सत्रह अध्याय इस रोग के उपचार के लिए ही भगवान श्रीकृष्ण ने कहे हैं। कहने की आवश्यकता नहीं है की भगवद गीता एक उच्च कोटि का दर्शन है जिसके सामने गांधीवाद अत्यंत बौना और अव्यवहारिक दर्शन है।

गांधीवाद से प्रभावित वही लोग हैं जिन्होंने गीता का ठीक से अध्ययन नहीं किया है। ये वही लोग हैं जो किसी भी दर्शन की दूर से उपासना तो करते हैं परंतु आत्मसात करने का लेशमात्र भी प्रयास नहीं करते। यही कारण है कि दिखावे के लिए गाँधी के अनुयायी तो लाखों मिल जाएंगे, परंतु आधी धोती पहनकर भौतिक महत्वकांक्षाओं का त्याग करते इनमें से कोई नहीं दिखता है। वहीं एक गाल पर थप्पड़ खाकर दूसरा गाल आगे करने वाले केवल मुन्नाभाई ही मिले, वो भी फिल्मी पर्दे पर।

यदि किसी दर्शन को आत्मसात करने का प्रयास निष्ठापूर्वक किया जाए तभी उसके व्यवहारिक गुण दोष प्रकट होंगे। परंतु दुर्भाग्य से अधिकांश लोगों ने गांधीवाद की सिर्फ उपासना की है, जीवन में प्रतिष्ठित करने की चेष्टा नहीं की। तभी तो यह किसी के आचरण में परिलक्षित नहीं होकर केवल कुछ शातिर लोगों का अपनी कायरता एवं हृदय की कालिमा को ढाँकने का लबादा मात्र बनकर रह गया है। वहीं जिन गिनती के लोगों ने गांधीवाद को आत्मसात करने का साहस किया है, उन्हें इस दर्शन के व्यवहारिक दोष शीघ्र ही समझ में आ गए। उदाहरण के लिए सरदार पटेल, नेताजी, इत्यादि। जिन लोगों में स्वाध्याय का स्वभाव नहीं था वो गांधीवाद को निष्ठापूर्वक ढोते रहे हैं और परिणामस्वरूप कुंठित, असफल और भ्रमित जीवन जीकर निकल गए; परंतु स्वाध्याय की कमी के चलते कुंठा और असफलता का कारण अपने भीतर नहीं ढूंढ पाए। ज्ञात रहे कि स्वाध्याय के अभाव में व्यक्ति अपनी असफलताओं का दोष परिस्थितियों पर अथवा दूसरों पर मढ़ने की प्रवृत्ति अपना लेता है और वास्तविक कारण को नकार देता है। जबकि भगवद गीता के सिद्धांतानुसार व्यक्ति अपने स्वयं के कर्म फल ही भोगता है, किसी अन्य के नहीं।

राजनीतिक प्रपंच के चलते आज गांधी के विरोध को लोग गोडसे का समर्थन सिद्ध करने लगते हैं जिसकी वजह से एक ऐसे माहौल का निर्माण हुआ है कि लोग खुलकर गांधीवाद के दोषों पर चर्चा करने से बचते हैं। मेरा स्पष्ट रूप से मानना है कि गांधीवाद का विरोध यानि गोडसे का समर्थन कदापि नहीं है, वरन् श्रीकृष्ण के गीता दर्शन का समर्थन है।

अहिंसा परमो धर्म:
धर्म हिंसा तथैव च

- प्रशांत सेठ

Tuesday, May 25, 2021

सफेदपोश

एक व्यंग लेख

हमारे प्रिय मित्र हैं Shirish Gontiya  "उजड्ड"। श्रेष्ठ व्यंगकार भी हैं और रंगमंच के कलाकार भी। अब आप पूछेंगे कि व्यंगकार हैं तो मित्र नहीं हो सकते, क्योंकि व्यंगकार तो किसी को भी नहीं बख्शता। परंतु शायद आप नहीं जानते कि एक व्यंगकार दूसरे व्यंगकार के प्रति हमेशा सहिष्णुता का परिचय देता है। इनका नाम स्वामी उजड्ड आनंद रखने का हमारे पास दो कारण हैं। पहला ये कि इन्होंने उजड्डता के मार्ग पर चलकर आनंद प्राप्त करने का संकल्प लिया है, जिसकी वजह से नगर के राजनीतिक हलकों में इन्हें प्रातः निंदनीय एवं सांध्य कुटनीय का सम्मान प्राप्त है। दूसरा ये कि इन्हें सुबह सुबह एक विशेष किस्म का प्रेशर बनता है। इस प्रेशर को ये मुझे एक छोटा सा  "मॉर्निंग प्रवचन" देकर रिलीज़ करते हैं। ये तो प्रेशर रिलीज़ करके निकल लेते हैं परंतु दिन भर के लिए उक्त प्रवचन में छुपे गूढ़ रहस्य को खोजने का प्रेशर मुझपर आन पड़ता है।

स्वामीजी की यह प्रवचन सिद्धि एक दिन अकस्मात एक अलौकिक घटना के पश्चात प्रकट हुई। हुआ यूं कि एक दिन ये अपनी बुलेट मोटरसायकिल समेत नगर के गटर में मेनहोल के रास्ते समा गए। इस घटना में उनके उस प्रदेश पर चोट लगी जहाँ अमूमन व्यंग्यकारों की अक्ल रहा करती है। इनकी छठी इंद्री जाग गई और गटर में इन्हें समाज की गंदगी का दिव्य दर्शन प्राप्त हुआ, जिससे इनके भीतर की उजड्डता और प्रखर हो गई। तभी से ये मुझे अपनी कृपा स्वरूप सुबह सवेरे एक प्रवचन पेल कर चल देते हैं और शाम तक उसकी बखिया उधेड़ने का आदेश भी दे जाते हैं।

तो अभी दो दिन पूर्व के इनके प्रवचन और उसकी बखिया पेश है
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मोर्निंग प्रवचन

सच्चा ज्ञान हल्दी की गांठ की तरह होता है उसे आप दूध में डालकर अपनी इम्युनिटी तो बढ़ा सकते हैं पर चबा का हज़म नहीं कर सकते।

- उजड्ड वाणी
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प्रवचन बखिया

स्वामीजी कहते हैं कि ज्ञान वह होता है जो सत्य से परिचय करवाये, शेष सब अज्ञान है। परंतु सत्य कड़वा भी होता है और हल्दी की तरह गरिष्ठ भी। अतएव जिस प्रकार हल्दी को दूध के साथ लेने पर ही हजम करना संभव होता है, उसी प्रकार स्वामीजी के प्रवचन को हमारी बखिया के बिना लेने पर आपका हाजमा बिगड़ सकता है।

परंतु स्वामीजी को मॉर्निंग में उत्पन्न होने वाले प्रवचन रूपी प्रेशर का केवल इतना सरल अर्थ नहीं होता। यहाँ स्वामीजी इशारों में गूढ़ रहस्य की ओर इंगित करते हैं। आप सभी जानते हैं कि हल्दी पीली होती है और वाणिक समाज में पीले का अर्थ स्वर्ण धातु से होता है। अर्थात यहां धनार्जन की प्रक्रिया की ओर स्वामीजी इशारा करते हैं।

आप सभी जानते हैं और स्वामीजी भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि वर्तमान युग मे ईमानदारी की आय से आवश्यकता की पूर्ति भर हो सकती है, ऐश्वर्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। अपना धन टैक्स से बचाने के बाद सरकारी अफसर, क्षेत्रीय माफिया, पुलिस, मीडियाई माफिया, नेता, जज और वकीलों की कृपा से ही आप ऐश्वर्य को प्राप्त कर सकते हैं। इस सत्य को जानने वाले काला-पीला करने की कला जल्दी ही सीख लेते हैं। परंतु समस्या ये है कि काले के साथ पीला लेने पर एक दिन हाजमा बिगड़ ही जाता है और सारा पीला अन्य रास्ते से निकल कर वापस पंचतत्वों में विलीन हो जाता है। उदाहरण के लिए देख लीजिए, विजय माल्या से लेकर हमारे मोहल्ले के कालिया तक सभी आज गालियां खा रहे हैं, मेरा मतलब है कि बदहजमी की गोलियां खा रहे हैं।

स्वामीजी इशारों में कहते हैं कि इसी पीले को अगर सफेद की साझेदारी मिल जाये तो सब हजम हो जाता है। यही कारण है कि सफल व्यक्ति हमेशा किसी सफेद खद्दरधारी के संरक्षण में रहता है। यह गठजोड़ आश्चर्यजनक रूप से और शीघ्र सफलता प्राप्त करने का अचूक नुस्खा है। तब आप अवैधानिक कार्य को भी वैधानिक पद्धति से कर सकते हैं। वहीं यदि आपका गठजोड़ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के किसी नेता से है तो उक्त कार्य को संवैधानिक तरीके से भी किया जा सकता है। इस प्रकार आप पीले को आसानी से हजम कर सकते हैं और समाज भी आपको डाइजेस्ट कर लेता है। यदि भाग्य के सितारे अधिक प्रबल हुए तो आपको लोग देवता भी मानने लगते हैं।

इस बात को निम्न उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। हमारे शहर के एक अस्पताल संचालक काले के साथ पीला कर रहे थे तो नकली इंजेक्शन के मामले में फंस गए। वहीं कुछ लोग असली इंजेक्शन और अस्पताल के बेड को ही ऊंचे दामों में बेचकर ऐश्वर्य भोग रहे हैं। यह हुई वैधानिक पद्धति।

यदि और गहराई में देखें तो यह इंजेक्शन उक्त बीमारी का इलाज करने में असफल मानकर WHO ने उसे अपनी उस लिस्ट से हटा दिया, जिसे WHO ने कुछ माह पूर्व स्वयं ही जारी किया था। लेकिन लिस्ट से हटाने के पहले ही, उच्च स्तरीय सफेद के गठजोड़ से बड़ी फार्मा कंपनियों ने अच्छा खासा पीला हजम कर लिया। इसको स्वामीजी संवैधानिक पद्धति बताते हैं। यह पद्धति दो देशों को लड़वाकर हथियार बेचने से लेकर, कौड़ियों के दाम में कीमती जमीन अलॉट करने, निजी भवनों को अपनी ही सरकार को ऊंचे किराए पर देने, मीडिया को सरकारी विज्ञापन देकर खरीदने, भय का माहौल बनाकर उत्पाद बेचने और गमलों में गोभी उगाकर करोड़ों रुपये कमाने तक में काम आती है। सरकारी सब्सिडी, वजीफे और अनुदानों को वर्ग विशेष के लोगों को भी संवैधानिक तरीके से बांटा जा सकता है और संवैधानिक रूप से ही नोट के साथ वोट भी कमाये जा सकते हैं। स्वामीजी यह भी बताते हैं कि सफेद की आड़ में पीला पचाने वाले लक्ष्मीपुत्रों को ही शास्त्रों में सफेदपोश कहा गया है।

- ठेठवाणी फ्रॉम प्रशांत सेठ

Wednesday, October 28, 2020

हे आदिशक्ति! हे जगजननी!

प्रकृति के गर्भ में अपने जन्म की प्रतीक्षा में एक चिरपंथी की प्रार्थना ...

हे आदिशक्ति! हे जगजननी!

चलता रहा युगों से पर अब
रहा समर्थ ना चल पाने को
किसी वृक्ष की घनी छाँव में
ठहर गया तब सुस्ताने को

थकी देह कुछ क्षण बैठी पर
मन का पथिक नहीं रुक पाया 
हे माँ! तेरे गर्भ में फिर से
यह चिर पंथी वापिस आया 

सौंप पिता की गोद में मुझको
जिस क्षण तू मुस्काई थी
अमर सनातन जीव को फिर से
देह नयी मिल पाई थी

यही अधूरापन ही मुझको 
फिर फिर दुनिया में लाया है
देह शेष, निःशेष कामना
जननी! ये कैसी माया है?

सोच रहा यह पथिक आज फिर,
बैठा बोध वृक्ष की छाँव
युगों युगों तक चलते चलते
थके नहीं इस मन के पाँव

गंतव्य क्या? अभी तो सच्चा
पथ ही नहीं दृष्टि में आया 
पितृ मिलन की व्याकुलता में
क्षीण हुई अब फिर से काया 

धारण किया गर्भ में प्रकृति
ने स्वरूप जो मानव तन का
सुप्त पड़ा क्यों मोह पाश में
अंश हूँ मैं ही जब चेतन का

कितने पथिक गए इस पथ से
विरला कोई समझ पाया है
मातृ कृपा बिन कब कब किसने
यहाँ शाश्वत जन्म पाया है

अपूर्णता को पूर्ण बना
अब अंश पुरुष का लौटा दे
परम पिता की गोद मुझे दे
प्रकृति तू फिर मुस्कुरा दे

मैंने चिरकाल से जागृत
शिव को प्रतीक्षित पाया है
हे आदिशक्ति! हे जगजननी, तू
जन्मदात्री महामाया है

© - प्रशांत सेठ



Tuesday, October 27, 2020

दृष्टा

मैंने पढ़ा था कभी,
प्रकाश की किरण 
करती है गमन सीधी रेखा में  
और बदल लेती है कोण
एक माध्यम से दूसरे माध्यम तक जाते जाते,
घनत्व में भेद के प्रभाव से

बहुत तो नहीं, 
किंतु समझ ली थी बचपन में ही
यह छोटी सी बात
कि
किसी वस्तु को जानने के लिए
देखना पड़ता है, 
उसे भिन्न कोणों से
समग्र दृष्टि से

आज भी
विषय वस्तु पर पड़ने वाले
अलग अलग दृष्टिकोण को
देख लेता हूँ मैं,
चैनल बदल बदल कर

मुझे पता है
मसले क्यों बदल लेते हैं कोण 
सोशल मीडिया पर
एक प्रोफाइल से दूसरी प्रोफाइल तक

मैं जानता हूँ
तुम्हारे ज्ञान का आधार है
तुम्हारी बुद्धि में "ग्रे मैटर" का घनत्व
जितना अधिक घनत्व
उतना ट्विस्टेड सत्य

तभी तो बहुत से बुद्धि-जीभी
ज़िंदगी जी नहीं पाते
चल देते हैं उम्र गुज़ारकर
अनुभव के नाम पर, 
दृष्टिकोण में उलझकर
और अक्सर, 
पीढ़ियों को उलझाकर
किसी नए "वाद" में

© - प्रशांत सेठ







Tuesday, October 6, 2020

सॉरी बापू

जमूरे!!
बुरा मत देखो
बुरा मत सुनो
बुरा मत बोलो

और मैंने मूंद ली आंखें
बंद कर लिए कान
सी लिया अपने होठों को
मेरे आस पास चुपचाप
वो पैर पसारती रही ...

जमूरे!!
जब तक मैं ना कहूँ
आँख मत खोलना
बाहर बहुत बुराई है
अपने भीतर उतर जा,
समाधि लगा ले, संत बन जायेगा

मगर एक दिन
आँख खुलनी थी, सो खुल गई
मैंने पूछा उससे
तू यहाँ कैसे, मेरे बापू के हिंदुस्तान में?
हंसकर बोली, अपने बापू ने कब कहा?
"बुरा मत करो"

अब मैं, बुरा देख लेता हूँ
बुरा सुन भी लेता हूँ
सच पूछो तो, बुरा सूंघ भी लेता हूँ
और बुरा बोलने लगा हूँ उसे
मेरे आसपास फटकने से पहले
दस बार सोचती होगी वो, क्योंकि
मैं बुरा लगने लगा हूँ अब
खुद बुराई को ही

क्षमा करना बापू
मैंने सीख लिया है,
चरखे के साथ साथ, लाठी चलाना
और हाँ!
चलाने लगा हूँ थोड़ा थोड़ा
स्कूल की किताबों से परे
अपना दिमाग भी

सॉरी बापू
तुम्हारा जमूरा शायद
सचमुच भीतर उतरने लगा है

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, August 18, 2020

बृजबाला

सब कुछ नहीं होता शब्दों से
परिभाषित
शुद्ध प्रेम में नहीं होता संसार
अभिलाषित

संसार की व्यवहारिकता से परे
गोपियों के निश्छल प्रेम की तरह
भाव समक्ष मूक हो जाती हैं
समस्त भाषाएं

© - प्रशांत सेठ


Monday, August 17, 2020

शबरी

सब कुछ देखा नहीं जा सकता
इन आँखों से
सब कुछ सुना नहीं जा सकता
इन कानों से

बुद्धि की असहजता से बहुत दूर
शबरी के जूठे बेरों की तरह
भक्त और भगवान का सहज प्रेम
विषय है केवल अनुभूति का

© - प्रशांत सेठ