कोई पूछेगा तुमसे
दो और दो कितने होते हैं
तुम कह दोगे झट से,
चार!!
क्योंकि
तुम्हारी दुनिया चलती है
नाप तौल, जोड़ तोड़, गुणा भाग से
तुम देखते हो खुली आँखों से
दृश्य को
मुझसे मत पूछना
दो और दो कितने होते हैं
मैं झाँकूंगा बंद आँखों से
अतीत के झरोखे में
जहाँ दिखाई देगी एक रसोई
उसमें धधकता चूल्हा
और गर्म आँच में तपता
"माँ" का वात्सल्य
जब मैं कहूँगा
माँ ! दो, और दो
वो कहेगी "ले और ले"
ना मालूम कैसे
अंतिम रोटी हो जाएगी
पहले से दुगनी
रोटियाँ अक्सर हो जाती हैं
दो और दो पाँच
माँ के हाथ से
क्योंकि "प्रेम" के समक्ष
गणित नहीं ठहरता
खुली आँखों से दुनिया को देखा
तो "कविता" होगी ना "प्रेम"
बंद आँखों से टटोलो
मन के किसी कोने में दबी
एक प्यारी सी स्मृति
किसी प्यारे से रिश्ते की ...
प्रेम वही है जो ठहर जाए हृदय में
किसी के जाने के बाद भी
© - प्रशांत सेठ

Bhut khoob maa se badh kar koi nahi
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