Sunday, January 25, 2015

खोया हुआ है जो भी... इस मौसम पुकार लो !!

कुछ रिश्ते ज़रा सी ज़िद में दूर हो जाते हैं। ज़िन्दगी नदी के दो पाटों की तरह साथ तो चलती है, मगर मिलती नहीं। बीच में अहंकार की सर्द नदी जो बहती है।

हो सकता है आपके जीवन में भी कोई ऐसा रिश्ता हो। देर मत करो, बस पुकार लो। एक क्षण, मात्र एक क्षण में खोया हुआ सब कुछ मिल सकता है ...

कुछ तो हुआ है खाली, तेरे चले जाने से
कुछ है जो रोकता है, तेरे पास आने से ।
बेमानी सी इस अना को लेकर मैं क्यों चलूँ
मिल सकती है ज़िन्दगी एक दीवार गिराने से ।।

वैसे भी वसंत ऋतू यानि प्रेम का मौसम। सर्दियों से गर्मियों की ओर बढ़ने का मौसम। क्या कुछ सर्द हो चुके रिश्तों में गर्माहट लाने का यही सर्वोत्तम समय नहीं है?

कंपकंपाती तन्हाई है, तुम संवार दो
हो सके तो धूप का एक कतरा उधार दो ।
दरमियां-ए-दिल जब बाकी हैं गर्मियां
एहसासों से ज़िद का स्वेटर उतार दो ।।

© - प्रशांत सेठ

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