आज 31 जुलाई को मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती पर, उन्हें ही तलाश करने के प्रयास में, एक छोटी सी गुस्ताख़ कलम...!!!
"मुंशी जी"
मैंने पढ़ा है तुम्हें
उम्र के उस दौर में जब
देखे सुने पढ़े को ही सच
समझ लिया करता है निश्छल बचपन
जब कहानी के पात्र चुपके से
बैठ जाते हैं छुपकर अचेतन में कहीं
और मन की कच्ची मिट्टी से धीरे धीरे
कुशल शिल्पी की तरह गढ़ते हैं
दृढ़ चरित्रों को
यकीन मानो
जीवन का सारा गणित
बिगाड़ के रख देता है
तुम्हारा साहित्य
वक़्त जब खड़ा कर देता है
धर्म अधर्म के दोराहे पर
और माँगता है निर्णय सही गलत पर
तभी, लाभ हानि के चिंतन से परे
मेरे भीतर कोई "पंच परमेश्वर"
ले लेता है मोल
किसी "जुम्मन" की नाराज़गी
खो देता है तुम्हारा "अलगू चौधरी"
सत्य के मार्ग पर
एक और रिश्ता
ज़िन्दगी
जब भी देती है अवसर आगे बढ़ने का
और माँगती है एक छोटी सी कीमत
ज़रा देर को आँख मूँद लेने की
उस तरफ से
जहाँ से प्रवेश करते हैं समाज में
झूठ और अनीति
तभी खड़ा हो जाता है द्वार पर अड़कर
एक "नमक का दरोगा"
और खो देता है "मुंशी वंशीधर"
कर्तव्य की राह पर
फिर एक अवसर
आज भी मन की "ईदगाह" में
दुविधा के द्वार पर खड़ा "हामिद
सोचता है
दुनिया के मेले में, मुट्ठी भर साँसों से
क्या खरीदूँ?
दिल बहलातेे ये खिलौने, या
मुझे पोषित करते
तुम्हारे बूढ़े आदर्शों को खुश करने
फिर वही त्याग रूपी "चिमटा"
मैं जानता हूँ
खो बैैठेगा हामिद एक बार फिर
प्रेम की राह पर
जीवन भर की पूँजी
और तब यथार्थ के धरातल पर खड़ा
हाथ में चिमटा लिये
तुमसे पूछेगा
मैंने तुम्हें पढ़ा ही क्यों?
और तुमने मुझे गढ़ा भी क्यों?
अवसर, रिश्ते, पूँजी खोकर क्या पाते हैं?
वो लोग जो तुम्हारे पात्रों को जी जाते हैं?
क्योंकि, इस संसार मे जहाँ
जीवन भर मानवता के "गबन" में लिप्त लोग
अंत समय "गोदान" के उपाय से
"प्रायश्चित" की अवधारणा लिये बैठे हों
और इस पाखण्ड पर मौन साधे
कबरी नहीं, समाज की सफ़ेद बिल्लियाँ
चालाकी से निश्चेष्ट पड़ी हों
वहाँ, इतना आसान नही है
ऐसे किरदारों को जीना
"कर्मभूमि" पर "बोध" के फूल खिलाना
फटे जूतों में मुस्कुराना
और
और "धनपत" से "प्रेमचंद" हो जाना
© - प्रशांत "सेठ"