Thursday, May 3, 2018

श्रमिक कथायें

1
ज्यूँ अधूरा गीत कोई
होठों पर आकर ठहर गया
एक स्वप्न चला गाँव से
मर गया जब शहर गया

थकन दर्द चुभन रस्तों की
दूर थी सब पाँव से
तरुण स्वप्न लिये शंकर
निकला था जब गाँव से
भोर उमंगें दी सूरज ने
और लील दोपहर गया
एक स्वप्न चला  ....

तपता सूरज पी जाता है
एक समंदर हौले हौले
स्वप्न आँख से उड़ जाते जब
भूख अंतड़ियों में खौले
दौड़ती है देह अब भी
मन कहीं ठहर गया
एक स्वप्न चला ....

शाम चढ़कर झुकी पीठ पे
नन्ही ज़िद जब सैर चली
तोड़ सपनों के पंख ज़िन्दगी
ज़रूरतों के पैर चली
निज अंश के मोह में पड़कर
निश्चय वहीँ ठहर गया
एक पुड़िया छुपा रखी थी
जाने कहाँ वो ज़हर गया
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2
दुनिया के प्रथम श्रमिक ने
देख स्वप्न किया निर्माण
और रचकर सृष्टि उसने
फूँक दिये मिट्टी में प्राण
दृष्टा बनके देखा जब तो
मन पीड़ा से भर गया
एक अधूरा गीत ....

बन गये स्वार्थ के पुतले
मेरे ये मानस अवतार
निराकार मैं सुख में था
व्यर्थ ही हुआ साकार
ह्रदय में दुःख का सागर
उठता लहर लहर गया
एक अधूरा गीत ...

फिर तांडव नृत्य करूँ या
प्रलय से कर दूँ हाहाकार?
या जगत को देकर विष ही
सृष्टि का कर दूँ संहार?
निज रचना के प्रेम में बंधकर
निश्चय किन्तु ठहर गया
एक अधूरा गीत ....

तब चिंतन के मंदराचल से
मथा उसने सागर मन का
अमृत रुप फल श्रम का
दिया जग को पसीना तन का
और कंठ में खुद शंकर के
विष उतरा और ठहर गया
एक अधूरा गीत ....
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अपने श्रम का अमृत देकर
विष स्वयं पी जाता है
वही शिव का अंश जगत में
वही श्रमिक कहलाता है
पूंजीवाद की हवेली थामे
श्रम नींव में गहरा है
वो अधूरा गीत आज भी
होठों पर ही ठहरा है

© - प्रशांत सेठ

Saturday, March 3, 2018

एक रंग प्रेम का

प्रकृति यानि विविधता, विविधता यानि अनेक रंग, कुछ पसंद कुछ नापसंद। होली इन सारे रंगों को स्वीकार करने का दिन है। इस विराट सृष्टि में सिर्फ "मैं" और "तू" का रंग नहीं है, और भी बहुत से रंग हैं। ये "मैं" और "तू" मिल जायें तो "हम" बनता है, ना मिलें तो "तू तू मैं मैं"।

"मैं" और "तू" में लिप्त जीवन
उत्सव का नहीं ये ढंग है
"हम" होकर ही तुम जानोगे
सृष्टि रचती कितने रंग है

अपनी अपनी दृष्टि का सत्य
मुझको प्यारा तुमको प्यारा
अहम् की इस एक लकीर ने
रिश्तों में किया बँटवारा
क्यों ह्रदय द्वार पर बैठे
द्वेष घृणा के ये भुजंग हैं
"हम" होकर ही ....

घर परिवार या कुटुम्बी बस
इतना ही तुम समझे अपना
अपनेपन की सीमा विस्तृत
करने की तैयारी रखना
फागुन तुमसे फिर पूछेगा
बैर बड़ा या क्षमा दबंग है
"हम" होकर ही ....

माटी का घट बन के माटी
इक दिन कण कण जा बिखरेगा
देह चढ़ा रंग भी उस दिन
उतरना है सो उतरेगा
मन पर अमिट रंग चढ़ा कर
उड़ने दो के मन पतंग है
"हम" होकर ही ....

खुद में सारे रंग समेटे
श्याम रंग रंगा घनश्याम
जिसके सारे रंग समर्पित
वो गोरी राधा निष्काम
रंग प्रेम का इनसे पाया
जिसने भी वही मलंग है
"हम" होकर ही ....

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, February 28, 2018

जीत का मनोविज्ञान

कभी देता है सफलता
कभी देता है वो ज्ञान
समय बुरा नहीं होता बंधु
तुम ही नहीं सके पहचान

लक्ष्य पाया है उन्होंने
पार गये जो विरोधों से
संकल्पों को मिलती दृढ़ता
जीवन में अवरोधों से
दोष ना देकर बाधाओं को
उनका भी करो सम्मान
समय बुरा .....

विफलता में छुपे सबक से
ज्ञान की बढ़ जाती पूँजी
कहीं द्वार जब बंद मिले तो
अनुभव ही बन जाता कुँजी
गिरकर उठना हर ठोकर पर
सफलता का यही सोपान
समय बुरा .....

लक्ष्य से नित घटती जाती
हर कदम के साथ दूरी
नहीं होती एक दिन में
किसी साधक की साध पूरी
त्रुटियों को छोड़कर पीछे
निखरते हैं चरित्र महान
समय बुरा .....

हताशा के घने तिमिर में
जलाये रहो आशा का दीप
धीरज से गढ़ पाती है
एक मोती कोई सीप
गहराई के बल पर वृक्ष
छू पाते हैं आसमान
समय बुरा .....

© - प्रशांत सेठ

अहमक

मीडिया हो या बॉलीवुड, ये कुछ नहीं सिर्फ व्यापारी हैं। ये वही बेचते हैं जो हम खरीदते हैं। एक अदाकारा कैसे मरी या किसकी अदाओं पे ये देश मर रहा है, ये गंभीर सवाल हैं। सरहद पर कौन कब क्यों मर रहा है उसपर इतना संजीदा होने की क्या ज़रूरत है?  ये सेलिब्रिटी नहीं होते। ये तो कुछ पागल होते हैं जिन्हें मुल्क से मोहब्बत हो जाती है। और पागलों के लिये कौन रोता है?

अहमक

ठुमकने पर, ठुनकने पर, ये मरते हैं इशारों में
ये ऐसा मुल्क है याँ लोग, मरते हैं अदाओं में
हिलाये भौहें कोई नाज़नीं, तो लाखों मर जायें
वो अहमक हैं जो मरते हैं, सरहद की वफाओं में

© - प्रशांत सेठ

Saturday, February 24, 2018

The Gene Theory

मैंने पढ़ी थी कभी
मेंडेल की जीन थ्योरी
जिसके अनुसार
माँ-पिता से हस्तांतरित होते हैं
संतान में संस्कार
मुझे पता है
संस्कारों से ही मिलती है दृष्टि
दृष्टि से चिंतन
और चिंतन से मिलती है
जीवन को दिशा
तो एक दिन
मैंने पूछ ही लिया उससे ...

बुद्धिमत्ता
जब हो जाती है व्यभिचारिणी
तब होता है संसर्ग
कभी स्वार्थ से
कभी अहंकार से
और कभी महत्वाकांक्षाओं से
इनके संस्कार से
बुद्धि जब देखती है संसार को
लाभ-हानि के गणित से
तब पाती है औरों में
अपना प्रतिद्वंदी
फिर शुरू हो जाती है
जीवन में स्पर्धा
और खो जाती है बुद्धि
कामनाओं के लौकिक जंगल में

बुद्धिमत्ता
जब होती है अहिल्या सी पवित्र
तब करती है निश्छल प्रेम
ह्रदय में विराजमान
परमेश्वर से
इस मिलन से उत्पन्न बुद्धि
नहीं जानती गणित लाभ-हानि का

वो करती है चिंतन
सही-गलत का
धर्म और अधर्म का
तब सम्पूर्ण सृष्टि में समा जाता है
"मैं" का अस्तित्व
दिखने लगता है हर जीव में
अपना ही अक्स
उतरती है जीवन में
सबके प्रति
भेद रहित स्वीकार्यता
और बुद्धि बढ़ने लगती है
जिज्ञासा का हाथ थाम कर
सत्य के मार्ग पर

कुछ प्रश्नों को माना
हल कर देती हैं विवशतायें
प्रश्न को ही मारकर
फिर भी उस दिन
मैंने पूछ ही लिया
ज़िन्दगी के अस्पताल में
अनुभवों के पलंग पर
चिंतन की प्रसव वेदना से पीड़ित
अपनी बुद्धिमत्ता से
बता, तेरी कोख से जन्म ले रही
इस बुद्धि का जनक कौन है?

© - प्रशांत सेठ

Saturday, February 3, 2018

वो बच्चा किधर गया?

ना मालूम कब कैसे ये मंज़र गुज़र गया
मासूमियत के सीने से खंजर गुज़र गया

बेफिक्री, वो जिंदादिली, मिट गया बचपन
मै पनपता रहा बाहर, अन्दर गुज़र (मर) गया

दौलत शोहरत कामयाबी अजब दौड़ थी
जितना उठा ऊपर, उतना मैं गिर गया

तुम हवस को मेरी तरक्की का नाम दे दो
मेरी तिश्नगी को देख, समंदर भी डर गया

इन ख्वाहिशों की मगर कोई हद नहीं होती
इनके पीछे चल कर सिकंदर भी मर गया

जिस्म-ओ-जहाँ का खेल, नाहक हो तुम परेशाँ
कभी ख्वाब बिखर गया, कभी जिस्म बिखर गया

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, January 16, 2018

अपने अपने चश्मे

मन पर पहले से रंग चढ़े हैं
तब हमने ये अर्थ गढ़े हैं
सत्य अन्वेषण की राह में
जहाँ खड़े थे वहीँ खड़े हैं

समग्र नहीं है दृष्टि ही जब
रहस्य खोले क्या सृष्टि भी तब
समझ की सीमित इस परिधि में
कैसे हो ज्ञान वृष्टि भी अब
महासमुद्र में तैर रहे ज्यों
मिट्टी के एक खाली घड़े हैं
सत्य अन्वेषण की...

शब्दजाल में उलझे मन को
निहित अर्थ स्वीकार नहीं है
अपनी अपनी है परिभाषा
सत्य से सरोकार नहीं है
हरे भगवा रंग में रंगकर
ग्रंथ तुमने और हमने पढ़े हैं
सत्य अन्वेषण की....

तृण जितना आकार लिये हैं
पर्वत सा अहंकार किये हैं
हम अपने अस्तित्व को ऊँचा
गौण सारा संसार किये हैं
उसपर बुद्धि के द्वार पर
हठ के ये द्वारपाल अड़े हैं
सत्य अन्वेषण की....

समय काल परिस्थिति में ढलकर
थम जाते हैं कदम दो चलकर
जिज्ञासा के खरगोश भी जब
चल नहीं पाते लगन के बल पर
वही पहुँचे हैं सत्य तक जिनके
धैर्य के कछुये लक्ष्य से बड़े हैं
सत्य अन्वेषण की...

© - प्रशांत सेठ