हो सके तो कलम में फिर धार करो
उठो हे समाज के सृजक, प्रहार करो
रुदन ना करो अन्य के दोषों पर आज
तुम स्वयं शिल्पकार हो, स्वीकार करो
ना किसी नाम विशेष पर टिपण्णी है, ना ही ये किसी की निंदा है। क्योंकि दूर बैठकर किसी के मन के भाव को जान लेने का सामर्थ्य मुझमें नहीं। यह केवल एक प्रयास है कर्तव्यबोध का।
विरोध क्यों और किसका? जब हम स्वयं इस समाज के निर्माता हैं। सत्ता में कोई भी रहे वह तो जनता की छाया मात्र है। लोकतंत्र है इसलिये यथा प्रजा तथा राजा। दोषारोपण करना साहित्य का काम नहीं है। साहित्य का काम है सत्य का दर्शन करना और कराना और साथ ही भविष्य का निर्माण करना।
एक आहत व्यंग
आज टीवी न्यूज़ थी ब्रेकिंग अर्थात तोड़ने वाली
एक और साहित्यकार के पुरुस्कार छोड़ने वाली
सबकी तरह हमने भी मानसिक मंजन किया
सोने से पहले कुछ औपचारिक चिंतन किया
नींद में अचानक हमारे अंदर के लेखक ने पुकारा
हे ज्ञानपुंज, हे सिद्धांतवादी, हे वर्तमान युग के नाकारा
सारे देश में चारों तरफ हाहाकार हो रहा है
और एक स्वयंभू साहित्यकार सो रहा है?
उठो किसी का समर्थन करो या विरोध करो
बना नहीं सकते तो उत्पन्न अवरोध करो
परिचय दो संसार को अपनी विद्वता का
कर्म के वृक्ष पर अमरबेल की लता का
मैंने कहा देव, मैं ना किसी के समर्थन में हूँ ना ही विरोध में
मैं साहित्यकार भी नहीं हूँ, बस जिज्ञासु हूँ सत्य के शोध में
एक बात ये भी है, कुछ मिला ही नहीं तो छोड़ूँगा क्या?
मैं नंगा अगर नहा लूँगा तो फिर निचोड़ूँगा क्या?
वो बोले तुझे ले चलता हूँ एक विचित्र संसार में
गीत ग़ज़ल शायिरी और साहित्य के बाज़ार में
देख कितनी दुकानें हैं यहाँ, बड़े बड़े नाम हैं
जो साहित्य के रावण हैं मगर लिखते राम हैं
और इनसे मिलो ये इस बाज़ार के बड़े माफिया हैं
साहित्य ग़ज़ल है अगर तो ये रदीफ़ हैं, काफ़िया हैं
इनके पलटने से बड़े बड़ों के तख़्त पलट जाते हैं
ये कभी पुरुस्कार लेते हैं तो कभी लौटा आते हैं
हमने कहा हुज़ूर साहित्य सृजन है, विषय नहीं क्रोध का
इसे क्यों बनाते हैं हथियार राजनीतिक प्रतिशोध का
मिले हुए सम्मान का कुछ तो सम्मान कीजिये
कलम को सियासत का मत गुलाम कीजिये
वो बोले तुम अभी नए हो इसलिये आदर्शवादी हो
सूट बूट के ज़माने में, नैतिकता की खादी हो
अब वक़्त बदल गया है, रस्मो रिवाज़ बदल गए हैं
साहित्य के परिंदे के सियासी पर निकल गए हैं
हाथ जोड़ो, पैर पकड़ो, पुरुस्कार की भीख लो
पुरानी धुन छोडो और नई सरगम सीख लो
'स' से सलाम 'र' से राजा 'ग' से गुणगान 'म' से मंच
साहित्यकार कहलाना है तो जान लो ये सारे प्रपंच
त्याग की बात करते रहो और बने रहो भोगी
तो इस बाज़ार में एक दुकान तुम्हारी भी होगी
टीवी में, अख़बार में तुम ही तुम दिखोगे
मेरी बात मान लो प्यारे, खूब बिकोगे
स्वप्न था या दृश्य यथार्थ कथन का?
हमने चित्र देखा मनुष्यता के पतन का
हम अपनी दुनिया में तो लौट आये हैं
कुछ प्रश्न मगर साथ में ज़रूर लाये हैं
व्यवस्था पर दोष डालना सही ढंग नहीं है
क्या हम भी इसी व्यवस्था का अंग नहीं हैं?
अगर साहित्यकार हैं तो दायित्व स्वीकार करें
उठायें कलम, रुग्ण मानसिकता पर प्रहार करें
दर्पण में बिम्ब दिखायें अवश्य वर्तमान का
मगर रास्ता भी बनायें भविष्य के निर्माण का
क्योंकि कल की नींव है ये, प्रेरणा है आज की
कलम तो स्वयं शिल्पकार है इस समाज की
© - प्रशांत सेठ
