Friday, March 13, 2015

एक था जन आंदोलन

एक गन्दी सी बस्ती में रोता हुआ मिल गया। मैंने पूछा तू रोता क्यों है? बोला बिछड़ गया हूँ। मैंने पूछा किससे और कैसे? बोला लंबी कहानी है, कई बार दोहराई गई है। मैंने कहा कोई बात नहीं, एक बार और सही ...

गिलहरी के रेत में लोटने और समुद्र में डुबकी लगाने से प्रेरित होकर हमारे नायक ने सोचा की राजनीति की कीचड़ में बार बार लोट कर और माफ़ी की गंगा में स्नान कर के, मैं भी इस कीचड़ को साफ करूंगा।

तो इस तरह शुरू हुआ कीचड़ में लोटने और नहाने का सिलसिला। जनता जनार्दन ने हाथ भी फेर दिया। कीचड़ तो ख़त्म नहीं हुई, हाँ बार बार लोटने से खांसी ज़रूर हो गई। तथाकथित देशभक्ति और ईमानदारी का जामा पहने निजी महत्वकांक्षाओं का हुजूम भी पीछे चल पड़ा। भ्रमवश कुछ राष्ट्रनिर्माण और परिवर्तन के सपने भी साथ चले मगर ज़्यादा दूर तक नहीं चल सके।

हमारे नायक ने कभी पीछे मुड़के नहीं देखा। ज़रूरत भी नहीं थी। सामने मंज़िल हो तो रफ़्तार बढ़ ही जाती है। महत्वकांक्षायें प्रबल थीं इसलिए चाटुकार भी शुभचिंतक नज़र आने लगे। कुछ लोग जो एक छोटे से बच्चे "सिद्धांत" का हाथ पकड़ के चल रहे थे, वो पीछे रह गये।

सफलता मिलने लगी तो तथाकथित शुभचिंतकों की भीड़ में वो छोटा सा "सिद्धांत" भी बिछड़ गया। ठीक वैसे ही जैसे कुम्भ के मेले में माँ से उसका बच्चा बिछड़ जाता है। काफी खोजने के बाद जब वो नहीं मिला तो ज़िन्दगी की रफ़्तार में एक दिन उसे भुला दिया गया।

अब देखना ये है की ये बिछड़ा हुआ सिद्धांत किसको मिलता है। शायद हिंदी फ़िल्मों की तरह इसे भी कोई पाल पोस कर बड़ा कर रहा हो। जब ये बच्चा बड़ा और काबिल होकर आयेगा तब उस पर अपना दावा ठोकने, कोई नायक फिर प्रस्तुत होगा आपके सामने।

तब तक के लिये अलविदा...

द्रष्टा बन के देखिये अजब गज़ब संसार
मानव मन दौड़ रहा, दौड़ा रहा अहंकार
___________

मंदिर-ओ-मज़ार टूटे, दर-ओ-दीवार टूटे हैं
यूँ तो ख्वाब इस मुल्क के हज़ारों बार टूटे हैं

गर तुम गैर होते तो दिलासा दिल को यूँ देते
एक ग़ज़नी ने अरमानों के फिर अम्बार लूटे हैं

गम नहीं, खो गये हैं मंज़िल के निशाँ ही अब
गम ये है के रस्ते भी हो के बेज़ार रूठे हैं

इस मंच पे देखो हर शख्स का यही चेहरा है
तमाशा-ए-सियासत में सब किरदार झूठे हैं

नशेमन से बिछड़े हम परिंदों का दर्द सुन लो
यहाँ सारे गुलशन के फरमाबरदार झूठे हैं

गम ये है अब अपनी ज़मीं रही ना आसमाँ ही
उड़ेंगे ना सदियों तक के पंख इस बार टूटे हैं

© - प्रशांत सेठ

नशेमन = घोंसला, फरमाबरदार = ज़िम्मेदार लोग

Friday, March 6, 2015

रंग बिरंगी शुभकामनायें

रंग यानि खुशियाँ, ऊर्जा, उमंग। रंग यानि जीवन। जीवन यदि एक ही रंग में ढला हो, तो सोचो कितना नीरस होगा। जिसने सारे रंगों को नहीं जाना उसने जीवन को नहीं जाना। तभी तो सृष्टि एक नहीं, अनेक रंगों से भरी है उस चित्रकार ने।

विज्ञान कहता है की प्रत्येक वस्तु उस रंग विशेष की दिखाई पड़ती है जिस रंग के प्रकाश को वो समाहित नहीं कर पाती (Reflection of light)। यानी जो जिस रंग का नज़र आता है, उसमेँ वही रंग नहीं होता। सफ़ेद में कोई रंग नहीं होता और काले में सारे रंग समाहित होते हैं। शायद इसलिये वो चित्रकार भी काला है क्योंकि उसने हर रंग को खुद में समाहित रखा है।

एक रंग में दूजो मिले, रंग बने न्यारो
कारे में जो कोई मिले, वो भी होये कारो ।।

हो सकता है आपको कोई रंग विशेष पसंद हो। मगर इसका मतलब ये तो नहीं के आप बाकी रंगों को मिटाने में जुट जायेंगे। लेकिन दुनिया में तो यही हो रहा है। इस रंग बिरंगी दुनिया में सबने अपना अपना रंग पकड़ रखा है। और खो दिया है जीवन के आनंद को।

होली यही सन्देश लेकर आती है के हर रंग के अस्तित्व को स्वीकार करो। यकीन ना हो तो आज एक ही रंग से होली खेल कर देख लो। वो चित्रकार फिर तुमसे यही पूछेगा...

तुम्हारे रंग ना जाने क्यों उड़े उड़े थे
मैंने तो इस चित्र में सातों रंग भरे थे ।
हर रंग में रंग जाने का दिन है होली
एक तुम ही थे जो भगवा थे, हरे थे ।।

© - प्रशांत सेठ

आप सभी को रंग बिरंगी शुभकामनायें

Friday, February 27, 2015

एक अजन्मी कथा

एक चित्र देखने मिला। कचरे के ढेर पे पड़ी हुई मनुष्यता का। कचरे में पड़े हुये समाज का। मैं अक्सर सोचता था की यह कृत्य केवल बे-पढ़े लिखे वर्ग का हो सकता है। लेकिन मैं गलत था। यह मानसिकता संभ्रांत वर्ग में भी उतनी ही पनपती है। बल्कि शायद कुछ ज़्यादा।

आप तो जानते ही हैं, एक संवेदनशील ह्रदय बेजान वस्तुओं से भी बात कर लेता है। फिर, इस चित्र में तो कभी जान रही होगी ना। लिहाज़ा बात होनी ही थी सो हो गई।

आप भी सुनिये; कचरे के ढेर में पड़ी हुई मनुष्यता की व्यथा। इस चित्र से उपजी....

"एक अजन्मी कथा"

मधुर प्रेम के किसी क्षण में
नेह व्याप्त था कण कण में
प्रकृति ने तब श्रृंगार किया
ईश्वर ने अंगीकार किया

संकल्प शिव का परस्पर था
जननी होने का अवसर था
समर्पण का तुमने विचार किया
दायित्व सृजन का स्वीकार किया

जगत धारिणी धरती के जैसे
देखें सृजन तुम करती हो कैसे
इसलिये विधाता छुप गया ओट में
मुझे सौंप कर तेरी गोद में

माँ की कोख में क्या भय होना था
नव जीवन का अब उदय होना था
आतुरता थी श्वांस श्वांस में
निर्भयता थी मेरे विश्वास में

और फिर मैंने आकार लिया
नारीत्व को स्वीकार किया
तेरे जैसी बनना चाहती थी
सृष्टि मैं भी रचना चाहती थी

तेरा पोषण, तेरा संयम था
मिट रहा अब अधूरापन था
सिर्फ उमंग थी और उत्साह था
वर्तमान, भविष्य से बेपरवाह था

लेकिन...

सरल नहीं है स्त्री का जन्म पाना
हर निश्चय का मंज़िल तक जाना
स्वप्न आँख का तरल हो गया
खुशियों का अमृत गरल हो गया

दूषित तुम्हारा मन क्लेश से
हुआ मेरे आगमन सन्देश से
सन्नाटे में डूबी किलकारी
फूल खो गया, रह गई क्यारी

प्रश्न है इस अजन्मी बेटी का
मैं ही पात्र क्यों हूँ बलिवेदी का?
क्या है फर्क मुझमें और उसमें?
क्या प्रारब्ध है किसी के बस में?

ये जो कुछ मैं सहे जाती हूँ
बस इतना ही मैं कहे जाती हूँ
फिर कोई कली असमय ना टूटे
फिर कोई अजन्मी कथा ना छूटे

भेद है केवल तुम्हारी दृष्टि का
नियम अदभुत है वरना सृष्टि का
दोनों में ईश्वरीय अभिव्यक्ति है
पुरुष संकल्प है, स्त्री शक्ति है

© - प्रशांत सेठ

Thursday, February 19, 2015

Wake up Bunty

"एक बूढा व्यक्ति अपना मोबाईल लेकर रिपेयरिंग की दुकान पर गया और दिखाया।
रिपेयरिंग वाले ने कहा: यह बिलकुल ठीक काम कर रहा है
वृद्ध की आखों में आंसू आ गये बोला : फिर इसमें मेरे बच्चो के फोन क्यों नही आते?"

कल फेसबुक पर ये पोस्ट पढ़ने को मिली। अपने आसपास नज़र डाली तो बहुत से ऐसे ख़राब मोबाइल दिखे। लेकिन इन ख़राब पड़े मोबाइलों में कुछ धड़क रहा था। शायद कुछ ज़िंदा था.... एक उम्मीद।

ऐसे ही एक मोबाइल के दिल के तार को छेड़ा तो, वो क्या बोला... ये सुनिये।

मीलों की दूरी अब तय करता है कौन
हाँ, यदा कदा बच्चे कर लेते हैं फोन
रफ़्तार भरी ज़िन्दगी का लाइफ स्टाइल है
माँ बाप के पास बच्चे नहीं, सिर्फ मोबाइल है

बेटा मुम्बई में बहुत बड़ा अफसर है
गाँव दूर पड़ता है, दो दिन का सफ़र है
उसके पास छुट्टी का एक पल नहीं है
हमारा क्या है, आज हैं कल नहीं हैं

उसके सपने परिंदों की तरह ऊंचे उड़ते है
गलती हमारी ही है जो उम्मीद से जुड़ते हैं
परिंदों के पैर में कब कोई ज़ंजीर होती है
तन्हाई, ठूँठ हो चुके दरख्तों की तकदीर होती है

काश उसके सपनों में हमारी भी जगह होती
काश हमारी ख़ुशी उसके जीने की वजह होती
जीवन में यही एक काश रह गया है
जिस्म फकत ज़िंदा लाश रह गया है

अब इंतज़ार है तो बस एक घंटी का
शायद फोन आ जाये आज मेरे बंटी का
इसी तरह इंतज़ार में समय कट जाता है
जीवन का एक दिन और घट जाता है
___________

मैं देख रहा हूँ हर तरफ बंटी ही बंटी हैं
गूंगे मोबाइल गाँव में, बे-आवाज़ बे-घंटी हैं
सोचा ऐसे ही ख़राब हो चुके मोबाइल को बजा दूं
आज मैं सोये हुये किसी बंटी को जगा दूं

मौत जिस दिन आएगी, ज़िन्दगी सवाल नहीं करेगी
बंटी, वो तेरे होने ना होने का ख्याल नहीं करेगी
ना वो ख्याल करेगी गाँव से शहर की दूरी का
ना ही ख्याल करेगी तेरी सरकारी मजबूरी का

बंटी, तेरे ऊपर और ऊपर केवल भ्रम का आसमान है
जिसको सफलता कहते हो, वो व्यर्थ की उड़ान है
देखना उड़ते उड़ते एक दिन जब थक जाओगे
इन्ही दरख्तों की गोद में तुम वापस आओगे

तब पता नहीं ये दरख़्त फिर कहाँ होंगे
शायद किसी और दुनिया में परिंदों की पनाह होंगे
इसलिये उड़ने के पहले ठहरने का इंतज़ाम रखना
सारा दिन उड़ना, लेकिन माँ बाप के लिये शाम रखना

© - प्रशांत सेठ

Monday, January 26, 2015

ज़रा याद उन्हें भी कर लो

हाँ भाई आज 14 फ़रवरी है; मोहब्बत का दिन है। यूँ तो हर दिन मोहब्बत का है लेकिन पाश्चात्य संस्कृति ने यही सिखाया है की आज मोहब्बत का तमाशा बना दीजिये। तो हमने सोचा की हम भी .....

अपनी अपनी मोहब्बत है जनाब। एक उनको भी थी जो हँसते हँसते फांसी पर चढ़ गए थे। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की सज़ा के खिलाफ पं मदन मोहन मालवीय जी ने आज ही के दिन अपील की थी जिसे ख़ारिज कर दिया गया और 23 मार्च 1931 को तीनों क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई। उस दिन धरती से आकाश तक यही गीत गूंजा होगा...

"सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है..."

तो हुआ ना आज वतन से मोहब्बत का दिन। इसी बात पर आज की उस नौजवानी को थोड़ा सा आईना दिखा दूं जो गुलाबों में उलझ कर रह गई है या जिनकी मौसमी देशभक्ति बस भारत पाकिस्तान के क्रिकेट मैच में देखने को मिलती है...

मखमली हाथों में तकदीर-ए-मुल्क है जनाब
कौन रखेगा यहाँ खून-ए-शहीद का हिसाब ।

है पशेमां सरज़मीं भी नौजवाँ-ए-हिंद से
हाथ में शमशीर नहीं, लिये खड़े हैं गुलाब ।

बिक गई रात हुस्न-ए-मेहताब के हाथ यूँ
बुझ गये चिराग खुद और छुप गया आफताब।

भूल गई माहज़बीनें, हाड़ी रानी के किस्से
शहादत का रास्ता रोक रहा हुस्न-ओ-शबाब ।

रोशनी हो तो कैसे तीरगी से रूबरू
चश्म-ए-जुगनु में कहीं, ज़िंदा नहीं कोई ख्वाब ।

खामोश हो गई ज़ुबां-ए-कलम इस दौर में
रग-ए-जवां बहता नहीं अब बिस्मिल सा इंकलाब ।।

© - प्रशांत सेठ

पशेमां = शर्मिन्दा, शमशीर = तलवार, हुस्न-ए-मेहताब = चाँद का हुस्न, आफताब = सूरज, माहज़बीनें = नवयोवनायें, तीरगी = अँधेरा, चश्म-ए-जुगनु = जुगनू की आँख, रग-ए-जवां = जवानी की रगों में

Sunday, January 25, 2015

खोया हुआ है जो भी... इस मौसम पुकार लो !!

कुछ रिश्ते ज़रा सी ज़िद में दूर हो जाते हैं। ज़िन्दगी नदी के दो पाटों की तरह साथ तो चलती है, मगर मिलती नहीं। बीच में अहंकार की सर्द नदी जो बहती है।

हो सकता है आपके जीवन में भी कोई ऐसा रिश्ता हो। देर मत करो, बस पुकार लो। एक क्षण, मात्र एक क्षण में खोया हुआ सब कुछ मिल सकता है ...

कुछ तो हुआ है खाली, तेरे चले जाने से
कुछ है जो रोकता है, तेरे पास आने से ।
बेमानी सी इस अना को लेकर मैं क्यों चलूँ
मिल सकती है ज़िन्दगी एक दीवार गिराने से ।।

वैसे भी वसंत ऋतू यानि प्रेम का मौसम। सर्दियों से गर्मियों की ओर बढ़ने का मौसम। क्या कुछ सर्द हो चुके रिश्तों में गर्माहट लाने का यही सर्वोत्तम समय नहीं है?

कंपकंपाती तन्हाई है, तुम संवार दो
हो सके तो धूप का एक कतरा उधार दो ।
दरमियां-ए-दिल जब बाकी हैं गर्मियां
एहसासों से ज़िद का स्वेटर उतार दो ।।

© - प्रशांत सेठ

Monday, January 19, 2015

गृहस्थी - ग्रह स्थिति

अजी सुनते हो, श्रीमति जी ने आवाज़ लगायी
मैंने मन ही मन सोचा आज फिर शामत आयी
"सुनो जी" और "अजी सुनते हो" में फर्क भारी होता है
एक निजी आग्रह तो दूसरा फरमान सरकारी होता है

मीठी हो या कड़वी दवाई तो दवाई होती है
एक तरफ कुआँ दूसरी तरफ खाई होती है
पति का दूसरा नाम ही लाचारी है
इसमें जेब हलकी उसमें सर भारी है

पत्नी श्री प्रकट हुईं कोयल सी बोली थी
करेले के जूस में मिश्री सी घोली थी
मैंने तुरंत अपनी ढाल संभाली
और एक प्रश्नवाचक नज़र उछाली

शास्त्रानुसार मैं श्रीमान हूँ आप श्रीमती हैं
मुझे सुनने की मजबूरी आपको बोलने की अनुमति है
इसी दम पर हम आज तक पारिवारिक प्राणी हैं
प्रकृति ने मुझे कान दिए हैं आपके पास वाणी है

अधरों की मुस्कान तुरंत सीधी हो गयी
वो क्षण भर में प्रेयसी से बीवी हो गयी
बोलीं आपके किसी मित्र का पत्र आया है
बड़े प्यार मनुहार से आपको बुलाया है

लिखता है की आपमें ग़ज़ब का सब्र है
आप जैसे लोगों की यहाँ बड़ी कद्र है
छोटे बड़े काम में आप फर्क नहीं करते
उसपर खूबी ये क़ी आप तर्क नहीं करते

जीवन में हर ज़िम्मेदारी बखूबी निभाते हैं
वजन पूरा लेते हैं अक्ल नहीं लगाते हैं
आप अपने मालिक के प्रति लॉयल हैं
आपकी इसी प्रतिभा के हम कायल हैं

आपके लिए हमारे पास है शानदार काम
भरपूर वेतन दो वक़्त खाने का इंतज़ाम
इस काम के लिए लोग भले चाहिए
पहली गाड़ी पकड़िये और चले आइये

पति की प्रशंसा पत्नी को हजम नहीं होती
ऐसी चिट्ठियों से समस्या कम नहीं होती
बोलीं ये कौन है जो आपको इतना मानता है
कैसा मित्र है आपको ज़रा भी नहीं जानता है

एक पति को हालांकि श्रेय लेने का हक नहीं है
फिर भी ये गुण मेरे हैं इसमें कोई शक नहीं है
घर की मुर्गी जब दाल बराबर रहती है
तभी गृहस्थी की चाल बराबर रहती है

मैंने कहा भाग्यवान आगे पढ़ क्या लिखा है
ये पहला आदमी है जिसे मुझमें कुछ दिखा है
एक जोहरी ही हीरे की परख जानता है
चलो कोई तो है जो मेरी कीमत मानता है

लिखा था तू फुर्सत में है कविता लिखता है
गृहस्थी के बोझ में गधे जैसा दिखता है
मैं आजकल पुष्कर शहर में रहता हूँ
धंधा खूब चल निकला है इसलिए कहता हूँ

मेरे शहर में हर बरस एक मेला लगता है
यहाँ तेरे जैसा प्राणी खड़े खड़े बिकता है
मेरे ख़त को मखौल मत समझना खाली
क्योंकि मेरा पेशा है मेले में गधों की दलाली

आत्मसम्मान के रक्षार्थ थी मजबूरी
पत्र का उत्तर देना हो गया ज़रूरी
मैंने लिखा दोस्त, तेरा मुझ पर एहसान है
मेरे मन में गधों के लिये बहुत सम्मान है

ये साधारण सा प्राणी सिर्फ कर्म करता है
इंसान की तरह कहाँ कुचक्र और धर्म रचता है
ये जो चारों तरफ दुनिया में आग है
इस फसाद की जड़ में इंसानी दिमाग है

आने वाले कल में गधों का ही राज होगा
उस दिन मेरे दोस्त तुझे मुझ पर नाज़ होगा
इंसान तो इंसान को एक दिन खा जायेगा
देखना दुनिया में चौपायों का युग आ जायेगा

© - प्रशांत सेठ