एक गन्दी सी बस्ती में रोता हुआ मिल गया। मैंने पूछा तू रोता क्यों है? बोला बिछड़ गया हूँ। मैंने पूछा किससे और कैसे? बोला लंबी कहानी है, कई बार दोहराई गई है। मैंने कहा कोई बात नहीं, एक बार और सही ...
गिलहरी के रेत में लोटने और समुद्र में डुबकी लगाने से प्रेरित होकर हमारे नायक ने सोचा की राजनीति की कीचड़ में बार बार लोट कर और माफ़ी की गंगा में स्नान कर के, मैं भी इस कीचड़ को साफ करूंगा।
तो इस तरह शुरू हुआ कीचड़ में लोटने और नहाने का सिलसिला। जनता जनार्दन ने हाथ भी फेर दिया। कीचड़ तो ख़त्म नहीं हुई, हाँ बार बार लोटने से खांसी ज़रूर हो गई। तथाकथित देशभक्ति और ईमानदारी का जामा पहने निजी महत्वकांक्षाओं का हुजूम भी पीछे चल पड़ा। भ्रमवश कुछ राष्ट्रनिर्माण और परिवर्तन के सपने भी साथ चले मगर ज़्यादा दूर तक नहीं चल सके।
हमारे नायक ने कभी पीछे मुड़के नहीं देखा। ज़रूरत भी नहीं थी। सामने मंज़िल हो तो रफ़्तार बढ़ ही जाती है। महत्वकांक्षायें प्रबल थीं इसलिए चाटुकार भी शुभचिंतक नज़र आने लगे। कुछ लोग जो एक छोटे से बच्चे "सिद्धांत" का हाथ पकड़ के चल रहे थे, वो पीछे रह गये।
सफलता मिलने लगी तो तथाकथित शुभचिंतकों की भीड़ में वो छोटा सा "सिद्धांत" भी बिछड़ गया। ठीक वैसे ही जैसे कुम्भ के मेले में माँ से उसका बच्चा बिछड़ जाता है। काफी खोजने के बाद जब वो नहीं मिला तो ज़िन्दगी की रफ़्तार में एक दिन उसे भुला दिया गया।
अब देखना ये है की ये बिछड़ा हुआ सिद्धांत किसको मिलता है। शायद हिंदी फ़िल्मों की तरह इसे भी कोई पाल पोस कर बड़ा कर रहा हो। जब ये बच्चा बड़ा और काबिल होकर आयेगा तब उस पर अपना दावा ठोकने, कोई नायक फिर प्रस्तुत होगा आपके सामने।
तब तक के लिये अलविदा...
द्रष्टा बन के देखिये अजब गज़ब संसार
मानव मन दौड़ रहा, दौड़ा रहा अहंकार
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मंदिर-ओ-मज़ार टूटे, दर-ओ-दीवार टूटे हैं
यूँ तो ख्वाब इस मुल्क के हज़ारों बार टूटे हैं
गर तुम गैर होते तो दिलासा दिल को यूँ देते
एक ग़ज़नी ने अरमानों के फिर अम्बार लूटे हैं
गम नहीं, खो गये हैं मंज़िल के निशाँ ही अब
गम ये है के रस्ते भी हो के बेज़ार रूठे हैं
इस मंच पे देखो हर शख्स का यही चेहरा है
तमाशा-ए-सियासत में सब किरदार झूठे हैं
नशेमन से बिछड़े हम परिंदों का दर्द सुन लो
यहाँ सारे गुलशन के फरमाबरदार झूठे हैं
गम ये है अब अपनी ज़मीं रही ना आसमाँ ही
उड़ेंगे ना सदियों तक के पंख इस बार टूटे हैं
© - प्रशांत सेठ
नशेमन = घोंसला, फरमाबरदार = ज़िम्मेदार लोग